स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् महिलाओं की स्थिति में क्या सुधार हुआ है? भारतीय स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन के कारण बताइये।

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स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् महिलाओं सुधार

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद से ही सियों की स्थिति में क्रान्तिकारी परिवर्तन आया है। अब उनकी स्थिति में काफी सुधार हुआ है। डॉ. श्रीनिवास के अनुसार, पश्चिमीकरण, लौकिकीकरण तथा जातीय गतिशीलता ने त्रियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को उन्नत करने में काफी योग दिया है। वर्तमान में स्त्री-शिक्षा का प्रसार हुआ है। कई खियां औद्योगिक संस्थाओं और विभिन्न क्षेत्रों में नौकरी करने लगी हैं। अब ये आर्थिक दृष्टि से आत्म-निर्भर होती जा रही हैं। उनके परिवारिक अधिकारों में वृद्धि हुई है। अब स्त्रियों को अपने व्यक्तित्व के विकास हेतु काफी सुविधाएं प्राप्त है। वर्तमान में सियों की स्थिति में निम्नलिखित क्षेत्रों में महत्वपूर्ण परिवर्तन आये हैं

(1) जीवन साथी चुनने का अधिकार – प्राचीन काल में स्त्रियों को जीवन साथी चुनने का अधिकार नहीं था, किन्तु आज उच्च शिक्षा सामाजिक स्थिति में सुधार तथा अनेक अन्य कारणों से स्त्रियों को अपना जीवन साथी चुनने का अधिकार प्राप्त हो गया है। इस सम्बन्ध में 1954 के हिन्दू विशेष विवाह अधिनियम ने भी भारतीय स्त्री को अधिक स्वतन्त्रता प्रदान की है।

(2) तलाक का अधिकार – प्राचीन इतिहास इस बात का साक्षी है कि स्त्रियों का जीवन नरक समान था। विवाह को अटूट सम्बन्ध माना जाता था पति चाहे कैसा भी क्रूर व्यवहार करे, कितना ही व्यभिचारी क्यों न हो पर पत्नी उसका आजीवन त्याग नहीं करती थी। किन्तु हिन्दू विवाह तथा तलाक अधिनियम ने स्त्रियों के जीवन को ऊंचा उठाने का अवसर दिया है और आज स्त्रियों को भी तलाक देने का अधिकार प्राप्त हो गया है। इस अधिकार ने स्त्रियों की सामाजिक एवं नैतिक स्थिति को ऊँचा उठा दिया है।

(3) स्त्री-शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति – स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् स्त्री-शिक्षा का व्यापक प्रसार हुआ है। इसके पूर्व न तो माता-पिता लड़कियों को शिक्षा दिलाने के पक्ष में थे और न ही शिक्षा की दृष्टि से समुचित सुविधाएं उपलब्ध थी। 1991 की जनगणना के अनुसार लियों में साक्षरता का प्रतिशत 39.29 तथा पुरुषों में 64.13 था, जो 2001 में बढ़कर क्रमशः 54.16 व 75.85 हो गया। वर्तमान में लड़कियां व्यावसायिक शिक्षा भी ग्रहण कर रही है। शिक्षण से सम्बन्धित ट्रेनिंग कॉलेजों एवं मेडिकल कॉलेजों में लड़कियों की संख्या प्रति वर्ष बढ़ती ही जा रही है। डॉ. पणिक्कर ने लिखा है कि स्त्रियों की शिक्षा एवं उनकी जागृति ने उस कुल्हाड़ी को तेज कर दिया है जिसकी सहायता से हिन्दू सामाजिक जीवन की जंगली झाड़ियों को साफ करना सम्भव हो गया है।

(4) पारिवारिक अधिकार – वर्तमान में सियों के पारिवारिक अधिकारों में वृद्धि हुई है। वर्तमान में खियां संयुक्त परिवार के बन्धनों से मुक्त होकर एकाकी या मूल परिवार में रहना चाहती हैं। वे मूल परिवारों की स्थापना कर स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करना और पारिवारिक मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना चाहती हैं। अब बच्चों की शिक्षा, परिवार की आय के उपयोग, पारिवारिक अनुष्ठानों की व्यवस्था और घर के प्रबन्ध में लियों की इच्छा को विशेष महत्व दिया जात हैं। आज की बदली हुई परिस्थितियों में स्त्रियों को दासी बनाकर नहीं रखा जा सकता। अब तो मित्र और सहयोगी के रूप में उनका महत्व दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है।

