अमीरियन लोगों के समाजिक जीवन पर प्रकाश डालिए।

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अमीरियन लोगों के समाजिक जीवन – असीरियन सैनिक जीति का प्रभाव उनके सामाजिक गठन पर पड़ा। विभिन्न प्रान्तों प्रदेशों एवं राज्यों के निवासी युद्धबन्दी के रूप में असीरियन समाज के अंग बनते गये। निएिक अन्तर्राष्ट्रीय नगर बन गया, जिसमें पश्चिम में एशिया माइनर से लेकर पूर्व में एलम तक के निवासी विद्यमान थे। बहुतों ने तो यहाँ तक कहा है कि निनिव में असीरियनों की अपेक्षा विदेशी अधिक थे। असीरियन स्त्रियों से वैवाहिक समबन्ध स्थापित कर अथवा उनके दत्तक पुत्र बन कर बहुत से विदेशी असीरियन नागरिक बन गए थें। सामान्यतः असीरियन समाज स्वतंत्र एवं दास दो वर्गों में विभाजित था। स्वतंत्र वर्ग की तीन श्रेणियाँ थीं। प्रथम श्रेणी के अन्तर्गत शासक, धर्माधिकारी तथा उच्च अधिकारी थे। इन्हें श्रीमन्त अथवा मारवनुति (Marabanuti) कह गया है। इन्हें यहाँ विशिष्ट स्थान प्राप्त था ऐसा लगता है कि असीरिया में इस श्रेणी के सदस्यों की संख्या बहुत कम थी क्योंकि कभी-कभी योग्य व्यक्तियों के अभाव में स्त्रियों को भी कुछ महत्वपूर्ण पद मिल जाते थे। श्रीमन्तों के अधिकारों की रक्षा के लिए यहाँ सतत् प्रयत्न किए जाते थे। स्वतंत्र नागरिकों की द्वितीय श्रेणी के अन्तर्गत शिल्पी या उम्माने (Unmane) वर्ग के सदस्य थे। इनकी संख्या अधिक थी इस श्रेणी के सदस्यों में श्रेद्धि अथवा नामकरू, लिपिक अथवा तुपार्क, कुंभकार या परवरु, वर्द्धकि अथवा नमक आदि सम्मिलित थे। इनका व्यवसाय नित था। स्वतंत्र नागरिकों की तृतीय श्रेणी श्रमिक वर्ग या खुदी की थी। असीरियन राष्ट्रीय सेना इसी वर्ग के सदस्यों की बनी थी। आवश्यकता पड़ने पर इस वर्ग के सदस्यों को विदेशों में उपनिवेश स्थापना के लिए भी भेज दिया जाता था असीरियन दास दो प्रकार के थे-विदेशी युद्ध-बन्दी तथा ऋण न चुका सकने के कारण स्वतंत्रता खे देने वाले नागरिक। इनका मुख्य कार्य स्वतंत्र वर्ग के सदस्यों की सेवा करना था।

इनसे बेगार ली जाती थी तथा तुच्छ कार्य करवाया जाता था। सेनैकेरिव के समय के एक प्रस्तरचित्र में दासों को एक विशाल मूर्ति से लदी मिट्टी की गाड़ी खींचते हुए दिखाया गया है। कोईधारी अधिकारी उनका निरीक्षण कर रहें हैं। अन्य स्वतंत्र वर्ग के सदस्यों से पृथक करने के लिए इनके कान छेड़ दिये जाते थे तथा सिर मुड़ा दिये जाते थे लेकिन इतना होते हुए भी यहाँ दासों की स्थिति बहुत दयनीय नहीं थी। वे कुछ स्वतन्त्र व्यवसाय करके धनार्जन कर सकते थे। कभी- कभी न्यायालय में साक्षी के रूप में भी उपस्थित हो जाते थे तथा उन्हें स्वतः दास रखने की छूट मिली थी। कभी-कभी तो शासन में भी उन्हें कुछ पद मिल जाता था।

