भारतीय जनसंख्या की प्रमुख विशेषताएं क्या है ? भारत की जनसंख्या नीति का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए।

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भारतीय जनसंख्या की प्रमुख विशेषताएं

भारतीय जनसंख्या की प्रमुख विशेषताएं भारत में जनसंख्या जनसंख्या की दृष्टि से संसार में भारत का स्थान चीन के बाद है। भारत का भू-क्षेत्र शसार के भू-क्षेत्र का लगभग 2.4 प्रतिशत हैं, लेकिन यहाँ पर रहने वाली जनसंख्य समस्त विश्व की जनसंख्या की 16.2 प्रतिशत हैं, और यहाँ की राष्ट्रीय आय विश्व की राष्ट्रीय आय की लगभग 1.2 प्रतिशत हैं कहने का अर्थ यह है कि भारतीय भूमि पर जनसंख्या का भाग अधिक हैं 1991 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 84.63 करोड़ थी। अनुमान हैं कि 1998 में जनसंख्या बढ़ कर 96.8 करोड़ हो गई थी। पहली जनगणना 1881 में हुई थी जिसके अनुसार उस समय जनसंख्या 25.4 करोड़ थी। इस प्रकार 116 वर्षों में जनसंख्या में लगभग 71.4 करोड़ की वृद्धि हुई। जनसंख्या में यह वृद्धि सभी दशकों में समान रूप से नहीं हुई है।

भारत में बीसवीं शताब्दी के पहले दो दशकों में जनसंख्या में साधारण वृद्धि हुई थी। परन्तु 1921 से जनसंख्या वृद्धि की दर में बराबर वृद्धि होती गई हैं इसी कारण से भारत के जनगणना कमिशनर ने 1921 को महान विभाजक वर्ष कहा है 1951 और 1961 के बीच तो जनसंख्या वृद्धि की वार्षिक दर 1.98 प्रतिशत थी जो भारतीय आयोजकों के लिए एक चिन्ता का कारण हो गई। 1961 और 1971 के बीच के वर्षों में जनसंख्या वृद्धि की दर लगभग 2.24 प्रतिशत वार्षिक रही थी। जिशेषज्ञों का विचार था कि इसके बाद परिवार नियोजन कार्यक्रम को सफलता मिलने के साथ-साथ जनसंख्या वृद्धि की दर नीचे आएगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 1981 की जनगणना के अनुमान के अनुसार 1971 और 1981 के बीच जनसंख्या वृद्धि की वार्षिक दर 2.23 प्रतिशत रही है। पिछले दशक में जनसंख्या वृद्धि की दर से थोड़ी ही कम थी। 1981-91 की अवधि में भी भारत की जनसंख्या वृद्धि की दर 2.1 प्रतिशत वार्षिक रही। इस तरह 1951 से 1991 तक 40 वर्षों में जिस तेजी से जनसंख्या में वृद्धि हुई, उससे जन सघनता 117 प्रति वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 274 प्रति वर्ग किलोमीटर हो गई। इस समय अनुमान हैं कि जन संघनता 314 प्रति वर्ग किलोमीटर हैं अतः इस समय देश में जनसंख्या विस्फोट’ की स्थिति हैं जो देश के आर्थिक विकास में बहुत बड़ी बाधा है।

जनसंख्या सम्बन्धी नीति

भारत के लिए अनुकूलतम जनसंख्या क्या है, यह तो निश्चित रूप से बता सकना कठिन हैं, लेकिन इसमें सन्देह नहीं हैं कि देश में जनसंख्या का जो भी आकार हैं और जिस दर से जनसंख्या बढ़ रही हैं वह आर्थिक विकास में निश्चय ही बाधक हैं भारत में इस समय जनसंख्या विस्फोट की स्थिति हैं इस पर नियन्त्रण पाने के लिए स्पष्ट नीति की आवश्यकता है। जेकब वाइनर का मत हैं कि “यह बहुत हतोत्साहित होने वाली बात हैं कि अति जनसंख्य की समस्या के हल के लिए कोई विश्वसनीय उपाय नहीं हैं अनेक समाजशास्त्रियों की जन्म नियन्त्रण में आस्था है और वे केवल इसे ही जनसंख्या की समस्या को हल करने के लिए एक कारगर उपाय मानते हैं परन्तु यह उपाय उसी अवस्था में सफलत होता है जब जनसाधारण की आय का स्तर बहुत ऊंचा हो और शिक्षा का व्यापक प्रसार हो।” भरत में ऐसी स्थिति नहीं है। भारत में परिवार नियोजन को सफल बनाना आसान नहीं हैं एस, चन्द्रशेखर के शब्दों में, “परिवार नियोजन के पक्ष में तर्क देना आसान हैं लेकिन उसे सफल बनाना कठिन है। अर्थव्यवस्था जितनी पिछड़ी होगी जन्म निरोध की आवश्यकता उतनी ही अधिक होगी।”

