बहुल संस्कृतिवाद तथा सांस्कृतिक सापेक्षवाद में अन्तर स्पष्ट कीजिए।

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बहुल संस्कृतिवाद तथा सांस्कृतिक सापेक्षवाद

सांस्कृतिक सापेक्षवाद की प्रकृति बहुलवाद तथा बहुल-संस्कृतिवाद से बिल्कुल भिन्न है। बहुलवाद तथा बहुसंस्कृतिक सम्बन्ध एक ऐसी सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक व्यवस्था से है जिसमें एक-दूसरे से भिन्न आर्थिक और सांस्कृतिक विशेषताओं वाले लोग सहभाग करते हैं। दूसरी ओर सांस्कृतिक सापेक्षवाद की अवधारणा को मानवशास्त्रियों द्वारा इस दृष्टिकोण से विकसित किया गया जिससे विभिन्न संस्कृतियों की एक-दूसरे से तुलना की जा सके। संसार की अनेक संस्कृतियों का अध्ययन करने के बाद सांस्कृतिक सापेक्षवाद के द्वारा यह स्पष्ट किया गया कि विभिन्न संस्कृतियों में व्यवहार के मानदण्ड एक-दूसरे से भिन्न होते हैं तथा इन मानदण्डों में किसी को दूसरे की तुलना में उच्च अथवा निम्न नहीं कहा जा सकता।

एक संस्कृति में व्यवहार के जिन तरीकों को नैतिक माना जाता है, दूसरी संस्कृति के मानदण्ड उसी व्यवहार को अनैतिक मान सकते हैं। विभिन्न संस्कृतियों की परम्पराओं, प्रथाओं, कानूनों और व्यवहार के नियमों पर भी यही बात लागू होती है। इस आधार पर सांस्कृतिक सापेक्षवाद किसी ऐसे सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता जिसके आधार पर किसी संस्कृति को दूसरे की तुलना में अधिक या कम उन्नत कहा जा सके।

योगासनों के भेद बताइए तथा उससे क्या लाभ होता है? वर्णन कीजिए?

सांस्कृतिक सापेक्षवाद की मान्यता यह है कि एक विशेष संस्कृति से सम्बन्धित लोगों के व्यवहार प्रतिमानों को समझकर दूसरी संस्कृतियों के व्यवहार प्रतिमानों से केवल उनकी मित्रता को स्पष्ट किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में किसी भी संस्कृति को दूसरी से उच्च अथवा निम्न नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार सांस्कृतिक सापेक्षवाद विभिन्न सांस्कृतिक समूहों के अध्ययन की एक प्रणाली है जबकि बहुलवाद और बहुल-संस्कृतिवाद का सम्बन्ध किसी समाज की सांस्कृतिक संरचना के विश्लेषण से है।

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