चाहमान (चौहान) वंश का संक्षिप्त इतिहास लिखिए।

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चाहमान वंश का इतिहास

चाहमान वंश का इतिहास – अजमेर का चौहान वंश प्रारम्भ में प्रतिहारों का सामन्त था। दसवीं शताब्दी के मध्य इस वंश की स्वतन्त्रता सिंहराज ने घोषित की और महाराजाधिराज की उपाधि ग्रहण की। सिंहराज का उत्तराधिकारी विग्रहराज द्वित्तीय हुआ। विग्रहराज के बाद उसका छोटा भाई दुर्लभराज शासक बना। उसके बाद इसका पुत्र गोविन्दराज द्वितीय शासक हुआ जिसने ‘वैरिभर’ की उपाधि धारण की। गोविन्दराज द्वितीय के बाद उसका पुत्र वाक्पतिराज द्वितीय शासक बना। उसके छोटे भाई वीर्यराज के शासनकाल में चौहान वंश को परमार नरेश भोज से पराजय झेलनी पड़ी और शाकम्भरी पर परमारों का अधिकार हो गया।

किन्तु उसके भाई चामुण्डराज ने परमार को पुनः परास्त कर शाकम्भरी को मुक्त करा लिया। चामुण्डराज के बाद दुलर्मराज तृतीय शासक बना। इसके बाद विग्रहराज तृतीय राजा हुआ जिसने परमार वंश की कन्या राजदेवी के साथ विवाह कर मैत्री स्थापित की। विग्रहराज तृतीय के बाद उसका पुत्र पृथ्वीराज प्रथम चास्मान राजगद्दी पर बैठा। उसने परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर की उपाधि धारण की। वह एक परम शक्तिशाली शासक था। प्रबन्धकोश में उसे मुस्लिम सेना का विजेता बताया गया । पृथ्वीराज प्रथम के बाद उसका पुत्र अजयराज शासक बना। उसने अजमेर नगर की स्थापना की और अपनी राजधानी को वहाँ स्थानान्तरित किया। पृथ्वीराज विजय के विवरण के अनुसार इसने मुसलमानों को भी परास्त किया था।

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अजयराज का उत्तराधिकारी उसका पुत्र अर्णोराज हुआ जिसने महाराजाधिराज परमेश्वर परमभट्टारक की उपाधि धारण की जो उसकी शक्ति का प्रतीक था। उसने अपने समय में तुर्कों को पराजित किया और उनकी सेना को नष्ट कर दिया। चौहानवंशी राजाओं में अनराज का पुत्र विग्रहराज चतुर्थ सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था । विग्रहराज के पश्चात् पृथ्वीराज द्वितीय राजा बना पृथ्वीराज तृतीय चौहान वंश का अन्तिम शासक था जो मुहम्मद गोरी के हाथों परास्त होकर मारा गया।

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