भारतीय जीवन क्रम में कर्म सिद्धान्त के महत्व को रेखांकित कीजिए।

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भारतीय जीवन क्रम में कर्म सिद्धान्त के निम्न लिखित महत्व है।

1. मानसिक सन्तुष्टि के द्वारा व्यक्तित्व का विकास

कर्म तथा पुनर्जन्म के सिद्धान्त ने प्रत्येक स्थिति में व्यक्ति के मानसिक जीवन को सन्तुलित बनाये रखने में योगदान दिया है। इस सिद्धान्त के कारण ही व्यक्ति सुख-दुःख, सफलता और असफलता, समृद्धता तथा निर्धनता जैसी सभी दशाओं में अपनी स्थिति से सन्तुष्ट रहकर सामाजिक व्यवस्था के प्रति निष्ठावान रहे हैं। वर्तमान भौतिकवादी विचारों ने व्यक्ति को मानसिक रूप से विकृत बनाकर उसके व्यक्तित्व के विकास में तरह-तरह से बाधाएं उत्पन्न की हैं लेकिन कर्म के सिद्धान्त ने व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करने की प्रेरणा देने के साथ ही उसे त्याग की ओर उन्मुख किया। यही कारण है कि सामाजिक, मानसिक और नैतिक आधार पर हमारे समाज के सदस्यों का व्यक्तित्व आज भी सबसे अधिक संगठित है। डॉ. राधाकृष्णन का कथन है कि यह सिद्धान्त ‘भविष्य के प्रति आशा तथा अतीत के प्रति विस्मृति का विश्वास दिलाकर व्यक्तित्व को संगठित रखता है।

2. सामाजिक संघर्षों का समाधान

कर्म की अवधारणा ने समाज के संघर्षों को कम से कम करने का सबसे अच्छा समाधान प्रस्तुत किया। सामाजिक संघषों का सबसे प्रमुख कारण अपनी स्थिति के प्रति असन्तोष महसूस करना और परिश्रम के बाद भी जीवन में असफल रहना है। कर्म के सिद्धान्त ने प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सामाजिक स्थिति के प्रति ही आश्वस्त नहीं किया बल्कि यह विश्वास भी दिलाया कि समाज में दुर्जनों को मिलने वाले सुख का कारण सामाजिक व्यवस्था का दोष नहीं बल्कि स्वयं उन व्यक्तियों के प्रारब्ध का फल है। इस विश्वास ने हमारे समाज की अनेक क्रान्तियों से रक्षा की है तथा असफलता की दशा में भी व्यक्ति को स्वधर्म के है पालन की प्रेरणा दी हैं।

3. नैतिक जीवन का विकास

कर्म का सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित है कि भौतिकता अन्त में व्यक्ति के दुःखों का ही कारण बनती है। इस सिद्धान्त ने सभी व्यक्तियों को विश्वास दिलाया कि नैतिक जीवन के द्वारा ही मोक्ष को प्राप्त किया जा सकता है। व्यक्ति को अपने कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है, इसलिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति दुष्कर्मों को छोड़कर पुण्य कर्म करे पुण्य कर्मों में ही वह शक्ति है जो व्यक्ति के प्रारब्ध को बदल सकती है। तथा आगामी जीवन में उसे समृद्धता प्रदान कर सकती है। वास्तविकता तो यह कि कर्म के सिद्धान्त के कारण ही भारतीय समाज में एक ऐसी नैतिकता का विकास हुआ जिसे ‘मानवीय नैतिकता’ कहा जा सकता है। कर्म और पुनर्जन्म सम्बन्धी विश्वासों के कारण कितने ही दुराचारी व्यक्ति सदचारों में लग गये। इस प्रकार कर्म के सिद्धान्त ने पारलौकिक न्याय का भय दिखाकर समाज में एक ऐसी नैतिकता को विकसित किया जिसकी सहायता से व्यक्ति का जीवन स्वयं ही नियन्त्रित बन गया।

4. समाज कल्याण का आदर्श

कर्म का सिद्धान्त व्यक्तिवादी नहीं है वरन् समष्टिवादी है। इसका तात्पर्य यह है कि बाह्य रूप से इसका सम्बन्ध व्यक्तिगत कर्तव्य भावना से होते हुए भी यह आन्तरिक रूप से सम्पूर्ण समाज के कल्याण से सम्बन्धित है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, इस सिद्धान्त का आधार निष्काम रूप से स्वधर्म कर पालन करना और सभी प्राणियों में समता का भाव रखना है। इसी को ‘ज्ञान’ कहा जाता है। ये दोनों ही आधार समाज कल्याण में वृद्धि करते हैं। निष्काम कर्मों के पारस्पारिक दायित्वों में सन्तुलन बना रहता है और समता के भाव से परोपकार में वृद्धि होती है। कर्म के सिद्धान्त में ‘त्याग’ और ‘आत्मसमर्पण’ की भावना समाज कल्याण के लक्ष्य से ही सम्बन्धित है। कर्मयोग के अन्तर्गत राग, मोह और द्वेष को समाप्त करने पर जो बल दिया गया है, उनका उद्देश्य भी सामाजिक संबंधों को कम से कम करके एक कल्याणकारी सामाजिक व्यवस्था को प्रोत्साहन देना है। इसी के फलस्वरूप भारतीय समाज एक कर्म प्रधान और कल्याणकारी समाज बन सका।

