अनुसूचित जातियों की प्रमुख समस्याओं पर प्रकाश डालिये।

0
1

अनुसूचित जातियों की प्रमुख समस्या

अनुसूचित जातियों की समस्या वर्तमान समय में विधिक रूप से बनाए गए कानूनों एवं विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के कारण भारत में अस्पृश्यता को समाप्त करने में विशेष सहायता प्राप्त हुई जिसके फलस्वरूप आज अश्पृश्यता को एक कंलक के रूप में देखा जाता है। परन्तु इसके बाद भी यह सच है कि धर्म की आड़ में इतने सालों से फलने-फूलने वाली परम्पराओं की जड़े इतनी गहरी हो गयी है कि उन्हें एकाएक समाप्त नहीं किया जा सकता इसमें कुछ वक्त तो अवश्य ही लगेगा।

यही कारण है कि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दलित अनुसूचित जातियों की समस्याएँ आज भी काफी गम्भीर बनी हुई है। इन समस्याओं को दो भागों में विभाजित करके समझा जा सकता है

  • (1) परम्परागत समस्याएँ तथा
  • (2) बर्तमान समस्याएँ।

दलितों की परम्परागत समस्याएँ दलित जातिको परम्परागत समस्याओं को निम्न भामें विभाजित किया जा सकता है

(1) धार्मिक समस्याएं-

अनुचित जातियों को अपवित्र मानकर उन्हें किसी तरह के धार्मिक आचरण करने की अनुमति नहीं दी गयो। केवल मन्दिरों में प्रवेश करने पर ही कठोर प्रतिबन्ध नहीं लगाए गए बल्कि उनके लिए धर्मग्रन्थों का पाठ सुनना भी वर्जित कर दिया गया। मनुस्मृति में यह व्यवस्था दी गयी कि अस्पृश्य जातियों को न तो देवताओं का प्रसाद दिया जाय, न उनके सामने पवित्र विधान की व्याख्या की जाय और न ही उन पर प्रायश्चित करने का भार डाला जाए। हिन्दू जीवन में जिन 16 प्रमुख संस्कारों को आवश्यक समझा जाता है, इन जातियों को उन संस्कारों को पूरा करने की भी अनुमति नहीं दी गयी। यह मान लिया गया कि जो जातियाँ जन्म से ही अपवित्र है, उन्हें संस्कारों के द्वारा शुद्ध नहीं किया जा सकता।

(2) सामाजिक समस्याएं

दलित जातियों की सामाजिक समस्याओं का सम्बन्ध उन निर्योग्यताओं से है जिनके अनुसार उन्हें विभिन्न सामाजिक सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए अयोग्य मान लिया गया। इन जातियों को सवर्ण हिन्दुओं के साथ सम्पर्क रखने तथा सवर्ण जातियों द्वारा उपयोग में लायी जाने वाली वस्तुओं का उपयोग करने से वंचित कर दिया गया। सार्वजनिक कुओं, तालाबों और पार्कों का उपयोग करने की उन्हें अनुमति नहीं दी गयी। मनुस्मृति में यह व्यवस्था दी गयी कि अस्पृश्य जाति के लोग गाँव के बाहर रहेंगे। उन्हें शिक्षा के अधिकार से वंचित कर दिया गया। यहाँ तक कि सवर्ण व्यक्ति नाई, धोबी और कहार जैसी जिन निम्न जातियों से सेवाएँ लेते थे, उन जातियों को भी अस्पृश्य जातियों के सम्पर्क से बचने के निर्देश दिए गए।

(3) राजनीतिक समस्याएं

राजनीतिक क्षेत्र में भी अनुसूचित जातियों की समस्याओं का रूप बहुत गम्भीर रहा। इन जातियों को शासन के काम में किसी भी तरह का हस्तक्षेप करने, कोई सुझाव देने, सार्वजनिक सेवाओं के लिए नौकरी पाने अथवा न्याय पाने का कोई अधिकार नहीं दिया गया। सामान्य से अपराध के लिए उन्हें इतना कठोर दण्ड दिया जाने लगा कि वे कभी अपने अधिकारों की माँग करने का साहस नहीं जुटा सके। इसके फलस्वरूप उच्च जाति का कोई भी व्यक्ति अस्पृश्य जाति के किसी भी व्यक्ति को इच्छानुसार अपमानित और प्रताड़ित कर सकता था।

