भारतीय समाज के अध्ययन के विद्या अधिगम (परिप्रेक्ष्य) से आप क्या समझते हैं? इसकी उपयोगिता का वर्णन कीजिए।

विद्या अधिगम (Indological Perspective) –

विद्या अधिगम भारतीय विद्या अधिगम के अन्तर्गत भारतीय शिलालेखों, ऐतिहासिक अभिलेखों के तथ्यों, पारस्परिक व प्राचीन ग्रंथों के विश्लेषण के आधार पर भारतीय समाज की व्याख्या की जाती है। सामान्यतः ऐसी धारणा प्रचलित है कि भारतीय विद्या शास्त्रीय प्रवृत्ति या भारतीय विद्या अधिगम की विशेषता प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन है। भारतीय विद्या अधिगम के अन्तर्गत प्राचीन इतिहास संस्कृति, साहित्य, धर्म दर्शन एवं सभ्यता आदि का बोध होता है।

विद्या अधिगम की उपयोगिता

भारतीय समाजशास्त्र में भारतीय विद्या अधिगम की उपयोगिता का अध्ययन निम्न शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है। का अर्थशास्त्र तथा जैन साहित्य में पाते हैं तथा यह भारतीय समाज को समझने में इन ग्रंथों की उपयोगिता निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट करता है।

(1) भारत के सांस्कृतिक इतिहास का ज्ञान संभव

भारतीय विद्या अभिगम भारत के प्राचीन धार्मिक, पारस्परिक ग्रंथों का विश्लेषण करता है और इसके अन्तर्गत वह भारत के सांस्कृतिक इतिहास, विशेषकर, दर्शन, तत्त्वज्ञान आदि का विश्लेषण करता है। इस विश्लेषण के द्वारा ही वह भारत की जाति जैसी सामाजिक संस्थाओं का गहन व विस्तृत वर्णन कर पाता है। दूसरे शब्दों में, यह कहा जा सकता है कि जाति जैसी सामाजिक संस्थाओं का निर्माण करने में भारत का दार्शनिक चिंतन महत्वपूर्ण कारकों में से एक है तथा भारत के दार्शनिक चिंतन को समझने के लिए भारत के धार्मिक, आर्थिक तथा जैन साहित्य को समझना आवश्यक है। अतः स्पष्ट है, कि भारत की जाति जैसी संस्थाओं के सांगोपांग विश्लेषण के लिए, उनके समाजशास्त्रीय बोध पक्षों का वर्णन करने के लिए भारतीय शास्त्रीय ग्रन्थ वेद, उपनिषद्, स्मृति ग्रंथ, गृह-सूत्र, रामायण, महाभारत, कौटिल्य का अर्थशास्त्र तथा जैन साहित्य का अध्ययन व विश्लेषण अत्यन्त उपयोगी है।

(2) विशिष्ट अभिगम-

भारतीय विद्या अभिगम भारत के प्राचीन धर्म और दर्शन क प्रमाणित ग्रंथों के अध्ययन पर आधारित भारतीय समाज के निरुपण व विश्लेषण का एक विशिष्ट दृष्टिकोण रहा है। यह अधिगम भारतीय संस्कृति के मूल स्त्रोतों एवं परम्परागत जीवन मूल्यों में निहित को दोबारा प्रतिष्ठित करने की उत्कंठा से प्रेरित दृष्टि थी। लोक मानस एवं आचरण में जो आधारभूत मूल्य, विश्वास तथा दर्शन सदियों से प्रतिविम्बित हैं, उनके आधारभूत शास्त्र, धर्म, पुराण एवं दर्शन ग्रंथ आचरित व्यवहार प्रतिमानों का व्याकरण प्रस्तुत करते हैं। प्राचीन भारत में सामाजिक चिंतन, धर्म-दर्शन तथा लोक-जीवन के आचरित व्यवहार प्रतिमानों में एक यौगिक सहमति थी। जी. एस. परिये राधाकमल मुकर्जी, के. पी. चट्टोपाध्याय आदि भारतीय समाजशास्त्रियों के चिंतन लेखन की पद्धति विशेषतः भारतीय विद्या पर आधारित रही। अतः भारतीय विद्या अभिगम के माध्यम से अनेक भारतीय विद्वानों ने अपने आपको इन संस्थाओं के ऐतिहासिक विकास के अध्ययन में लगाया।

(3) प्राचीन सभ्यता की लिपि एवं भाषा के अध्ययन के माध्यम से वर्तमान समाज को समझने का प्रयास-

प्राचीन सभ्यता के पास अपनी भाषा एवं लिपि होती है जिसकी जड़े गहरी होती हैं और उसी आधार पर हम आज के समाज को समझ सकते हैं। भारत की प्राचीन सभ्यता की भाषा-संस्कृत, प्राकृत और पालि हैं। इन भाषाओं के अध्ययन के आधार पर हम आज के भारतीय समाज को समझ पाते हैं। इस कृषि से प्राचीन भारतीय साहित्य का अध्ययन अत्यन्त उपयोगी है। यूरोप के भारत विद्या-विशेषज्ञ सर विलियम जोन ने यह मत प्रकट किया कि इससे हम समस्त यूरोपीय भाषाओं के मूल को समझ सकते हैं। फलतः तुलनात्मक भाषा का अध्ययन प्रारम्भ हुआ, फिर तुलनात्मक धर्मो एवं कानूनों का अध्ययन प्रारम्भ हुआ, इसके बाद लोगों का ध्यान पुरातत्व की ओर गया, फिर प्राचीन लिपियों, विशेष तौर से ब्राह्मी लिपि का अध्ययन प्रारम्भ हुआ।

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(4) लोक मानस एवं व्यवहार प्रतिमान के प्रेरण स्रोत-

पुराण, धर्म-दर्शन एवं प्राचीन भारतीय साहित्य के मूल ग्रंथ, लोक मानस तथा व्यवहार प्रतिमान के प्रेरणा स्रोत है। इन ग्रंथों का समाजशास्त्रीय निर्वचन भारतीय समाजशास्त्र की एक प्रामाणिक सामग्री मानी जाती है। इस प्रकार भारतीय विद्या उपागम के माध्यम से इन ग्रंथों का समाजशास्त्रीय अध्ययन कर भारतीय सामाजिक मूल संरचना तथा परम्परागत साहित्य के सम्पर्क बिन्दुओं को साधा जा सकता है।

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