5. आशावादी विचारों का आधार

कर्म के सिद्धान्त ने प्रत्येक व्यक्ति को अपने कमों में सुधार करके आशावादी जीवन की प्रेरणा दी है। यदि व्यक्ति को यह विश्वास हो जाय कि उसके जीवन में किसी प्रकार का सुधार सम्भव नहीं है तब उसमें इतनी निष्क्रियता आ सकती है कि सामाजिक जीवन में वह किसी प्रकार का योगदान नहीं दे सकता। कर्म का सिद्धान्त जीवन को आशावादी बनाता है और प्रत्येक व्यक्ति में प्रेरणा का संचार करके उसे समाज का एक उपयोगी अंग बनाने में सहायता करता है। कर्म के सिद्धान्त का यह गत्यात्मक पक्ष (Dynamic aspect) है जिसके महत्व को सभी विद्वान स्वीकार करते हैं।

6. समस्त सामाजिक व्यवस्थाओं का आधार

सामाजिक रूप से कर्म का सिद्धान इतना अधिक महत्त्वपूर्ण है कि इसी की सहायता से भारतीय समाज की सभी सामाजिक व्यवस्थाओं को संगठित रखा जा सका है। कर्म से सम्बन्धित विश्वासों ने पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति में योगदान दिया है, सभी वर्णों के सदस्यों को अपनी-अपनी स्थिति के प्रति आश्वस्त करके उन्हें अपने दायित्वों को पूरा करने की प्रेरणा दी है, जीवन में कर्म के महत्व और इसके व्यावहारिक पक्ष को स्पष्ट किया है। विभिन्न आश्रमों की उपयोगिता को स्पष्ट करके व्यक्ति के सामने मोक्ष का सरलतम उपाय प्रस्तुत किया, विभिन्न संस्कारों के प्रति व्यक्ति के मन में आस्था उत्पन्न की है तथा आध्यात्मिकता के आधारभूत लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सभी का मार्ग निर्देशन किया है। इससे स्पष्ट होता है कि सम्पूर्ण हिन्दू सामाजिक जीवन कर्म के सिद्धान्त से इस प्रकार प्रभावित है कि छोटे से छोटे कार्य को भी कर्म के विश्वास से पृथक करके नहीं समझा जा सकता है।

7. पुनर्जन्म के भय का समाधान

प्रत्येक समाज में मृत्यु की कल्पना इतनी भयावह होती है कि इसके वास्तविक रूप को समझे बिना व्यक्ति को स्वधर्म के पालन की प्रेरणा दी गयी है। मनु के अनुसार सभी कर्म मन, वाणी और शरीर से उत्पन्न होकर व्यक्ति को अच्छे अथवा बुरे फल प्रदान करते है। मनुस्मृति की यह मान्यता है कि सांसारिक कर्मों से तो मनुष्य को दुःख ही मिलने की सम्भावना रहती है। व्यक्ति जब आत्मज्ञान के द्वारा सांसारिक बन्धन से मुक्ति प्राप्त कर लेता है तभी वह वास्तव में मोक्ष का अधिकारी होता है। आत्म-ज्ञान की प्राप्ति के लिए वेदाभ्यास, तप, ज्ञान और इन्द्रिय संयम आवश्यक है और यही ऐसे पुण्य कर्म हैं जिनमें पुनर्जन्म के बन्धन से छुटकारा मिलता है। व्यक्ति जो भी पाप करता है, उसके फलस्वरूप उसे भिन्न-भिन्न प्रकार का पुनर्जन्म प्राप्त होता है। व्यक्ति मन के द्वारा जो पाप करता है उसके फलस्वरूप उसे अन्त्यज जाति में जन्म मिलता है। दूसरे की वस्तु को लेने की इच्छा, किसी का अहित सोचना, परलोक में अविश्वास करना अथवा विषयों का चिन्तन करना मन के द्वारा किये गये पाप कर्म हैं। इसके अतिरिक्त वाणी द्वारा किये गये पाप कर्मों-जैसे असत्य, चुगली, निन्दा और अनर्गल बातें करने से व्यक्ति को पशु अथवा पक्षी की योनि प्राप्त होती हैं। जो व्यक्ति शरीर द्वारा पाप जैसे-हिंसा, व्यभिचार अथवा पराये धन पर अधिकार आदि करता है, उसे पेड़-पौधों तक की योनि प्राप्त होती है।

मगध राज्य के उत्कर्ष पर संक्षिप्त निबन्ध लिखिए।

पुण्य कर्म अथवा धर्मानुसार किये जाने वाले कर्म तीन प्रकार के होते हैं-सात्विक, राजस तथा तामस सात्विक कर्मों का सम्बन्ध निष्काम रूप से स्वधर्म का पालन करने से है, राजस कर्म ‘अर्थ’ से सम्बद्ध है जबकि तामस कर्म में ‘काम’ प्रधान रहता है। सात्विक कर्म करने वाले को देवत्व की गति मिलती है, राजस कर्म के लिए मनुष्य योनि और तामस कर्मों से स्थावर अथवा निकृष्ट योनि प्राप्त होती है। इस प्रकार स्वधर्म के द्वारा आत्मज्ञान को प्राप्त करना ही ऐसा कर्म है जो व्यक्ति को जन्म और पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा दिला सकता है। याज्ञवल्क्य स्मृति और शुक्रनीतिसार में भी कुछ संशोधनों के साथ मनुस्मृति के ही विचारों को स्वीकार कर लिया गया है। इस सम्बन्ध में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि मनुस्मृति में ज्ञान का आधार स्वधर्म पालन को माना गया है और स्वधर्म से तात्पर्य मुख्यतः व्यक्ति द्वारा अपने वर्ण-धर्म का पालन करने से है। इस प्रकार मनुस्मृति में प्रत्येक स्थान पर कर्म के सिद्धान्त को, वर्ण-व्यवस्था के औचित्य को प्रमाणित करने वाले एक महत्त्वपूर्ण साधन के रूप में प्रयुक्त किया गया है।

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