(4) आर्थिक समस्याएँ

आर्थिक जीवन में अनुसूचित जातियों की स्थिति एक लम्बे समय तक बहुत दयनीय बनी रही। इन जातियों को केवल वे व्यवसाय करने की ही अनुमति दी गयी जो अत्यधिक अपवित्र होने के कारण सभी दूसरी जातियों के द्वारा त्याज्य थे। विभिन्न गाथाओं के द्वारा उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि यदि वे अपनी जाति के लिए निर्धारित कार्य नहीं करेंगे तो आगामी जीवन में उन्हें इससे भी बुरी योनि प्राप्त होगी। अस्पृश्य जातियों पर धन के संचय पर नियन्त्रण लगा दिया गया। सभी तरह की गन्दगी को साफ करना, मरे हुए पशुओं को उठाना और चमड़े से वस्तुएँ बनाने का काम ही उनकी | आजीविका का साधन रह गया। इन सेवाओं के बदले पुराने कपड़े, बची हुई जूठन और बेकार की घरेलू वस्तुएँ देकर ही उन्हें सन्तुष्ट करने का प्रयत्न किया गया। मानवता के सम्पूर्ण इतिहास में अनुसूचित जातियाँ का जितना अधिक आधिक शोषण हुआ है, वैसा संसार के किसी दूसरे समाज में देखने को नहीं मिलता।

दलित जातियों की वर्तमान समस्याएँ

राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय भारत में पहली बार दलित जातियों की समस्याओं का अनुभव किया गया। इस समय डॉ. अम्बेडकर के प्रयत्नों से यह महसूस किया जाने लगा कि अनुसूचित जातियों की स्थिति में सुधार किए बिना उन्हें राष्ट्र की मुख्य धारा से नहीं जोड़ा जा सकता। इसके फलस्वरूप महात्मा गाँधी ने अस्पृश्य जातियों को हरिजन अर्थात् ‘ईश्वर की सन्तान’ कहकर उनके सामाजिक-आर्थिक शोषण को दूर करने पर विशेष बल दिया। स्वतन्त्रता के बाद जब अस्पृश्य जातियों को अनुसूचित जातियों के रूप में मान्यता देकर उन्हें संवैधानिक रूप से विकास की विभिन्न सुविधाएँ दी गर्मी, तब यह समझा गया कि बहुत जल्दी हो अनुसूचित जातियों की समस्याएँ समाप्त हो जाएँगी। यह सच है कि पहले की तुलना में अनुसूचित जातियों की स्थिति में व्यापक सुधार हुआ है लेकिन आज भी उनकी अधिकांश समस्याएँ किसी न किसी रूप में बनी हुई हैं:

(1) उच्च जातियों द्वारा शोषण

अनुसूचित जनजातियों का लगभग 80 प्रतिशत भाग गाँवों में निवास करता है। गाँवों में उच्च जातियों के महाजन, बड़े भू-स्वामी और प्रभु जाति के लोग आज भी अनुसूचित जातियों का किसी न किसी रूप में सामाजिक-आर्थिक शोषण कर रहे हैं। अनुसूचित जातियाँ के अधिकांश ग्रामीण आज भी अत्यधिक अशिक्षित और निर्धन है। अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उच्च जातियों के लोगों से यदि एक बार यह लोग कोई ऋण ले लेते हैं तो उनका पूरा जीवन ऋण में ही व्यतीत हो जाता है।

(2) हरिजन महाजनों द्वारा शोषण-

अनुसूचित जातियों के शोषण के लिए गाँव की उच्च हो उत्तरदायी नहीं है बल्कि स्वयं अनुसूचित जातियों के अन्दर आर्थिक रूप से सम्पन्न एक ऐसे वर्ग का निर्माण हुआ है जो निर्धन हरिजनों को बहुत भारी ब्याज पर ऋण देकर तथा बलपूर्वक व्याज की बसूली करके हरिजनों का आर्थिक शोषण करने लगा है। एक सर्वेक्षण से स्पष्ट हुआ कि हरिजन जाति के महाजन 1,000 रुपये के ऋण पर 50 रु. से लेकर 100 रु. तक महीना ब्याज के रूप में वसूल करते हैं, जबकि ऋण देते समय ही ब्याज की पहली किश्त काट ली जाती है। इस तरह ऐसे ऋण के लिए अनुसूचित जातियों के निर्धन लोगों को वर्ष में 100 प्रतिशत राशि ब्याज के रूप में देने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

(3) सामाजिक विभेद की समस्या

व्यावहारिक रूप से आज भी ऊँची जाति के लोग अनुसूचित जातियों से सामाजिक सम्पर्क और खान-पान के क्षेत्र में सम्बन्ध रखने में संकोच महसूस करते है। विभिन्न प्रतिष्ठानों में या तो उन्हें रोजगार की सुविधाएँ प्राप्त नहीं हो पात अथवा दूसरी जातियों की तुलना में उन्हें मिलने वाला आर्थिक पुरस्कार बहुत कम होता है। कानूनों के द्वारा अनुसूचित जातियों को हिन्दुओं के धार्मिक स्थानों में प्रवेश करने का पूरा अधिकार है लेकिन अनुसूचित जातियाँ आज भी इस अधिकार का स्वतन्त्रतापूर्वक उपयोग नहीं कर पाती।