परिवार एवं स्त्रियों की स्थिति

असीरियन पारिवारिक गठन पितृसत्तात्मक था अर्थात् पिता ही परिवार का सर्वेसर्वा था। परिवार के शेष सदस्यों को उसकी आज्ञा का पूर्णतः पालन करना पड़ता था। असीरियनों के इस प्रकार के पारिवारिक गठन के मूल में उनकी सैनिक प्रवृत्ति को स्वीकार किया जा सकता है। युद्धों में निरन्तर व्यस्त रहने के कारण परिवार का पुरुष वर्ग यहाँ महत्ता प्राप्त करता गया। पुरूषों की महत्ता के कारण ही यहाँ स्वियों की स्थिति दयनीय हो गई। मेसोपोटामिया सभ्यता में असीरियन स्त्रियों ने उन अधिकारों को खो दिया जिसे उन्होंने बेबिलोनिया में प्राप्त कर लिया था। इनके विधि सम्मत लेखों से स्त्रियों की स्थिति पर प्रकाश पड़ता है। उनके द्वारा की गई चोरी, पुरूषों पर प्रहार, भ्रूण हत्या, वयभिचार इतयादि के लिए दण्ड सम्बन्धी कानून मिलते हैं। विवाह के नियम बेबिलोनियनों के समान ही थे, लेकिन यहाँ सामान्यतः लड़की खरीद कर विवाह किया जाता था। कभी-कभी स्त्रियों को पिता के घर में ही रहना पड़ता था और वे यदा कदा ही पति से मिल पाती थीं। यदि विवाह की प्रारम्भिक रस्मों के बाद वर की अकस्मात मृत्यु हो जाती थी तो कन्या का विवाह उसके किसी छोटे भाई के साथ कर दिया जाता था लेकिन इस समय इसका ध्यान रखा जाता था कि उसकी अवस्था दस वर्ष से कम न हो।

यदि वर का कोई छोटा भाई नहीं रहता था तो वर पिता को खाने-पीने की सामग्री के अतिरिक्त शेष सब कुछ, जो उसे कन्यापिता की ओर से रस्म के समय मिलता था, वापस करना पड़ता था। उनकी सैनिक संख्या निरन्तर बढ़ती रहे इसके लिए उन्हें स्त्रियों से सम्बन्धित कुछ कठोर नियम बनाने पड़े। भ्रूण हत्या के लिए स्त्रियों को मृत्यु दण्ड दिया जाता था। यहाँ तक कि यदि इस प्रयास में गर्भिणी की मृत्यु हो जाती थी तो भी उसे शूली पर चढ़ाया जाता था विवाहित स्त्रियों को पूर्ण पतिव्रत का पालन करना पड़ता था। बिना उसकी आज्ञा के न वे बाहर जा सकती थीं न व्यापार कर सकती थीं। व्यभिचार के लिए यहाँ प्राण-दण्ड दिया जाता था।

विवाहित स्त्रियों को कठोर पर्दे में रहना पड़ता था। वे बिना पर्दे के सार्वजनिक स्थलों पर विचरण नहीं कर सकती थीं। पर्दा प्रथा का विकास यहीं से माना जाता है अविवाहित स्त्रियों, गणिकाओं, पुजारियों तथा दासियों के लिए पर्दा प्रथा नहीं थी। उन्हें सदा मुंह खोलकर रहना पड़ता था। यदि कोई व्यक्ति कुछ मित्रों के बीच किसी गणिका को घूंघट में करके यह कह देता था कि ‘यह मेरी पत्नी है’ तो उस गणिका को उस व्यक्ति की पत्नी मान लिया जाता था और विवाहिता स्त्री के निरसन्तान होने पर उसके पुत्र की उत्तराधिकार भी मिल जाता था। स्त्री को तलाक देना, उसे कुछ देना या न देना पति की इच्छा पर था। इससे स्पष्ट हो जाता है कि असीरिया में स्त्रियों को कोई अधिकार नहीं मिला था और वे पूर्णतया पुरूषों के अधीन थी।

