बेंथम के उपयोगितावाद का मूल्यांकन कीजिये।

बेंथम के उपयोगितावाद – उपयोगितावाद बेंथम के दर्शन की आधारशिला है। वह तत्कालीन प्रचलित नैतिकता की वैयक्तिक, ईश्वरीय, धर्मशास्त्रीय मान्यताओं का खण्डन करके इसके स्थान पर सुखवाद पर विश्वास करता है और यह मानता है कि सुख और दुःख, दूसरे शब्दों में प्रसन्नता और पीड़ा मनुष्य के दो सार्वभौम शासक हैं। स्वयं बेंथम के शब्दों में ‘प्रकृति’ ने मानव को सुख-दुःख नामक दो प्रभुत्वपूर्ण स्वामियों के शासन में रखा है। हमें क्या करना चाहिए या हम क्या करें यह केवल वह ही निश्चित कर सकते हैं इस सिद्धान्त को जीवन के हर क्षेत्र पर लागू करते हुए कहता है कि राज्य विधि निर्माण एवं किसी संस्था का उद्देश्य व्यक्ति को सुख प्रदान करना है जिसका निर्धारण अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख के सिद्धान्त पर किया जाना चाहिए।

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अतः वही राज्य, निधि या संस्था उपयोगी है जो ‘अधिकतम व्यक्तियों को अधिकतम सुख प्रदान करे। आलोचकों ने बेंथम के इस सिद्धान्त को अति भौतिकवादी एवं निम्न श्रेणी का दर्शन माना है। परन्तु उपयोगितावाद ने राजनीतिक, सामाजिक एवं कानूनी क्षेत्र में व्यापक स्तर पर सुधार प्रक्रिया को प्रोत्साहन दिया।

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