भारत में पंचायती राज संस्थायें ।

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पंचायती संस्थाओं का तात्पर्य ग्रामीण प्रशासनिक संस्थाओं से है। भारत में प्राचीनकाल से ही पंचायती संस्थाओं का अस्तित्व रहा है, क्योंकि भारत के ग्रामों के विकास के बिना देश की उन्नति असम्भव है और ग्रामों का विकास ग्रामीण प्रशासन द्वारा ही सम्भव है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् जब संविधान निर्माताओं पंचायती राज की उपेक्षा कर दी तो इसका कड़ा विरोध किया।

स्विस संविधान में विविधता में एकता दिखाई पड़ती है। व्याख्या कीजिए।

उन्होंने कहा, “आजादी में जनता की इच्छा मुखरित होनी चाहिए, इसलिए पंचायतों को न केवल पुनः जीवित किया जाना चाहिए, बल्कि इन्हें अधिक से अधिक अधिकार दिए जाने चाहिए।” इस कथन की व्यापक प्रतिक्रिया के फलस्वरूप के नीति निदेशक सिद्धान्तों में अनुच्छेद एवं राज्य सूची के अन्तर्गत राज्यों को पंचायतों के गठन का निर्देश दिया गया। सन् 1957 में बलवन्त राय मेहता की में एक समिति का गठन किया गया और समिति ने अपनी रिपोर्ट में अन्त में यह निष्कर्ष निकाला।

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