आर्थिक संगठन

आर्थिक दृष्टि से असीरियनों को भी लगभग वही सुविधाएँ मिली थीं जो सुमेरियनों तथा बेबिलोनियनों को दजला के दोनों ओर स्थित उर्वर मैदान कृषि के लिए उपयुक्त थे। यहाँ गेहूं, जौ, बाजरा तथा तिल की खेती मुख्य रूप से की जाती थी। वेबिलोनियनों की भाँति बाँध बना कर नहरों की सहायता से नदी के जल का उपयोग किया जाता था। खेतों तक जल पहुंचाने के लिए मिस्र की भांति यहाँ भी शहूफ (डेकुली) की सहायता ली जाती थी। यहाँ भूमि के स्वामी उच्च वर्ग के सदस्य ही थे। वास्तव में यहाँ भू- स्वामी तथा कृषक दोनों अलग अलग थे। कृषक स्वयं भूमिधर थे अथवा इन्हीं भू-स्वामियों को लगान देकर भूमि प्राप्त करते थे, ठीक-ठीक ज्ञात नहीं है। लेकिन इतना हम जानते है कि जो भूमि लगान पर ली जानी थी उसकी शर्तें बड़ी कड़ी होती थीं। कृषिकर्म की महत्ता के कारण कृषकों की स्थिति यहाँ अच्छी थी। असीरिया

विवाहित स्त्रियों को कठोर पर्दे में रहना पड़ता था। वे बिना पर्दे के सार्वजनिक स्थलों पर विचरण नहीं कर सकती थीं। पर्दा प्रथा का विकास यहीं से माना जाता है अविवाहित स्त्रियों, गणिकाओं, पुजारियों तथा दासियों के लिए पर्दा प्रथा नहीं थी। उन्हें सदा मुंह खोलकर रहना पड़ता था। यदि कोई व्यक्ति कुछ मित्रों के बीच किसी गणिका को घूंघट में करके यह कह देता था कि ‘यह मेरी पत्नी है’ तो उस गणिका को उस व्यक्ति की पत्नी मान लिया जाता था और विवाहिता स्त्री के निरसन्तान होने पर उसके पुत्र की उत्तराधिकार भी मिल जाता था। स्त्री को तलाक देना, उसे कुछ देना या न देना पति की इच्छा पर था। इससे स्पष्ट हो जाता है कि असीरिया में स्त्रियों को कोई अधिकार नहीं मिला था और वे पूर्णतया पुरूषों के अधीन थी।

उद्योग-धन्धे

कृषिकर्म के बाद असीरियनों के आर्थिक संगठन का मुख्य आधार उद्योगधन्धा था। यद्यपि असीरियनों की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि वहाँ उद्योगधन्धे तथा व्यापार दोनों अधिक विकसित नहीं हो सकते थे क्योंकि निनिव तथा अन्य महत्वपूर्ण नगर काफी उत्तर में थे। लेकिन विभिन्न प्रान्तों एवं प्रदेशों से लूट-पाट द्वारा जो धन यहाँ इकट्ठा हो रहा था उससे उद्योग-धन्धों के विकास का मौका मिला। मुख्यतः धातु-उद्योग प्रचलित थे। धातुएँ या तो खदानों से प्राप्त की जाती थीं या उनका आयात किया जाता था। स्वर्ण, रजत, ताम्र, कांस्य एवं लोहे से अनेक प्रकार के उपकरण बनाये जाते थे। धातुओं को ढालने तथा शीशा गलाने की कला से वे परिचित थे। धातु उद्योग के अतिरिक्त भाण्ड उद्योग तथा बस्योद्योग भी अत्यधिक प्रचलित थे। सेनैकेरिव के एक लेख में पेड़ों से उत्पन्न होने वाली एक उळन का उल्लेख मिलता है। यह निस्सन्देह कपास का उल्लेख है तथा पश्चिम एशिया मैं इसका प्राचीनतम उदाहरण है। ब्रेस्टेड के अनुसार इसका ज्ञान भारत से आया था। उद्योग-धन्धे प्रायाशः वंशानुगत थे।

