सीमान्तकारी महिलाओं की स्थिति का वर्णन कीजिये तथा सीमान्तकारी

सीमान्तकारी महिलाओं की स्थिति (Position of Marginalized Wome)

शताब्दियों से सारे संसार में पुरुषों की तुलना में महिलाओं को दूसरे स्थान पर माना जाता रहा है। मानव के पूरे इतिहास में पुरुषों को महिलाओं की तुलना में अधिक शक्तियों प्राप्त रही है। इसका परिणाम यह हुआ कि महिलाओं और उनके कार्यों को सम्मान नहीं दिया गया। यद्यपि महिला और पुरुष के बीच अन्तर जैविक प्रजनन के आधार पर किया जाता है लेकिन हजारों वर्षों से विभिन्न समाज द्वारा इस अन्तर का प्रयोग ‘सुविधा’ के रूप में किया जा रहा है। 20वीं शताब्दी में महिलाओं और समाज के सीमान्तकारी वर्गों ने समानता के लिए संपर्व को अन्तर्राष्ट्रीय रूप देकर लिंग-भेद से सम्बन्धित अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई।

“पूर्व 100 वर्ष के पश्चात् आयों के संगठित होने के समय विशेष रूप से उत्तरी भारत में हिन्दू समाज में अनेक प्रचण्ड परिवर्तन हुये जिसके फलस्वरूप महिलाओं की स्वतन्त्रता में कमी आई। मनु संहिता या उपनिषद और शंकराचार्य इत्यादि के समय से भारतीय समाज में सैगिक भेदभाव शुरू हुआ।

“सामाजिक व्यवस्था में निम्नतम स्थान पाने के कारण ये समुदाय युगों से अस्पृश्यता का शिकार रहे हैं।” अनेक सामाजिक अक्षमताओं के कारण भीमान्तकारी समूहों की महिलाओं के विकास की समस्या जटिल हो गई है क्योंकि उनके व्यक्तित्व के विकास के बीच उनके प्रति प्रतिकूल परिस्थितियों और भेदभाव जन्य स्थितियाँ हैं। परिणामतः सीमान्तकारी समूहों की महिलाओं के विकास की समस्या जटिल हो गई है क्योंकि उनके व्यक्तित्व के विकास के बीच उनके प्रति प्रतिकूल परिस्थितियाँ और भेदभाव जन्य स्थितियाँ है। परिणामतः सीमान्तकारी समूहों की महिलाएँ सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक विकास से वंचित है। जो सामान्य श्रेणी की महिलाओं को उपलब्ध है।

सीमान्तकारी समूहों का एक सामाजिक वर्ग के रूप में सजातीय अस्तित्व नहीं है बलिक भिन्न-भिन्न जातीय सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले समुदायों का समागम है। प्रत्येक समुदाय की अपनी अलग सामाजिक और सांस्कृतिक विशेषताएँ और परिणात्मक समस्याएँ होती है। वे दूसरे से न केवल सामाजिक उत्थान, रिवाजों और जीवन की शैलियों में मित्र होते हैं बल्कि अपने बर्ताव की शैली, अपने मूल्यों की मान्यताओं और अपने आचरण में भी मित्रता रखते हैं उनकी आकांक्षाएं, प्रेरणाएं और नेतृत्व की शैली तथा सामाजिक सांस्कृतिक रुझान भित्र-भित्र स्थितियों में विकसित हुये। हैं।

जाति एवं वर्ग के आधार पर लैंगिक विषमता पर प्रकाश डालिये।

सीमान्तकारी समूह समुदायों के बीच ऐसे समुदाय हैं जिन्हें मुख्य वर्ग कहा जा सकता है और ये जाति की आबादी का एक बड़ा भाग है और लगभग प्रत्येक ग्राम में पाये जाते हैं।

सीमान्तकारी समूहों की महिलाओं के विकास की समस्या जटिल हो गई है क्योंकि उनके व्यक्तित्व के विकास के बीच उनके प्रति प्रतिकूल परिस्थितियों भेदभाव जन्य परिस्थितियाँ हैं। परिणामतः सीमान्ताकरी समूहों की महिलाएँ सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक विकास से वंचित है। जो सामान्य श्रेणी की अन्य महिलाओं को उपलब्ध है, महिलाओं को समान बनाने वाले कार्यक्रमों में सम्मिलित किए जाने की अधिक और विशेष आवश्यकता है।

सीमान्तकारी महिलाओं की स्थिति को प्रभावित करने वाले मुद्दे (Issues Effecting the Position of Marginalized Women)

सीमान्तकारी महिलाओं विशेषकर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अल्पसंख्यक समूह की विभिन्न समस्याओं के अतिरिक्त कुछ और भी विपरीत परिस्थितियाँ हैं जो सीमान्तकारी महिलाओं की स्थिति को प्रभावित करती हैं

(1) शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक समस्याएं – गर्भावस्था प्रसवकालीन प्रसूति समस्या, अप्रशिक्षित दाईयों द्वारा प्रसव, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर, कुशल डॉक्टर्स एवं अस्पताल का अभाव आदि बाल विकास से सम्बन्धित समस्याएँ हैं।

(2) समाज में फैली कुरीतियाँ – बहुपत्नी विवाह, वैधव्य, बांझपन, जादू-टोना, अंधविश्वास एवं रूढ़िवादिता, गरीबी, शोषण, बालविवाह, रोगग्रस्तता, अस्पृश्यता एवं बेरोजगारी सभी समाज में फैली कुरीतियों से जन्म लेती समस्याएँ हैं।