भारत में परिवार नियोजन को सरकारी नीति का अंग माना गया है। निश्चय ही जनसंख्या की समस्या का हल सन्तति निरोध के उपकरणों का उत्पादन बढ़ाकर नहीं हो सकता। इसके लिए लोगों में चेतना की आवश्यकता है। धर्म के आधार पर भारत में परिवार नियोजन का विरोध नहीं है इसलिए शिक्षा के प्रसार और अनुकूल आर्थिक दशाओं को उत्पन्न कर परिवार नियोजन के लिए अनुकूल वातावरण को तैयार किया जा सकता है पहली दो पंचवर्षीय योजनाओं की अवधि में सरकार द्वारा परिवार नियोजन के प्रति जनसाधारण की प्रतिक्रिया जानने के लिए कुछ अध्ययन किए गए थे जिनसे मालूम हुआ कि भारत में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में यद्यपि इसका व्यापक स्तर पर विरोध नहीं हैं फिर भी आम लोग परिवार को सीमित करने के लिए अधिक प्रेरित नहीं है। शहरों में अब भी सामान्यत: तीन बच्चों का होना और ग्रामीण क्षेत्रों में चार बच्चों का होना ठीक समझा जाता है। बच्चों के जन्म के बीच में तीन से चार वर्षे का अन्तर उचित माना जाता है। चार से अधिक बच्चों की माताएं और 35 से अधिक आयु वाली स्त्रियों परिवार नियोजन में अधिक रूचिलेती हैं। गांवों में भी यद्यपि परिवार के वृद्ध सदस्य परिवार नियोजन का विरोध नहीं करते, लेकिन संकोच के कारण युवा दम्पत्ति खुलकर इसमें रूचि नहीं दिखाते। परिवार नियोजन को सबसे अधिक सफलता शिक्षित और सम्पन्न वर्गों में मिली हैं मजदूर तथा किसानवर्ग के लोग कृत्रिम निरोधों को मुफ्त प्राप्त करना चाहते हैं शहरों में आवास की समस्या सन्तति निरोध के प्रेरकों में सबसे महत्वपूर्ण हैं विश्व बैंक के अनुमान से अब भारत में पुनरुत्पादनीय आयु के 43 प्रतिशत दम्पत्तियों तक परिवार नियोजन कार्यक्रम पहुंच गया हैं

जनसंख्या सम्बन्धी नीति का मूल्यांकन-

भारत में कई अन्य अल्प विकसित देशों की भांति ‘जनसंख्या विस्फोट’ की स्थिति हैं गुन्नार मिर्डल के अनुसार “इन देशों की जनसंख्या की वृद्धि

की दर नीची रखने का एकमात्र उपाय यह हैं कि जननक्षमता को रोका जाए। इस सम्बन्ध में सन्तोष अथवा ऊंची मृत्यु दर को सहन करना क्योंकि, इससे जनसंख्या वृद्धि की दर नोची रहती हैं, ठीक नहीं है।” तात्पर्य यह हैं कि जनसंख्या नियन्त्रण के लिए जन्म दर नियन्त्रण की दिशा में हर सम्भव कोशिश की जानी चाहिए। परन्तु स्वतन्त्रता के 50 वर्षों में भारत सरकार की नीति कहां तक दोषपूर्ण रही हैं यह निम्नलिखित आलोचनाओं से स्पष्ट हैं।

3.संतति निरोध के उपकरणों पर अनावश्यक जोर दिया जाना-

बी, आर, सेन के अनुसार ” भारत में समस्या को ठीक प्रकार से समझा ही नहीं गया है अब तक इस विश्वास के आधार पर कार्यक्रम बनाये गये हैं कि संतति निरोध उपकरणों का उत्पादन बढ़ाकर और प्रतिबंधक अवरोधों को प्रोत्साहन देकर ही समस्या को हल किया जा सकता है हमने जनसंख्या नीति पर कभी इस पहलू से विचार ही नहीं किया है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जनसाधारण के जीवन स्तर को ऊंचा उठाया जाए क्याकि उनकी गरीबी उन्हें बेरोक पुनरूत्पादन के लिए प्रेरणा देती हैं और यह वह वर्ग है जिसका जनसंख्या की समस्या को गम्भीर बनाने में सबसे ज्यादा योगदान है। भारतीय आयोजक तथा भारत सरकार शायद आर्थिक विकास और जनसंख्या वृद्धि के बीच में जो सम्बन्ध है, उसे भी सही प्रकार से समझ पाने में असमर्थ रहे हैं। यदि ऐसा न होता तो निवेश का स्वरूप भिन्न होता और कृषि पर आधारित उद्योगों को प्राथमिकता क्रम में ऊंचा स्थान दिया गया होता।”

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2.परिवार नियोजन कार्यक्रम में अनिवार्य बंध्याकरण की अनुपयुक्तता

इसमें सन्देह नहीं हैं कि जन्म दर को नीचे लाना राष्ट्रीय दृष्टि से काफी आवश्यक हैं और इसे सरकारी आयोजन में स ऊंची प्राथमिकता मिलनी चाहिए। दरअसल विकास और परिवार नियोजन कार्यक्रम प्रतियोगी न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं जो मिलकर जन्म दर को नीचे ला सकेंगे। लेकिन प्रवीण विसारिया परिवार नियोजन के लिए अनिवार्य बंध्याकरण को ठीक नहीं मानते।

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