व्यापार एवं वाणिज्य

व्यक्तिगत रूप से असीरियन श्रीमन्त व्यापार को घृणा की दृष्टि से देखते थे। उनकी दृष्टि में कम दाम पर सामान खरीद कर उसे अधिक दाम में बेचना निद्य कार्य था। श्रीमन्त वर्ग की व्यापारिक उदासीनता का लाभ विदेशी एरेमियनों को मिला और धीरे-धीरे सम्पूर्ण असीरियन व्यापार एवं वाणिज्य उनके अधिकार में आ गया। विदेशी व्यापार काफिलों की सहायता से किया जाता था। यहाँ माल तैयार करने वाले तथा उसे बाहर ले जोने वाले अलग-अलग वर्ग थे। व्यापारी और साहूकार पूँजी लगा कर माल बनाते थे तथा सौदागर उसे बाहर ले जाते थे। व्यापारियों को सौदागरों से पूँजी पर पचीस प्रतिशत व्याज मिल जाता था। उससे हम सौदागरों के लाभ की अधिकता का अनुमान लगा सकते हैं। मुद्रा प्रणाली अभी तक विकसित नहीं थी विनिमय में सोने, चाँदी तथा तांबे के टुकड़े प्रयुक्त किये जाते थे। सेनैकेरिव के एक लेख में चाँदी के एक अर्द्ध शेकेल के टुकड़े का उल्लेख मिलता है। व्यापार का संचालन राजधानी असुर से किया जाता था। व्यापारिक वस्तुओं की कीमत एक सी नहीं रहती थी माँग एवं पूर्ति के अनुसार वस्तुओं के मूल्य पटते-बढ़ते रहते थे। इनके व्यापारिक सम्बन्ध सीरिया, पेलेस्टाइन, साइप्रस तथा इंडियन द्वीप समूह से थे। मेसोपोटामिया का व्यापारिक मार्ग सीरिया से होकर जाता था अतः उसका योगदान विशेष था। यह एक सुविदित तथ्य है कि सीरियनों के दूसरों से संघर्ष प्रायशः व्यापारिक मार्गों के प्रश्न को लेकर होते थे। टायर, ठरतु एवं सीरिया के साथ हुए संघर्ष इसके प्रत्यक्ष उदाहरण है।

सुमेरिन सभ्यता में विज्ञान की प्रगति पर टिप्पणी लिखिए।

धार्मिक जीवन

असीरियन लोगों के धार्मिक जीवन का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-

देव मण्डल

क्रूर एवं हिंसा के वातावरण में असीरियन सभ्यता में न तो धार्मिक अधिक मान्यताएँ अधिक विकसित हुई न उनका राजनीतिक जीवन पर कोई विशेष प्रभाव ही पड़ा। बेबिलोनियन देवी-देवताओं को यहाँ अपनाया अवश्य गया लेकिन बेबिलोनियन राष्ट्रीय देव मार्दुक का स्थान असीरिया के अशुर नामक देवता को मिला। प्रारम्भ में यहाँ अशुर को अन्य देवताओं के समान महत्व मिला था और उसकी प्रसिद्धि एक सौर देवता के रूप में थी। सपक्ष सूर्य-चक्र उसका प्रतीक था। बाद में जब अशुर नामक नगर को असीरिया साम्राज्य की राजधानी बनने का सुयोग मिला तो अशुर को विशेष प्रतिष्ठा मिली। इसे राष्ट्रीय देवता का पद दे कर भारतीय इन्द्र की भाँति युद्धदेव स्वीकार कर लिया गया। अशुर युद्ध एवं शान्ति दोनों में राष्ट्र का कल्याण करता था। अशुर का आवास अशुर नगर का मन्दिर था। इसकी पत्नी के रूप में निनलित प्रतिष्ठित थी। अशुर एवं निनलिल के अतिरिक्त एआ. अनु एनलिल, सिनु, शमश, बेल, मार्दूक, नाबु, इनुर्त, नर्गल आदि की उपासना भी की जाती थी। उनकी अधिष्ठात्री देवी निन्ना प्रेम की प्रतीक थी। असीरियनों के धार्मिक जीवन में शासक को अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान मिला था। तत्कालीन मान्यता के अनुसार शासक देवताओं का प्रतिनिधि था और देवताओं की इच्छा के मुताबिक शासन करता था। यदि किसी देश के निवासी अशुर के प्रति आस्था नहीं प्रकट करते थे अथवा एक बार आस्था प्रकट कर उसका अनुपालन नहीं करते तो असीरियन उस देश पर आक्रमण कर उसे जीत कर वहाँ के निवासियों को दण्डित करता था। राष्ट्र के पुरोहित के रूप में शासक देवता की उपासना करता था।

