भारत में साक्षरता की स्थिति की विवेचना कीजिए।

भारत में साक्षरता की स्थिति

यद्यपि भारत में प्राचीन काल से ही शिक्षा को अत्यन्त सम्मानजनक स्थान दिया जाता था। फिर भी विभिन्न सामाजिक कारणों से शिक्षा की मांग बहुत सीमित ही रही। सत्रहवीं तथा अठारहवीं शताब्दी में मिशनरियों के आने एवं शेष विश्व के साथ व्यापार बढ़ने पर शिक्षा के प्रसार को एक नई गति व दिशा मिली। ब्रिटिश शासन के दौरान साक्षरता प्रसार को भी कुछ बढ़ावा मिला। स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त देश की बहुसंख्यक जनता को उनके नागरिक अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति जागरुक करने के लिए नागरिक साक्षरता के विस्तार पर जोर दिया गया। साठ के • दशक में कार्यवाहक साक्षरता तथा सत्तर के दशक में विकासात्मक साक्षरता के नारे बुलन्द किये गये। परन्तु विगत अनेक दशकों से प्रौढ़ शिक्षा के प्रसार को बढ़ाने तथा प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य करने के भरसक प्रयासों के बावजूद भी भारत में निरक्षरों की संख्या में लगातार वृद्धि होती जा रही है।

यद्यपि साक्षारता के प्रतिशत में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है परन्तु सुधार की दर अत्यन्त धीमी होने के कारण आशाजनक परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं। सन् 2001 की जनसंख्या गणना के अनुसार भारत में साक्षरता का कुल प्रतिशत 65.38%, पुरुषों के लिए 75.85% एवं महिलाओं के लिए 54.16% मात्र है। एक अनुमान के अनुसार सन् 2007 में साक्षरता का प्रतिशत के 75% पुरुषों में 32% महिलाओं में 65% होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है।

यद्यपि स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त साक्षरता की दरों में वृद्धि तीव्र गति से हुई । परन्तु साक्षरता की वर्तमान स्थिति को किसी भी दृष्टि से सन्तोष स्वीकार नहीं किया जा सकता है। महिलाओं में साक्षरता दर सदैव ही पुरुषों की तुलना में कम रहीं है। देश के विभिन्न राज्यों तथा संघीय क्षेत्रों के लिए साक्षरता दरों में पर्याप्त अन्तर दृष्टिगोचर होता है। सन् 2001 की जनगणना से प्राप्त विभिन्न राज्यों तथा संघीय क्षेत्रों के लिए साक्षरता दरों के अनुसार केरल सर्वाधिक साक्षर राज्य (साक्षरता दर 90.92%) है, जबकि बिहार (साक्षरता दर 47.53%) सबसे निम्न स्थान पर है। निश्चय ही करोड़ों लोगों का निरक्षर होना भारत के लिए एक अभिशाप है जिससे यथाशीघ्र मुक्ति पाना अत्यन्त आवश्यक है। विकास की प्रक्रिया को लोगों के जीवन से जोड़ने के लिए मानवीय पक्ष की उन्नति व समृद्धि पर ध्यान देना होगा एवं इसके लिए सभी को न केवल साक्षर वरन् शिक्षित करने पर ध्यान देना होगा।

दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि मानव विकास की एक पूर्व शर्त शत-प्रतिशत साक्षरता है। सम्भवतः इसे ध्यान में रखकर ही भारत सरकार ने सन् 1977 में राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा नीति की घोषणा की थी एवं सन् 1988 में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन प्रारम्भ किया था। राष्ट्रीय साक्षरता मिशन में प्रौदों को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने, विकास कार्यों में सक्रिय भागीदारी करने तथा राष्ट्रीय सामाजिक मूल्यों को आत्मसात करने पर भी जोर दिया जा रहा है। भरसक प्रयासों के बावजूद भी सभी को साक्षर बनाने के प्रयास सफल सिद्ध नहीं हो रहे हैं। दरअसल इस क्षेत्र में आधारभूत अधिसंरचना की कमी के साथ-साथ आवश्यक अभिप्रेरणा व कारगर प्रयासों की कमी है। समर्पित शिक्षक, उपर्युक्त पाठ्य सामग्री मनोवैज्ञानिक शिक्षण विधि, आकर्षक शिक्षा केन्द्र तथा गत्यात्मक संचालन का नितान्त अभाव है। प्रौढ़ों में पढ़ने की अभिप्रेरणा व सतत् शिक्षा के प्रति उन्मुखता की कमी इस समस्या को और भी अधिक विषम बना देती है।

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राष्ट्रीय साक्षरता मिशन इस प्रकार की विभिन्न बाधाओं को संज्ञान में लेकर इनका निराकरण करने का प्रयास कर रहा है। आशा है कि भारत शीघ्र ही निरक्षरता के अभिशाप से छुटकारा पाकर अपने सभी नागरिको को संविधान के संकल्प के अनुसार गरिमापूर्ण जीवन जीने के योग्य बना सकेगा।

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