Sociology

संस्कृतिकरण की व्याख्या कीजिए।

संस्कृतिकरण – इस अवधारणा का प्रतिपादन सर्वप्रथम भारतीय समाजशास्त्रीय प्रो० एम० एम० श्रीनिवास ने किया था। “संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई नीच हिन्दू जाति या कोई जनजाति अथवा अन्य समूह किसी उच्च और प्रायः द्विजजाति की दिशा में अपने रीति-रिवाज कर्मकाण्ड, विचारधारा और जीवन पद्धति को परिवर्तित करते हैं।” संस्कृतिकरण की विशद् व्याख्या …

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परम्परागत सत्ता की व्याख्या कीजिए।

परम्परागत सत्ता – वेवर का विचार है कि आर्थिक जीवन में पायी जाने वाली संस्थागत अर्थव्यवस्था समाज की कुछ के लोगों को विशेष अधिकार या सत्ता प्रदान करती है। आर्थिक आधार पर सत्ता संस्थागत धारणा को विश्लेषण करते हुए वेबर ने सत्ता के तीन प्रकार या भेदों का उल्लेख किया है, जिसमें परम्परागत सत्ता भी …

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संघर्ष का सिद्धान्त (डेहरनडार्फ) की व्याख्या कीजिए।

संघर्ष का सिद्धान्त – डेहरेनडॉर्फ की मान्यता है कि संघर्ष का बीज प्रत्येक सामाजिक संरचना में सन्निहित होता है एवं समाज का प्रत्येक भाग निरन्तर परिवर्तित हो रहा है। सामाजिक संरचना में परिवर्तन वर्गों के बीच होने वाले संघर्षो के फलस्वरूप होते हैं। डेहरेनडार्फ के अनुसार- “संरचना में होने वाले परिवर्तन के विभिन्न ढंग वर्ग …

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प्रतिस्पर्द्धा की अवधारणा स्पष्ट कीजिए। इसकी विशेषता एवं स्वरूप की विवेचना कीजिए।

प्रतिस्पर्द्धा की अवधारणा – प्रतिस्पर्द्धा एक विश्वव्यापी असहयोगी सामाजिक प्रक्रिया है जो विरोधी व्यवहार के द्वारा व्यक्तियों को एक दूसरे के उद्देश्यों को पराजित करके अपने निजी स्वार्थों को पूरा करने का प्रोत्साहन है। प्रतिस्पर्द्धा की प्रक्रिया में ईर्ष्या, द्वेष और कभी-कभी शोषण का भाव भी निहित होने के कारण अधिकतर विद्वान ‘पृथक्करण की प्रक्रिया’ …

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औपचारिक और अनौपचारिक शिक्षा क्या है? दोनों में अन्तर स्पष्ट कीजिए।

औपचारिक व अनौपचारिक शिक्षा – पाठ्यक्रम के आधार पर शिक्षा के निम्न स्वरूप अथवा प्रकार है- (1) औपचारिक शिक्षा (Formal Education) औपचारिक शिक्षा, वह शिक्षा है जो विभिन्न औपचारिकताओं के साथ जानबूझ कर दी जाती है। यह शिक्षा एक निश्चित नियमानुसार क्रियाशील होती है तथा यह नियमित रूप से विधिवत प्रदान की जाती है। औपचारिक …

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शिक्षा का अर्थ, परिभाषा, उद्देश्य एवं विशेषताओं की विवेचना कीजिए।

शिक्षा का अर्थ, परिभाषा-शिक्षा का अर्थ संकुचित रूप में पुस्तकीय ज्ञान और पढ़ने-लिखने से लगाया जाता है परन्तु व्यापक रूप में शिक्षा का अर्थ सभी प्रकार के ज्ञान का संग्रह तथा मानव का चहुमुखी विकास है। शिक्षा को विविध विद्वानों ने अपने मतानुसार परिभाषित किया है, जिसका विवरण निम्नवत है- “सांस्कृतिक विरासत एवं जीवन के …

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अन्तः क्रियावाद (मीड) की व्याख्या कीजिए।

अन्तः क्रियावाद (मीड) – जे.एच. मीड ने “माइन्डसेल्फ एण्ड सोसाइटी” में जो सिद्धान्त प्रस्तुत किया है उससे प्रतीकात्मक अन्तक्रियावादी सिद्धान्त आधार पीठिका तैयार हुयी प्रतीकात्मक अन्तर्क्रियावादी सिद्धान्त के निर्माण हेतु मीड ने अपनी इस पुस्तक में मुख्य रूप से चार अवधारणाओं को रखा है। वे इन्हीं चारों अवधारणाओं के माध्यम से प्रतीकात्मक अन्तर्क्रियावादी सिद्धान्त का …

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मूल्य परिप्रेक्ष्य (आर०के० मुखर्जी) की व्याख्या कीजिए।

मूल्य परिप्रेक्ष्य – सामाजिक मूल्य सामाजिक घटनाओं को मापने का वह पैमाना है जो किसी घटना विशेष के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण रखता है। सामाजिक मूल्य प्रत्येक समाज के वातावरण है और परिस्थितियों की भिन्नता के कारण अलग-अलग होते हैं। ये मानव मस्तिष्क को विशिष्ट दृष्टिकोण प्रदान करते हैं जो सामाजिक मूल्य के निर्माता होते हैं। …

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मिश्रित अर्थव्यवस्था से आप क्या समझते हैं?

मिश्रित अर्थव्यवस्था वह प्रमुख प्रारूप है जिसका सम्बन्ध मुख्यतः विकासशील देशों से है। तृतीय विश्व में बहुत-से देश ऐसे है जो एक लम्बे समय तक उपनिवेशवादी शासन के कारण अपना विकास नहीं कर सके। एक ओर यह औद्योगिक विकास के दृष्टिकोण से पश्चिमी देशों की तुलना में बहुत पीछे रहे तो दूसरी ओर इन देशों …

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प्रकार्यवादी परिप्रेक्ष्य (श्रीनिवास) की व्याख्या कीजिए।

प्रकार्यवादी परिप्रेक्ष्य (श्रीनिवास) – श्रीनिवास ने अपनी पुस्तक “रिवीजन एण्ड सोसाइटी एमंग कुर्ग आफ साउथ इण्डियन 1952” में संस्कृतिकरण की अवधारणा प्रस्तुत किया और इसके द्वारा जाति प्रथा की संरचना एवं संस्तरण में होने वाले परिवर्तनों को समझाने का प्रयत्न किया गया है। आधुनिक भारत में निम्न जाति के सदस्य ऊँची जातियों के संस्कारों व …

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