अन्धविश्वास एवं परलोकवाद

असीरियन धर्म अंधविश्वास एवं अभिचारपरक थ। इस धर्म में अशुभकारी एवं आभिचारिक शक्तियों को विशेष महत्व मिला था। असीरियनों को इन शक्तियों से उतना ही भय था जितना उन्हें अपने विराधियों से बिल ड्यूरैण्ट ने उचित ही कहा है कि असीरियन धर्म का मुख्य उद्देश्य भावी नागरिकों में देशभक्तिपूर्ण विनय उत्पन्न करना तथा अभिचार एवं बलि के माध्यम से देवताओं की कृपा प्राप्त करने की कला की शिक्षा देना था। अशुभकारी एवं आभिचारिक शक्तियों से बचने का एकमात्र उपाय मंत्र-तंत्र था जिस पर पुजारियों का एकाधिकार था। इन मंत्रों को तावीजों पर उत्कीर्ण कर दिया जाता था। कभी-कभी मंत्रों के साथ-साथ अनेक प्रकार की आकृतियाँ भी उत्कीर्ण की जाती थी। इन तावीजों को यहाँ बालक से वृद्ध तक सभी धारण करते थे। अंधविश्वास एवं अभिचार की प्रबलता का प्रभाव पुजारियों पर पड़ा और उन्हें आगे बढ़ने का अवसर मिला। यहाँ पुजारियों के कई वर्ग थे। अभिचारविशेषज्ञ, संगीत द्वारा देवता को प्रसन्न करने वाले, स्तुति करने वाले तथा धार्मिक कार्यों के समय देव-मूर्तियों का जलाभिषेक करने वाले पुजारी अलग-अलग थे। वे घटनाओं के कार्य-कारण पर विश्वास करते थे।

उनका विश्वास था कि क्रम से घटित होने वाली दो घटनाओं में पहली दूसरे का कारण होती है। इसका प्रभाव शकुन विचार पर पड़ा और यहाँ भी बेबिलोनिया की भौति शकुन विचारकों का एक वर्ग अस्तित्व में आ गया। ग्रह-नक्षत्रों का अध्ययन करके शकुन विचारक भविष्यवाणी करते थे। इससे ज्योतिष के अध्ययन को बढ़ावा मिला। इसका लाभ बाद में यूनानियों को मिला। असीरियनों की पारलौकिक मान्यताओं के विषय में अधिक शत नहीं है। हम केवल इतना जानते है कि वे एक ऐसे अन्धलोक का अस्तित्व मानते थे जहाँ मृतात्मा को जाना पड़ता था। वहाँ उसे लौकिक कर्मों की जाँच की जाती थीं इस जाँच में जो दुष्कर्मी सिद्ध होता था उसे घोर यातना मिलती थी। मृतकों के विषय में असीरियन उदास दिखाई पड़ते है। पहले सामान्य रूप से जमीन में दफनाने की परम्परा थी किंतु आगे चलकर जलाने लगे।

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