(5) राजनीतिक क्षेत्र में प्रगति – स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात स्त्रियों की राजनीतिक चेतना में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। भारत के नवीन संविधान के अनुसार सन् 1950 में स्त्रियों को पुरुषों के बराबर नागरिक अधिकार प्रदान किये गये। पार्लियामेण्ट और विधान मण्डलों में स्त्री प्रतिनिधियों की संख्या और विभिन्न गतिविधियों में उनकी सहभागिता, राज्यपाल, मन्त्री मुख्यमन्त्री और यहां तक कि प्रधानमन्त्री तक के रूप में उनकी भूमिकाओं से स्पष्ट है कि इस देश में स्त्रियों में राजनीतिक चेतना दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। देश में अब तक हुए विभिन्न चुनावों से भी ज्ञात होता है कि महिलाओं में अपने वोट का स्वतन्त्र रूप से उपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।

(6) आर्थिक क्षेत्र में प्रगति – ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करने वाली अधिकांश स्त्रियां आर्थिक दृष्टि से कोई-न-कोई कार्य करती रही है। नगरों में भी निम्न वर्ग की स्त्रियां घरेलू कार्यों और उद्योगों के माध्यम से कुछ न कुछ कमाती रही हैं। साधारणतः मध्यम और उच्च वर्ग की लियों द्वारा आर्थिक दृष्टि से कोई काम करना बुरा समझा जाता रहा है, लेकिन औद्योगीकरण एवं आधुनिकीकरण ने

स्त्रियों की आर्थिक स्थिति को उन्नत करने में योग दिया है। शिक्षा के व्यापक प्रसार, नयी-नयी वस्तुओं के आकर्षण, उच्च जीवन-स्तर बिताने की बलवती इच्छा तथा बढ़ती कीमतों ने अनेक मध्यम एवं उच्च वर्ग की स्त्रियों को नौकरी या आर्थिक दृष्टि से कोई-न-कोई काम करने के लिए प्रेरित किया। अब मध्यम वर्ग की सियां उद्योगों, दफ्तरों, शिक्षण संस्थाओं, अस्पतालों, समाज कल्याण केन्द्रों एवं व्यापारिक संस्थाओं में कार्य करने लगी हैं।

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(7) सामाजिक जागरूकता – पिछले कुछ वर्षों में स्त्रियों की सामाजिक जागरुकता में काफी वृद्धि हुई है। अब स्त्रियां पर्दा प्रथा को बेकार समझने लगी हैं। अब बहुत-सी खियां घर की चारदीवारी के बाहर खुली हवा में साँस ले रही हैं। आजकल कई स्त्रियों के विचारों और दृष्टिकोणों में इतना अधिक परिवर्तन आ चुका है कि अब वे अन्तर्जातीय विवाह, प्रेम-विवाह और वित्तम्य-विवाह को अच्छा समझने लगी हैं। जातीय नियमों और रूढ़ियों के प्रति महिलाओं की उदासीनता बराबर बढ़ रही है। अब वे रूढ़िवादी सामाजिक बन्धनों से मुक्त होने के लिए प्रयत्नशील है। आज अनेक स्त्रियां महिला संगठनों और क्लबों की सदस्य हैं। कई स्रियां तो समाज कल्याण के कार्यों में लगी हुई हैं।

भारतीय स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन के कारण

भारतीय स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

(1) पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव – पाश्चात्य समाज में स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार मिले हुए हैं। अतः पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव ने यहाँ की स्त्रियों को भी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक किया है। ये घर से बाहर निकलकर विभिन्न शैक्षिक तथा सार्वजनिक क्षेत्रों में काम करने के लिए आतुर हो उठी हैं। पाश्चात्य साहित्य ने उनके दृष्टिकोण को वैज्ञानिक बना दिया है। अन्धविश्वास और रूढ़ियों को समाप्त करने में भी पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव का विशेष योग रहा है।

