चन्द्रगुप्त द्वितीय की शकों पर विजय पर एक लेख लिखिए।

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चन्द्रगुप्त द्वितीय की शकों पर विजय – चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य 375 ई. में गुप्त वंश की गद्दी पर बैठा। यह महान सम्राट समुद्रगुप्त का पुत्र था तथा उसी की तरह योग्य एवं पराक्रमी था वैवाहिक सम्बन्धों द्वारा अपनी स्थिति सुदृढ़ कर लेने के पश्चात् चन्द्रगुप्त ने अपना विजय अभियान प्रारम्भ किया। जिसका उद्देश्य उदयगिरिगुहालेख के शब्दों में ‘सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतना (कृत्स्नपृथ्वीजय) था। वह अपने पिता समुद्रगुप्त के ही समान एक कुशल योद्धा था। अपनी विजय की प्रक्रिया में उसने पश्चिमी भारत के शकों की शक्ति का उन्मूलन किया। शक उन दिनों गुजरात और कठियावाड़ में शासन करते थे। यद्यपि उन्होंने समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार कर ली थी, तथापि उनका उन्मूलन नहीं किया जा सकता था और वे अब भी काफी शक्तिशाली थे। रामगुप्त के समय में शकों ने गुप्त- साम्राज्य के लिए संकट खड़ा कर दिया था और चन्द्रगुप्त ने उनके शासक की हत्या कर अपने साम्राज्य की रक्षा की थी। राजा होने के बाद चन्द्रगुप्त ने उन्हें पूर्णतया उन्मूलित करने के लिए एक व्यापक सैनिक अभियान किया।

पूर्वी मालवा के क्षेत्र से चन्द्रगुप्त द्वितीय के तीन अभिलेख मिलते हैं जिनसे परोक्ष रूप से शक-विजय की सूचना मिलती है। प्रथम अभिलेख भितसा के समीप उदयगिरि पहाड़ी से मिला है। और यह उसके सन्धिविग्रहिक सचिव वीरसेन का है। इससे ज्ञात होता है कि वह ‘सम्पूर्ण पृथ्वी’ को जीतने की इच्छा से राजा के साथ इस स्थान पर आया था। दूसरा अभिलेख भी उदयगिरि से ही मिलता है और यह उसके सामन्त ‘सनकानीक महाराज’ का है। तीसरा अभिलेख सांची का लेख है जिसमें उसके आनकार्दव नामक सैनिक पदाधिकारी का उल्लेख हुआ है जो सैकड़ों युद्धों का विजेता था। इन तीनों अभिलेखों के सम्मिलित सक्ष्य से यह प्रकट होता है कि चन्द्रगुप्त पूर्वी मालवा में अपने सामन्तों एवं उच्च सैनिक अधिकारियों के साथ अभियान पर गया था। इस अभियान का उद्देश्य निश्चय ही पूर्वी मालवा के ठीक पश्चिम में स्थित शक राज्य को जीतना था। चन्द्रगुप्त का शक प्रतिद्वन्द्वी रुद्रसिंह तृतीय था। वह मार डाला गया तथा उसका गुजरात और काठियावाड़ का राज्य गुप्त साम्राज्य में मिला लिया गया। चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शक मुद्राओं के ही अनुकरण पर चाँदी के सिक्के उत्कीर्ण करवाए जिन्हें शक राज्य में प्रचलित करवाया गया।

मिस्त्री साहित्य का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

वहाँ से रूद्रसिंह तृतीय के कुछ चाँदी के सिक्के ऐसे मिलते हैं जो चन्द्रगुप्त द्वारा पुनः अंकित कराए गए। इन सिक्कों के प्रमाण से भी शक राज्य पर उसका आधिपत्य सूचित होता है। चन्द्रगुप्त के व्याघ्रशैली के सिक्के भी गुजरात और काठियावाड़ की विजय के प्रमाण है क्योंकि भारत के इसी भाग में सिंह अधिक पाए जाते थे। यह शक-विजय सम्भवतः पाँचवीं शती के प्रथम दशक में दी गई थी। यह निश्चित रूप से एक महान् सफलता थी। इसके साथ ही तीन शताब्दियों से भी अधिक समय के शासन के पश्चात् पश्चिमी क्षत्रपों के वंश का अन्त हुआ तथा पश्चिमी भारत से विदेशी आधिपत्य की समाप्ति हुई। इस विजय ने चन्द्रगुप्त की ख्याति की चतुर्दिक फैला दिया। भारतीय अनुश्रुतियाँ उसे ‘शकार’ के रूप में स्मरण करती है तथा इसी विजय की चर्चा अनेक साहित्यिक ग्रन्थों में हुई है। सम्भवतः अपनी इसी उपलब्धि के बाद उसने ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि ग्रहण की थी। शक राज्य के गुप्त साम्राज्य में मिल जाने से उसका विस्तार पश्चिम में अरब सागर तक हो गया।

आर्थिक दृष्टि से भी इस विजय ने गुप्त साम्राज्य की समृद्धि में योगदान दिया। इसके परिणामस्वरूप पश्चिम समुद्रतट के प्रसिद्ध बन्दरगाह भृगुकच्छ (भड़ौच) के ऊपर उसका नियन्त्रण हो गया। इसके माध्यम से पाश्चात्य विश्व के साथ साम्राज्य का व्यापार वाणिज्य घनिष्ठ रूप से होने लगा जो देश की आर्थिक प्रगति से सहायक बना।

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