अरस्तू के न्याय सम्बन्धी विचार की विवेचना कीजिए।

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अरस्तू के न्याय सम्बन्धी विचार – अरस्तू ने कानून के अर्थ की अति विस्तृत व्याख्या की है। वह कानून को उन सब सिद्धान्तों का संग्रह मानता है, जो समाज और राज्य में निवास करने वाले, व्यक्तियों को एक निश्चित दिशा प्रदान करते हैं। वह कानून को न्याय का आधार, विवेक का पर्यायवाची और नैतिकता का राजनीतिक प्रतिरूप मानता है। उसका कहना है कि न्याय और नैतिकता व्यक्ति और राज्य दोनों के लिए समान रूप से अनिवार्य है। अतः दोनों को अपने विवेक के अनुसार कार्य करना आवश्यक है। इस प्रकार कानून और विवेक में कोई अन्तर नहीं रह जाता।

अरस्तू का मत है कि मनुष्य बहुधा अनैतिक और असामाजिक कार्य करता है। उसके ये कार्य अच्छे जीवन में बाधा उत्पन्न करते हैं। कानून उसके कार्यों को नैतिक, सामाजिक और न्यायोचित परिधि में रखकर उसको अच्छा जीवन व्यतीत करने में सहायता देता है। अच्छा जीवन ही राज्य का लक्ष्य है। कानून इस लक्ष्य की प्राप्ति को सम्भव बनाता है।

सार रूप में, अरस्तू का विचार है कि कानून- व्यावहारिक जीवन में प्रयोग किया जाने वाला शुद्ध विवेक या मानव-इच्छा से अप्रभावित विवेक है। अपने इस विचार को परिभाषा का रूप देते हुए अरस्तू ने लिखा है- “कानून की परिभाषा (ईश्वर और विवेक की पवित्र वाणी के समान) सब कामनाओं से रहित विवेक के रूप में की जा सकती है।” इस प्रकार, अरस्तू का मत है कि राज्य और समाज में शान्ति और सुरक्षा व्यवस्था और अनुशासन को बनाये रखने के लिए कानून परम आवश्यक है कि इसकी अनुपस्थिति में राज्य और समाज की एकता का नष्ट होना अनिवार्य है।

बार्कर के शब्दों में, “अरस्तू सामान्य रूप में और सिद्धान्त रूप में कानून की प्रभुसत्ता का अटल अविचल समर्थक था।”

अरस्तू ने कानून की प्रभुसत्ता को श्रेष्ठ शासन का चिन्ह माना है। इसका कारण बताते हुए सेबाइन ने लिखा है- “राज्य में संवैधानिक शासन का इस बात से घनिष्ठ सम्बन्ध है कि वह सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति द्वारा शासित हो, या सर्वश्रेष्ठ कानूनों के द्वारा क्योंकि जो शासन अपने प्रजाजनों की भलाई के लिए होता है, वह कानून के अनुसार भी होता है। इसलिए अरस्तू ने कानून की सर्वोच्चता को श्रेष्ठ शासन का चिन्ह माना है।

बार्कर का मत है कि, “अरस्तू जिस कानून को सर्वोच्च पद पर प्रतिष्ठित करता है, वह संहिता का कानून नहीं है वरन् प्रथा पर आधारित लिखित और अलिखित कानून है, जिसका विकास राज्य के विकास के साथ हुआ।”

अरस्तू के अनुसार कानून निष्पक्ष, बुद्धि व तृष्णारहित विवेक की अभिव्यक्ति है। निष्पक्ष बुद्धि वाले समस्त कानून प्राकृतिक होते हैं। ये सब मनुष्यों के लिए समान होते हैं। किसी भी राज्य के कानून वहाँ के सामाजिक अनुभव तथा सर्वोत्तम सामूहिक बुद्धि का परिचय देते हैं। अरस्तू का मत है कि कानून को लागू करने का अधिकार केवल व्यवस्थापक का ही होना चाहिए। अरस्तू का यह भी कहना है कि किसी देश के कानून उसके संविधान के अनुकूल ही होते हैं।

