अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा हेतु गोखले के विचार के बारे में बताइये?

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अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा हेतु गोखले के विचार – 20 वीं शताब्दी में राष्ट्रीय आंदोलन के फलस्वरूप जनसाधारण के मन में आशा का संचार हुआ। राष्ट्रीय नेता अपने देशवासियों की सामाजिक, आर्थिक तथा बौद्धिक उन्नति के लिए शिक्षा के महत्व पर बल दे रहे थे। ऐसे समय में अनेक महानुभावों ने विभिन्न प्रांतों की सरकारों से अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा प्रारम्भ करने का अनुरोध किया। सन् 1906 में बड़ौदा के महाराज शिवाजी राव गायकवाड़ ने अपने राज्य में प्राथमिक शिक्षा को निःशुल्क तथा अनिवार्य बना दिया। बड़ौदा महाराज के इस कार्य से उत्साहित होकर गोपाल कृष्ण गोखले ने भारत सरकार को अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की दिशा में क्रियाशील बनाने का प्रयास किया। गोपालकृष्ण गोखले पूना के फरग्यूसन कॉलेज के प्राचार्य तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके थे वे केन्द्रीय धारा सभा | (Imperial Legislative Assembly) के सदस्य थे। सन् 1910 से सन् 1913 के बीच उन्होंने सरकार द्वारा प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य बनाये जाने के लिए अथक प्रयास किए। गोखले तत्कालीन भारत में प्राथमिक शिक्षा की दयनीय दशा से अत्यन्त व्यथित थे। उनका विचार था कि अशिक्षित व अज्ञानी राष्ट्र कभी भी सही उन्नति नहीं कर सकता है, तथा वह जीवन की दौड़ में पिछड़ जाता है। वस्तुतः वे भारत में अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के महान दृष्टा थे। गोखले ने 19 मार्च 1910 को केन्द्रीय धारा सभा के समक्ष प्राथमिक शिक्षा के संदर्भ में अपना प्रस्ताव निम्न शब्दों में रखा

“यह सभा संस्तुति करती है कि समस्त राष्ट्र में प्रारम्भिक शिक्षा को निःशुल्क तथा अनिवार्य बनाने की दिशा में प्रयास प्रारम्भ किया जाये तथा सरकारी व गैर सरकारी अधिकारियों का एक संयुक्त आयोग इस सम्बन्ध में निश्चित प्रस्ताव तैयार करने के लिए शीघ्र ही नियुक्त किया जाये।”

“The Council recommends that a beginning should be made in the direction of making elememtary education free and compulsory throughout the country and that a mixed commission of officials and non-officials be appointed at an early date to frame definite proposals.”

सरकार के द्वारा प्राथमिक शिक्षा के सम्बन्ध में कार्यवाही करने का अश्वासन देने पर गोखले ने अपने इस प्रस्ताव को वापस ले लिया परन्तु सरकार का यह आश्वासन तात्कालिक समस्या को टालने के लिए उनकी नीति निपुणता का द्योतक मात्र था। अगले एक वर्ष तक सरकार ने इस दिशा में कोई भी सक्रिय कदम नहीं उठाया, तब गोखले ने 16 मार्च 1911 को केन्द्रीय धारा सभा में अपना प्रसिद्ध विधेयक प्रस्तुत किया। प्राथमिक शिक्षा संबन्धी अपने इस विधेयक के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि,

“इस विधेयक का उद्देश्य देश के प्रारम्भिक शिक्षा प्रणाली में अनिवार्यता के सिद्धान्त को क्रमशः लागू करना है।”

“The Object of this bill it to provide for the gradual introduction of the principle of compulsion into the elementary education system of the contry’

गोखले के द्वारा प्रस्तुत इस विधेयक की मुख्य विशेषतायें निम्नवत् थीं

  1. भारत में प्राथमिक शिक्षा की दिशा में पहल करने का समय आ गया है।।
  2. विधेयक के प्रावधान केवल नगरपालिकाओं अथवा जिला परिषदों के द्वारा घोषित क्षेत्रों में लागू होंगे।
  3. प्रान्तीय सरकार की पूर्व अनुमति के बिना किसी क्षेत्र को इस उद्देश्य के लिए घोषित नहीं किया जा सकता तथा यह अपनी सीमाओं के अंदर स्कूल जाने वाले छात्रों के प्रतिशत के सम्बन्ध में भारत सरकार द्वारा बनाए नियमों की पूर्ति करता है। की जाये परन्तु बाद में स्थानीय
  4. प्रारम्भ में यह शिक्षा केवल बालकों के लिए लागू संस्था इसे लड़कियों के लिए भी लागू कर सकती हैं।
  5. प्रस्ताविक आयु सीमा केवल छः से दस वर्ष होगी।

गोखले के विधेयक में अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के सम्बन्ध में दिए गए सुझाव सरल, स्पष्ट तथा सामान्य प्रकृति के थे। परन्तु सरकार विधेयक के प्रति उत्साहित नहीं थी तथा उसने इस विधेयक को जनमत संग्रह हेतु प्रान्तीय सरकारों, विश्वविद्यालयों तथा अनेक व्यक्तिगत संस्थाओं के पास भेज दिया। 18 मार्च 1912 को केन्द्रीय धारा सभा में विधेयक पर विचार-विमर्श हुआ जो दो दिन अर्थात् 18 व 19 मार्च 1912 तक चला। गोखले का बिल 13 के मुकाबले 38 मतों से अस्वीकार कर दिया गया। सरकारी प्रवक्ता के रूप में सर हरकोर्ट बटलर ने विधेयक का विरोध करते हुए तर्क दिया कि

  1. प्रान्तीय सरकार विधेयक के पक्ष में नहीं है,’
  2. शिक्षित वर्ग भी विधेयक के पक्ष में नहीं है,
  3. राष्ट्र अनिवार्य शिक्षा के लिए तैयार नहीं है।
  4. अनिवार्य शिक्षा के लिए जनता की माँग नहीं है।
  5. अनिवार्य शिक्षा लागू करने में अनेक प्रशासनिक कठिनाइयाँ हैं।
  6. स्थानीय संस्थायें अनिवार्य शिक्षा के लिए नए कर लगाने को तत्पर नहीं हैं। गोखले के अकाट्य तर्कों के बावजूद सरकार ने विधेयक को असामयिक व अनुपयुक्त बताते हुए तिरस्कृत किया। विधेयक के अस्वीकार हो जाने से गोखले तनिक भी हतोत्साहित नहीं हुए। अपने मस्तान के अंत में बोलते हुए उन्होंने कहा कि,

मैकाले के विवरण की मुख्य सिफारिशें क्या थी?

मैं जानता था, मेरा विधेयक संध्या तक उखाड़ फेंक दिया जायेगा। मुझे न तो कोई शिकायत है और न ही कोई निराशा….। मैं सदैव महसूस करता हूँ तथा प्रायः कहता हूँ कि हम भारत की • वर्तमान पीढ़ी, केवल असफलताओं के द्वारा अपने राष्ट्र की सेवा करने की आशा कर सकते हैं।”

“My Lord, I know that my bill will be thrown out before the day closes, I make no complaint. I shall not even feel depressed. I have always felt and have often said that we, of the present generation in India, can only hope to serve our counry by our failures.”

गोखले का विधेयक अस्वीकार तो हो गया परन्तु उनके द्वारा प्रस्तुत इस विधेयक का बहुत प्रभाव पड़ा। देश में प्राथमिक शिक्षा की मांग धीरे-धीरे बढ़ने लगी जिसे धीरे-धीरे पूरे देश में लागू कर दिया गया।

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