बाल-श्रम की समस्या पर संक्षिप्त निबन्ध लिखिए।

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प्रस्तावना- आज हमारा देश अनेक समस्याओं का घर बन चुका है या फिर यूँ कहे कि जितने लोग उतनी ही समस्याएँ हमें मुंह चिढ़ा रही है। आज हमारा देश खाद्य-समस्या, महँगाई की समस्या, बेकारी की समस्या, दहेज-प्रथा की समस्या, जाति प्रथा की समस्या, क्षेत्रवाद की समस्या, साम्प्रदायिकता की समस्या, आरक्षण की समस्या आदि अनगिनत समस्याओं से जूझ रहा है जो हमारे देश की प्रगति के आड़े आ रही हैं। इन सभी में बाल-श्रम की समस्या भी हमारे देश की एक ज्वलन्त समस्या बन चुकी है।बाल-श्रम की समस्या

बाल-श्रम की समस्या के कारण

जब 14 वर्ष से कम आयु के बच्चे किसी के भी घर, दफ्तर, फैक्ट्री या रेस्तरों आदि में काम करते हैं, तो वे बाल श्रमिक कहलाते हैं। स्वच्छन्द रूप से खाने-पीने, पढ़ने-लिखने की उम्र में बच्चे दिन रात मेहनत-मजदूरी करने को मजबूर हैं। मासूम चेहरों पर बालसुलभ मुस्कान के स्थान पर अवसाद की गहरी रेखाएँ घर कर लेती है। फूल की भाँति ताजा सुगन्ध से महकने योग्य फेफड़ों में धूल, धुआं भरकर उसे दूषित कर चुका होता है। गरीबी जन्य बाल मजदूरी करने की विवशता ही इसका एकमात्र कारण मानी जाती है ऐसे बाल मजदूर कई बार भय से तो कई बार मजबूरीवश कार्य करते हैं।

इसके अतिरिक्त अशिक्षा बाल-श्रम का सबसे मुख्य कारण है। अशिक्षित माँ-बाप बच्चे तो पैदा करते रहते हैं परन्तु उनका पालन-पोषण करने के लिए उनके पास पर्याप्त धन नहीं होता, ऐसे में वे मजबूरीवश अपने बच्चों को काम पर भेजते हैं। अशिक्षा के कारण ये लोग सोचते हैं कि बच्चे तो भगवान की देन होते हैं इसलिए इन पर रोक नहीं लगानी चाहिए। हमारे देश में तो वैसे भी निर्धनता बहुत है इसीलिए पैसे की खातिर वे लोग अपने बच्चों से काम करवाते हैं।

आज छोटे-छोटे बालक मजदूरी करते हुए घरों, दावों, चाय घरों, छोटे ‘होटलों आदि में तो दिखते ही हैं, साथ ही छोटी-बड़ी फैक्टरियों के अन्दर भी इन्हें मजदूरी का बोझ ढोते हुए देखा जा सकता है। काश्मीर का कालीन उद्योग, दक्षिण भारत का माचिस एवं पटाखा उद्योग, गुजरात, महाराष्ट्र एवं बंगाल का बीड़ी उद्योग पूर्णतया बाल श्रमिकों पर ही आधारित है। इतने छोटे-छोटे बच्चे इतनी सफाई से काम करते हैं कि देखकर भी आश्चर्य होता है। इन स्थानों पर इन बच्चों से चौदह-पन्द्रह घंटे काम लिया जाता है तथा बदले में बहुत कम वेतन दिया जाता है। इन्हें अन्य कोई सुविधा नहीं दी जाती है। न तो इनके स्वास्थ्य का ध्यान रखा जाता है, न खाने-पीने के लिए ही कुछ दिया जाता है। ढावों, चाय की दुकानों इत्यादि में तो इन बाल-श्रमिकों की दशा और भी दयनीय है। वहाँ पर इन्हें बचा-कुचा झूठा भोजन करना पड़ता है। दिन-रात वर्तन धोकर, बर्तन उठाकर, दूसरों की सेवा कर ये बेचारे इतने थक जाते हैं कि वहीं बैचों पर सो जाते हैं। सुबह जल्दी उठकर इन्हें फिर वही काम करना पड़ता है। कितने ही मालिक तो इनके साथ बहुत क्रूर व्यवहार करते हैं। इन्हें गालियाँ देते हैं तथा मारपीट भी करते हैं। अर्थात् ये बाल-श्रमिक बहुत दयनीय जीवन जीते हैं या फिर धरती पर रहकर नरक भोगते हैं।

बाल मजदूरों का एक अन्य वर्ग भी है। कन्धे पर लम्बा सा प्लास्टिक का झोला लटकाकर सड़क पर पड़े गन्दे फटे कागज, पॉलिथीन या प्लास्टिक के टुकड़े आदि इकट्ठे करते दिखाई पड़ते हैं। ये बच्चे कूड़ेदानों में से लोहे, टिन, प्लास्टिक आदि की वस्तुएँ ढूँढते हैं। ये सब चीजें चुनकर ये कबाड़खानों पर जाकर सामान बेचकर पैसा कमाते हैं और अपना पेट भरते हैं।

बाल मजदूरों के आँकड़े

प्राप्त आँकड़ों के अनुसार हमारे देश के विभिन्न राज्यों में इनकी संख्या अलग-अलग हैं। आन्ध प्रदेश में करीब 30 लाख, महाराष्ट्र में 20 लाख, कर्नाटक में 13 लाख, गुजरात में 12 लाख, राजस्थान में 26 लाख, पश्चिम बंगाल में 3 लाख तथा दिल्ली में लगभग 2 लाख के करीब बाल-श्रमिक काम करते हैं। अब ध्यान देने योग्य बात है कि ये संख्याएँ इन राज्यों के स्कूली शिक्षा से सम्बन्ध रखती है।

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लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि ये बाल मजदूर आखिर उत्पन्न कहाँ से होते हैं? इसका सीधा सा उत्तर है-ये बाल श्रमिक गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले घर-परिवारों से आया करते हैं। लेकिन कुछ बाल-श्रमिक ऐसे भी होते हैं जो गुमराह कर दिए जाते हैं। ये बच्चे पढ़ाई में मन न लगने या फेल हो जाने के भय से घर से भाग जाते हैं और फिर सड़कों पर भटकते हैं तथा मजबूरीवश बाल मजदूर बन जाते हैं।

समस्या का समाधान

कोई भी समस्या ऐसी नहीं है, जिसका समाधान न ढूँढ़ा जा सके, बस जरूरत है तो दृढ़-संकल्पता की। अमीर वर्गीय लोगों को चाहिए कि वे ऐसे बच्चों का शोषण न करें वरन् उनके पढ़ने लिखने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले। इसके अतिरिक्त अशिक्षित वर्ग में जागरुकता लानी होगी कि वे ज्यादा बच्चे पैदा करके अपने ऊपर बोझ न बढ़ाए तथा अपने बच्चों को पढ़ाएँ जिससे वे बाल-मजदूर न बने। सरकार की ओर से भी ऐसे बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी ली जानी चाहिए।

उपसंहार-देश के भविष्य कहे जाने वाले बच्चों को मजदूर बनाना वास्तव में अमानवीय कृत्य है। हालाँकि सरकार की ओर से इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है, परन्तु आज भी धनी वर्ग ऐसे बच्चों का भरपूर शोषण कर रहा है। यह मानवता के नाम पर कलंक है।

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