अरस्तू के न्याय सम्बन्धी विचार

अरस्तू का सर्वव्यापी न्याय की धारणा में विश्वास है। वह न्याय को राज्य का मुख्य आधार मानता है। प्लेटो के समान वह न्याय को मनुष्य से परे नहीं मानता है। उसका कथन है कि व्यवहार में न्याय को न्याय संगत विधि द्वारा ही प्रभावपूर्ण बनाया जा सकता है, चाहे हम न्याय को पुरस्कार के रूप में देखें अथवा दण्ड के रूप में, पदों और अधिकारों के वितरण के रूप में, या आचरण या तौल नाप सम्बन्धी मानदण्डों को स्थापित करने के रूप में।

इस प्रकार अरस्तू कानून को न्याय से श्रेष्ठतर स्थान प्रदान करता है। वह उसी न्याय को सर्वश्रेष्ठ मानता है, जो व्यक्ति और व्यक्ति में किसी प्रकार का अन्तर नहीं करता है। ऐलेन के शब्दों में- “अरस्तू के लिए सर्वश्रेष्ठ न्याय वही है, जो सब नागरिकों को उपलब्ध हो और जो सबको कानून के सामने बराबर माने।”

प्लेटो और अरस्तू दोनों ने ‘न्याय’ शब्द का प्रयोग बहुत कुछ एक ही अर्थ में किया है। प्लेटो की ‘रिपब्लिक’ का दूसरा शीर्षक है- ‘Concerning Justice’ अर्थात् ‘न्याय के सम्बन्ध में’ फास्टर के अनुसार- ‘प्लेटो ने ‘न्याय’ शब्द का प्रयोग ‘नैतिकता’ के अर्थ में किया है। अरस्तू ने अपनी पुस्तक, ‘ऐथिक्स’ (Ethics) में ‘न्याय’ के लिए यूनानी शब्द ‘डिकायोसीन’ (Dikaiosyne) का प्रयोग किया है। इस शब्द का अंग्रेजी रूपान्तर किया गया है (Justice) अर्थात् न्याय बार्कर के अनुसार अरस्तू ने ‘न्याय’ शब्द का प्रयोग ‘साधुता’ (Righ teousness) के अर्थ में किया है।

इस प्रकार अरस्तू ने ‘न्याय’ शब्द का प्रयोग व्यापक अर्थ में किया है। इस अर्थ का स्पष्टीकरण करते हुए वार्कर ने लिखा है ‘अरस्तू के लिए ‘न्याय’ कानूनी न्याय’ से कुछ अधिक है। इसमें कुछ नैतिक विचार सम्मिलित हैं, जो ‘साधुता’ शब्द में निहित है।

अरस्तू ने अपनी न्याय की धारणा को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि सब कलाओं और विज्ञानों का अन्तिम उद्देश्य किस प्रकार भलाई होता है सब कलाओं में श्रेष्ठ है- राजनीति की कला और विज्ञान इसका अन्तिम उद्देश्य है सबसे महान और सबसे उत्तम भलाई। यही भलाई न्याय है। अरस्तू के शब्दों में, “राजनीतिक क्षेत्र में मलाई है न्याय और यह न्याय है सर्वसाधारण का सामान्य हित।”

अरस्तू ने अपने न्याय सिद्धान्त की विधि व्याख्या ‘इथीक्स’ (Ethics) नामक ग्रन्थ में की है। प्रचलित प्रथाओं के आधार पर न्याय के दो विभाग किये जा सकते हैं

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(1 ) वितरणात्मक न्याय

प्रत्येक व्यक्ति को उसके उपयुक्त ही कार्य दिया जाये, यही वितरणात्मक न्याय कहलाता है। प्रत्येक तंत्र में ‘उपयुक्त’ शब्द का अर्थ भिन्न लगाया जाता। है। जैसे- धनिकतंत्र में उपयुक्तता का आधार धन माना जाता है। धन के आधार पर ही जनता को शासनाधिकार वितरित किये जाते हैं। निर्धन वर्ग को शासन में बहुत कम स्थान प्राप्त होते हैं।

(2) सुधारात्मक न्याय

सुधारात्मक न्याय का सम्बन्ध व्यवसायों, जैसे- बिक्री, किराया, जमानत देना आदि से होता है।

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