(2) राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति – भारतीय संविधान में समानता के सिद्धान्त को आधार मानते हुए स्त्रियों को भी पुरुषों के समान अधिकार प्रदान किए गए हैं, ये मतदान में भाग ले सकती हैं तथा चुनाव लड़ सकती हैं तथा योग्यता के आधार पर किसी भी सरकारी पद को प्राप्त कर सकती हैं। आज पंचायतों तथा अन्य निर्वाचनीय संकायों में स्त्रियों के लिए सुरक्षित स्थान रखे जाने लगे हैं।

(3) विभिन्न सुधारवादी आन्दोलन – ब्रिटिश काल से ही अनेक भारतीय समाज सुधारको का ध्यान स्त्रियों की दयनीय दशा की और आकर्षित हो गया था। राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर आदि प्रमुख समाज सुधारकों ने सियों की दशा सुधारने के विशेष प्रयास किए तथा काफी सीमा तक सफलता प्राप्त की। इन सुधारकों के प्रयास से ही अनेक महत्वपूर्ण अधिनियम बने।

(4) शिक्षा-प्रसार – स्वतन्त्रता के पश्चात् स्त्री-शिक्षा का तीव्रता से विकास हुआ। प्राथमिक स्तर से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक स्त्री-शिक्षा में द्रुत गति से वृद्धि हुई। शिक्षा प्रसार के परिणामस्वरूप भारतीय स्त्रियाँ अज्ञानता और अन्धविश्वास से मुक्त होकर अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होने लगी हैं। उन्होंने पुरुषों के समान सी सुधार आन्दोलन में सक्रियता से भाग लेना आरम्भ किया। आज स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह काम करती हैं तथा शिक्षित होने के कारण पुरुषों से किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं हैं।

(5) विभिन्न संगठनों द्वारा किए गए प्रयास – विभिन्न महिला संगठनों ने भी स्त्रियों की दशा सुधारने में विशेष योगदान दिया है। इन संगठनों में ‘महिलाओं की राष्ट्रीय समिति तथा “कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक निधि’ आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

(6) संवैधानिक या कानूनी सुविधाएँ – त्रियों कर दशा सुधारने में सर्वाधिक योगदान कानूनी सुविधाओं को जाता है। समय-समय पर सरकार द्वारा जो विवाह तथा उत्तराधिकार सम्बन्धी विभिन्न अधिनियम पारित किए गए, उनसे उन्हें समाज में सम्मान और सुरक्षा प्राप्त हुई है। ये प्रमुख अधिनियम हैं हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 ई.: बाल विवाह निरोधक अधिनियम, 1929 ई. हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 ई., हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 ई. तथा दहेज निरोधक अधिनियम, 1961 ई.1

(7) संयुक्त परिवार प्रणाली का विघटन – संयुक्त परिवार सदा से भारतीय स्त्रियों को पीसने की चक्की रहा है। यहाँ वे एक दासता का तथा दयनीयता का जीवन व्यतीत करती थीं, परन्तु औद्योगीकरण तथा नगरीकरण के कारण संयुक्त परिवारों का तीव्रता से विघटन हो रहा है जिससे स्त्रियाँ परम्परागत दासता से मुक्त होने लगी है। एकाकी परिवारों में स्त्रियों की स्थिति संयुक्त परिवार की अपेक्षा निश्चित रूप से अच्छी है।

(8) प्रेस, यातायात तथा सन्देशवाहन के साधनों में प्रगति – आधुनिक युग में अनेक पत्र-पत्रिकाओं द्वारा स्त्रियों के अधिकारों और विभिन्न सामाजिक सुधारों के सम्बन्ध में लेखमालाएं निकलती रहती हैं। बहुत-सी परिवारों केवल महिलाओं के लिए ही हैं जो उनकी समस्याओं के विषय में विभिन्न सुझाव देती हैं। विदेशों से भी इस प्रकार की सामग्री आती रहती है। यातायात के साधनों ने भी भारतीय स्त्रियों को संगठित होकर कार्य करने के लिए प्रेरित किया। अब त्रियों के विश्व संगठन में भी भारतीय सियाँ भाग लेने लगी हैं।

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