चन्द्रगुप्त प्रथम से लेकर चन्द्रगुप्त द्वितीय तक गुप्तों के उत्कर्ष को स्पष्ट कीजिए।

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चन्द्रगुप्त प्रथम से लेकर चन्द्रगुप्त द्वितीय के उत्कर्ष – गुप्त वंश का सर्वप्रथम शक्तिशाली शासक था – चन्द्रगुप्त प्रथम उसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी। उसके शासनकाल की महत्वपूर्ण घटना लिच्छवियों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करना था। चन्द्रगुप्त प्रथम की विजयों के विषय में कुछ भी ज्ञात नहीं है, जिससे उसके साम्राज्य की सीमा को निर्धारित किया जा सके। वायुपुराण में किसी गुप्त राजा की साम्राज्य की सीमा का वर्णन करते हुए बताया गया है कि गुप्त वंश के लोग गंगा के किनारे प्रयाग तक तथा साकेत, मगध के प्रदेशों पर शासन करेंगे। जिस साम्राज्य की सीमा का यहाँ उल्लेख हुआ है उसका विस्तार पूर्व में मगध से लेकर पश्चिम में प्रयाग तक था। स्पष्ट है यह साम्राज्य सीमा चन्द्रगुप्त प्रथम के समय का है क्योंकि उसके पूर्ववर्ती दोनों ही शासक अत्यन्त साधारण स्थिति के थे तथा उसके बाद के शासक समुद्रगुप्त का साम्राज्य इससे कहीं अधिक विस्तृत था। प्रयाग प्रशस्ति आर्यावर्त तथा दक्षिणापथ में समुद्रगुप्त की विजयों का उल्लेख करती है, किन्तु पश्चिम की ओर प्रयाग के पूर्व में गंगा नदी तक के भू-भाग की चर्चा इसमें नहीं मिलती। इससे भी स्पष्ट है कि यह भाग चन्द्रगुप्त के अधिकार में था। एच.सी. राय चौधरी के मतानुसार कौशाम्बी तथा कौशल के राजाओं को चन्द्रगुप्त ने जीतकर उनके राज्यों पर अधिकार कर लिया था।

समुद्रगुप्त

समुद्रगुप्त गुप्त शासक चन्द्रगुप्त प्रथम का पुत्र था। उसका शासनकाल सन् 335 से 380 ई. था। समुद्रगुप्त एक साम्राज्यवादी विचारधारा का शासक था। उसने अपने शासनकाल में इसी नीति का पालन करते हुए विशाल भू-भाग पर विजय प्राप्त की थी। इलाहाबाद स्थित अशोक के

स्तम्भ लेख पर समुद्र गुप्त की विजयों का उल्लेख उसके राजकवि हरिषेण द्वारा किया गया है जिससे समुद्रगुप्त की विजयों (उपलब्धियों) पर प्रकाश पड़ता है। इसे के समूहों में विभाजित किया जा सकता है प्रथम समूह में गंगा-यमुना के दोआब का क्षेत्र, द्वितीय– पूर्वी हिमालय और उसके समीपवर्ती शासकों के राज्य जिनमें असम, बंगाल और नेपाल सम्मिलित है। तृतीय समूह में आटविक राज्य (जंगली क्षेत्रों में स्थित राज्य) थे जो विन्ध्य क्षेत्रों में पड़ते थे। चतुर्थ समूह में पूर्वी दक्कन और दक्षिण भारत के 12 राज्य सम्मिलित है। पंचम समूह में शक और कुषाणों के राज्य थे जिनमें से कुछ अफगानिस्तान में शासन करते थे। इस प्रकार समुद्रगुप्त ने अपनी विजयों के द्वारा एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की। उसे कभी भी पराजय का सामना नहीं करना पड़ा। उसे अपनी बहादुरी और युद्ध कौशल के कारण भारत का नेपोलियन कहा जाता है।

वाकाटक कौन थे?

चन्द्रगुप्त द्वितीय, समुद्रगुप्त का कनिष्ठ पुत्र था। अपने बड़े भाई रामगुप्त की हत्या कर 380 ई. के लगभग यह गुप्त राजसिंहासन पर आसीन हुआ। उसने लगभग 414-15. ई. तक शासन किया। वह समुद्रगुप्त के पश्चात गुप्तवंश का श्रेष्ठतम शासक माना जाता है। उसके समय में गुप्त- साम्राज्य अपने विकास के शीर्षस्थल पर पहुँच गया। इसका दूसरा नाम देवराज अथवा देवगुप्त था। शासक बनने के पश्चात् इसने विक्रमादित्य’ की उपाधि भी धारण की चन्द्रगुप्त के शासनकाल का सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख दिल्ली में स्थित मेहरीली लौह स्तम्भाभिलेख है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य

चन्द्रगुप्त द्वितीय गुप्तवंश का ही नहीं अपितु प्राचीन भारत का महान शासक था। वह एक वीर योद्धा, साम्राज्य निर्माता, कुशल प्रशासक एवं सफल कूटनीतिज्ञ के रूप में विख्यात है। वह एक प्रजावत्सल शासक था, जो सदैव अपनी प्रजा के हित की कामना करता था। स्वयं वैष्णव होते हुए भी उसने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनायी। चीनी यात्री फाह्यान चन्द्रगुप्त की उदार धार्मिक नीति एवं दानशीलता की प्रशंसा करता है। चन्द्रगुप्त ने मुद्रा व्यवस्था में भी परिवर्तन किया। उसने चाँदी एवं ताँबे के सिक्के भी जारी किए। यह कला एवं साहित्य का प्रेमी एवं विद्वानों का आश्रयदाता था। उसका दरबार नवरत्नों से सुशोभित था, जिनमें सबसे विख्यात महाकवि कालिदास थे। इस समय आर्थिक प्रगति हुई एवं विभिन्न कलाओं का विकास हुआ। अगर गुप्तकाल भारतीय इतिहास का स्वर्णयुग था, तो वह काल वस्तुतः चन्द्रगुप्त द्वितीय का ही शासनकाल था।

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