अवकाश के लिए शिक्षा एवं अवकाश की अवधारणा स्पष्ट कीजिए।

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अवकाश के लिए शिक्षा

प्राचीन काल मध्यकाल और आधुनिक काल में कार्याधिक्य की प्रशंसा की जाती रही है। काम अधिक करने वाले व्यक्ति सभी को प्रिय होते हैं। परन्तु फिर भी इतनी व्यस्तता और काम करने के घण्टे निश्चित होने के कारण उन्हें अवकाश भी पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है। अतः अब जीवन की एक महत्वपूर्ण समस्या यह है कि अवकाश का सदुपयोग किस प्रकार किया। जाये। इस दृष्टिकोण को सामने रखते हुए बहुत से विचारकों का यह मत है कि शिक्षा का एक उद्देश्य अवकाश के लिए सदुपयोग के लिए व्यक्ति को तैयार करना होना चाहिए। आज सभी शिक्षाशास्त्री इस बात से सहमत है कि विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं समाज शिक्षा केन्द्रों पर अवकाश के लिए शिक्षा दी जानी चाहिए इसके द्वारा व्यक्ति के व्यक्तित्व विकास में सहायता मिलती है।

अवकाश की अवधारणा

अवकाश का आशय फुरसत के समय से है। उस फुरसत के समय से जब व्यक्ति कोई कार्य करने के लिए बाध्य नहीं होता और स्वेच्छापूर्वक उस समय को व्यतीत करने में स्वतंत्राॅ होता है। अवकाश का अर्थ एवं महत्त्व समझने के पूर्व इस प्रत्यय से अवगत होना आवश्यक है। कि अवकाश है क्या? इस सन्दर्भ में विद्वानों ने अपने विचार प्रस्तुत किए, जो निम्नलिखित हैं।

रंगनाथन के अनुसार, “अवकाश का तात्पर्य ऐसे समय से है जिसमें व्यक्ति अपनी शारीरिक, आर्थिक, स्वास्थ्य सम्बन्धी तथा आध्यात्मिक शक्तियों के वशीभूत होकर किसी कार्य को न करे।”

इडासावेन के अनुसार, “अवकाश का तात्पर्य ऐसी स्वतंत्र क्रियाओं से है ये जीविकोपार्जन के लिए नहीं की जाती है।”

एडिथ व्हार्टन के अनुसार, “अवकाश सदैव सम्पत्ति को सौन्दर्य में परिवर्तित करने में लगा रहता है। यह सौन्दर्य श्रेष्ठ स्थापत्य कला, श्रेष्ठ चित्रकला और श्रेष्ठ साहित्य व्यक्त होता है। “

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि मानव जीवन में अवकाश न केवल आवश्यक वरन् लाभदायक भी है। अवकाश के अर्थ की विस्तृत व्याख्या करने की आवश्यकता नहीं है। केवल इतना कह देना ही पर्याप्त है कि व्यक्ति को अपनी जीवन सम्बन्धी कार्यों को करने के बाद जो फुरसत का समय मिलता है। वही अवकाश है। वर्तमान युग में विज्ञान ने ऐसी-ऐसी आश्चर्यजनक मशीनों का आविष्कार कर दिया है। जिनके प्रयोग से आज का मानव कम-से-कम समय में अधिक-से-अधिक कार्य कर लेता है। फलस्वरूप अब सभी लोगों को पर्याप्त मात्रा में अवकाश मिलने लगा है। ऐसी दशा में अवकाश काल के सदुपयोग करने की समस्या एक महत्वपूर्ण समस्या बन गई है, आज मनुष्य उस अवकाश काल का सदुपयोग न करके विध्वंसकारी उपद्रवों में लीन हो जा रहा है और समाज व राष्ट्र के सामने विकट समस्या उत्पन्न होती जा रही है। अतः आवश्यकता है इस समस्या से निपटने की।

अवकाश के सदुपयोग के लिए शिक्षा की आवश्यकता

अवकाश एक वरदान है किसी देश की सभ्यता और संस्कृति का ज्ञान इससे प्राप्त किया जा सकता है कि उस देश के निवासी अवकाश का समय कैसे बिताते हैं। वास्तविकता तो यह है कि अवकाश का मानव जाति के साथ-साथ जन्म हुआ। वर्तमान काल में मनुष्यों को प्राचीनकाल की अपेक्षा कहीं अधिक अवकाश मिलने लगा है। मशीनी सभ्यता के आधुनिक काल की उपज अवकाश, 20वीं शताब्दी की एक समस्या है, मशीनीकरण से व्यक्ति के पास अधिक अवकाश मिलने लगा यद्यपि कुछ शताब्दियों पूर्व यह स्थिति नहीं थी। अतः इसका सदुपयोग कैसे किया जाय यह एक जटिल समस्या है।

अपने देश में यह बात अधिकांशतः पायी जाती है कि नागरिक अपने अवकाश का सदुपयोग नहीं करते बल्कि अवकाश के दिन गपशप मारकर, ताश-शतरंज खेलकर, सोकर या इधर-उधर घूम कर बिता देते हैं। कुछ ही प्रतिशत व्यक्ति हैं जो उसे सफलतापूर्वक व्यतीत करते हैं। लोग अपने अवकाश का सदुपयोग क्यों नहीं कर पाते ? यह इसलिए नहीं कर पाते क्योंकि उन्हें इसको सही शिक्षा नहीं मिलती। कुछ लोग अवकाश का महत्व मानते हुए भी आलस्यवश उसे समाप्त करते रहते हैं और इससे लाभ नहीं उठा पाते।

समाजशास्त्र एवं मानवशास्त्र मध्य सम्बन्ध स्पष्ट कीजिए

उपर्युक्त बातों से यह स्पष्ट होता है कि लोगों को शिक्षा द्वारा यह बताया जाये कि वह अपने अवकाश का सदुपयोग कैसे करें तथा वे किस प्रकार अपना शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं अध्यात्मिक विकास कर अपनी आर्थिक स्थिति में सुधार कर राष्ट्रीय समृद्धि में सहयोग प्रदान कर सकते हैं।

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