अलाउद्दीन के राजत्व सिद्धान्त की व्याख्या कीजिये।

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अलाउद्दीन के राजत्व सिद्धान्त- अलाउद्दीन का राजत्व का सिद्धान्त अपने पूर्ववर्तियों से भिन्न था। वह उलेमा के निर्देशों का पालन करने के लिए तैयार नहीं था। काजी मुगीस-उद्दीन प्रायः उसके दरबार में जाता था और वह धर्म की प्रधानता में विश्वास रखने वाला था। अलाउद्दीन ने राजत्व के विषय में उसे अपने विचारों से इस प्रकार सूचित किया- “विद्रोह रोकने के लिए जिनमें हजारों मनुष्य की प्राणहानि होती है, मैं ऐसे आदेश निर्गमित करता हूँ जैसा मैं प्रजा व राज्य के हित में अच्छा समझता हूँ। लोग मेरे आदेशों की ओर ध्यान नहीं देते, वे मेरा सम्मान नहीं करते तथा वे मेरे आदेशों का उल्लंघन करते हैं, इसलिए मैं उनके दमन के लिए कठोर उपायों का प्रयोग करने पर विवश हो जाता हूँ। मैं यह नहीं जानता कि ऐसा न्यायसंगत है या नहीं, जैसा मैं राज्य के हित के लिए या संकटकाल का मुकाबला करने के लिए उचित समझता हूँ वैसा ही मैं आदेश देता हूँ और कयामत के दिन मेरा क्या होगा, यह मैं नहीं “जानता”।

तुगलक वंश के पतन के कारणों पर प्रकाश डालिए।

अलाउद्दीन के उपरोक्त कथन का यह मतलब नहीं कि वह इस्लाम के प्रति उदासीन था। भारत के बाहर वह इस्लाम का महान संरक्षक समझा जाता था। निःसन्देह अलउद्दीन का राजत्व सिद्धान्त उस समय की परिस्थिति के अनुकूल था।

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