(4) अशिक्षा

अनुसूचित जातियों के बच्चों में शिक्षा की वृद्धि करने के लिए उन्हें निःशुल्क शिक्षा देने, छात्रवृत्तियाँ देने तथा निःशुल्क छात्रावासों की व्यवस्था करने के बाद भी इन जातियों में साक्षरता की दर सबसे कम है। प्राथमिक शिक्षा के बीच में ही छोड़ देने वाले छात्र-छात्राओं में अनुसूचित जातियों के बच्चों का प्रतिशत सबसे अधिक है। गैर-सरकारी आँकड़ों के आधार पर आज भी अनुसूचित जातियों के बच्चों में साक्षरता का प्रतिशत लगभग 22 है।

(5) मद्यपान एवं नशीले पदार्थों की समस्या-

दूसरी जातियों की तुलना में आज भी अनुसूचित जातियों में मद्यपान तथा मादक द्रव्य व्यसन की समस्या सबसे अधिक गम्भीर है। एक ओर सरकार की आरक्षण नीति के कारण विभिन्न सेवाओं में अनुसूचित जातियों के प्रतिशत में वृद्धि हुई है तो दूसरी ओर, आर्थिक स्थिति में सुधार होने के साथ पुरुष वर्ग द्वारा अपनी आय के एक बड़े भाग को शराब, स्मैक, चरस, गाँजे या इसी तरह के किसी दूसरे नशीले पदार्थ के सेवन पर व्यय कर दिया जाता है। फलस्वरूप ऐसे लोग परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने में कोई प्रत्यक्ष योगदान नहीं कर पाते।

(6) राजनीतिक शोषण की समस्या-

अनुसूचित जातियों की वर्तमान समस्याओं को आज के राजनीतिक सन्दर्भ में भी सरलता से समझा जा सकता है। हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विभिन्न समूहों की संख्या-शक्ति का विशेष महत्व है। इसके फलस्वरूप अनुसूचित जातियों के अनेक प्रभावशाली व्यक्ति यह प्रयत्न करने लगे कि अनुसूचित जातियों को एक अलग गुट में संगठित करके उन्हें उच्च जातियों से इस तरह पृथक कर दिया जाए जिससे वे इसका राजनीतिक लाभ उठा सकें। राजनीतिक आधार पर बनने वाले ऐसे गुटों से पारस्परिक सद्भावना की जगह हिंसा, तनाव और संघर्ष में वृद्धि होने लगी।

दलितों की समस्याओं के समाधान हेतु संवैधानिक व्यवस्थायें: इसके लिए संविधान में निम्न व्यवस्थाएं हैं

  • अनुच्छेद 15– इस अनुच्छेद में धर्म, जाति, लिंग, वंश, जन्म स्थान के आधार पर भेद नहीं किया जायेगा। इनमें से किसी भी आधार पर राज्य द्वारा पोषित संस्थानों के उपयोग के बारे में किसी नियोग्यताओं निवर्तन या शर्त के अधीन नहीं होगी।
  • अनुच्छेद 16-इस अनुच्छेद के अन्तर्गत समस्त नागरिकों को समानता प्रदान की गयी है, अर्थात धर्म, जाति वंश, लिंग, जन्म स्थान एवं निवास आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जायेगा।
  • अनुच्छेद 17 इस अनुच्छेद में छुआछूत का अन्त कर दिया गया और इसे दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है।
  • अनुच्छेद 29– इस अनुच्छेद के अन्तर्गत किसी भी नागरिक को किसी भी सरकारी सहायता प्राप्त

मिश्रित अधिगम प्रणाली के लाभ/ महत्व बताइए।

शैक्षणिक संस्था में धर्म, जाति, वंश एवं भाषा के आधार पर प्रवेश से वंचित नहीं किया जायेगा। इन सभी समस्याओं के बाद भी यह सच है कि पहले की तुलना में आज दलित जातियों की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ। उनके बारे में अधिकांश हिन्दुओं के विचार और मनोवृत्तियाँ तेजी से बदल रही हैं। यह एक ऐसा संकेत है जो भविष्य में अनुसूचित जातियों की स्थिति में उससे कहीं बड़ा परिवर्तन लाएगा जिसकी स्वतन्त्रता के समय आशा की गयी थी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here