(3) स्वास्थ्य व कुपाषण – स्वास्थ्य व कुपोषण भी सीमान्तकारी महिलाओं की स्थिति को प्रभावित करने वाला महत्त्वपूर्ण कारक है। सर्वप्रथम महिलाओं का शिक्षित न हो पाना तथा कुछ शिक्षित महिलाओं का अपने परिवार की आशा के बिना नौकरी न कर पाना आदि अर्थात् यदि कोई महिला नौकरी करती है परन्तु वह अपने परिवार की अनुमति के बिना अपनी नौकरी नहीं कर पाती है। गाँवों आदि में अधिकांश व्यक्ति अपनी बेटी पत्नी आदि के लिए महिला चिकित्सक को प्राथमिकता देता है तथा ऐसा न होने पर वह अन्य चिकित्सकों की सहायता नहीं लेता है, अथवा सेवा लेने में विलम्ब करता है। इसका प्रतिकूल प्रभाव अस्वस्थ महिला पर पड़ता है क्योंकि उसे समय से चिकित्सा का लाभ नहीं मिल पाता। अतः वह अस्वस्थ व कुपोषण से ग्रसित हो जाती है। तथा अस्वस्थता कुपोषण की स्थिति महिलाओं को किसी भी प्रकार के कार्यों को सुगमता व सुचारू रूप से सम्पन्न करने में अक्षम बनाती है। विभिन्न बीमारियों, दूषित जल, भोजन, आनुवांशिक बीमारियां, टी. बी. रक्तचाप, थायराइड, एनीमिया, स्कर्वी अस्थि रोग आदि पौष्टिक तत्वों की कमी के कारण उपजी बीमारियाँ है।

(4) पुरुषों पर निर्भरता – सीमान्तकारी महिलाओं की शिक्षा व उनकी स्थिति को प्रभावित करने में यह कारक भी उत्तरदायी है। यह सर्वविदित है कि जन्म से लेकर जीवन के हर पायदान पर महिलाओं को किसी-न-किसी प्रकार से पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ता है। हमारा समाज पुरुष प्रधान सामाज है। जन्म के बाद पिता पर तत्पश्चात् भाई व पति फिर बच्चों पर निर्भरता ही महिलाओं के जीवन का सत्य बन गया है। उनकी शिक्षा के साथ-साथ उनके जीवन से सम्बन्धित हर प्रकार के निर्णय पुरुषों द्वारा ही लिए जाते हैं। वर्तमान में यह स्थिति परिवर्तित हो रही है, किन्तु अभी उसमें और अधिक विकास होना शेष है।

(5) काम का बोझ – महिलाओं पर होने वाला काम का बोझ बहुत अधिक होता है जैसे • घर का काम, खेती मजदूरी और त्यौहार मनाने में काम इत्यादि। घर से मिलने वाले प्रोत्साहन का अभाव और ढेर सारे सामाजिक बंधन, रीति-रिवाज आदिवासी महिलाओं में सरकारी योजनाओं की जानकारी का अभाव है।

(6) बदलते नियम से बदलती जीवन व्यवस्था – वन उपज आदिवासी क्षेत्रों के जीवनयापन के स्रोत है। सरकारी नियन्त्रण, वन विभाग के बदलते नियम, दलालों, साहूकारों, विचौलियों के जकड़ते जाल से परपंरागत वन आधारित जीवन व्यवस्था चरमरा गई है।

(7) पहचान का संकट – बनवासी नारी के सामने पहचान का संकट खड़ा हो गया है। पंचायत राज संस्थाओं में महिला आरक्षण के मूल उद्देश्यों की प्राप्ति में अभी दूरगामी लक्ष्य तैयार करने की आवश्यकता है।

(8) आवासीय समस्याएँ – संसाधनों की अज्ञानता व अनुभवहीनता, निर्णय क्षमता का अभाव, उपभोक्ता एवं मानव अधिकार सम्बन्धी समस्याएँ, वित्तीय समस्याएं आदि से संबंधित हैं। गृह प्रबंध

(9) गरीबी के कारण तन ढकने की समस्या – वस्त्रों की स्वच्छता व निर्मलीकरण, पैरों में चप्पल न होना, मौसम से न लड़ सकना, आदि समस्याएँ हैं।

(10) निर्धनता और आर्थिक विषमता – आर्थिक दृष्टि से परावलंबन के कारण आत्मविश्वास का अभाव, तद्नुसार महिलाएँ गांव सभा प्रशिक्षण आदि कार्यक्रमों में भाग नहीं ले पाती हैं। निर्धनता व आर्थिक विषमता भी सीमान्तकारी महिलाओं की स्थिति व विकास को प्रभावित करती है। निर्धन माता-पिता अपनी अन्य आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति करने के पश्चात् ही बालिका की शिक्षा की ओर विचार कर पाते हैं। इसके अतिरिक्त अधिकांश स्थानों पर सीमान्तकारी महिलाओं को समान कार्य करने पर भी पुरुषों के समान पारिश्रमिक नहीं मिलता है।

(11) अशिक्षा – सीमान्तकारी महिलाओं की स्थिति को प्रभावित करने वाला सबसे महत्वपूर्ण कारक अशिक्षा है। अशिक्षा ही महिलाओं को समाज में आगे बढ़ने से तथा अपने विचारों को उचित प्रकार से अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करती है। इसके कारण सीमान्तकारी महिलाएँ स्वयं को हीन भावना से ग्रसित पाती हैं। महिलाओं में आत्मविश्वास का अभाव रहता है। शिक्षित न होने के कारण वह समाज में हो रहे प्रगतिशील परिवर्तनों के विषय में विचार मंथन करने में भी असमर्थ हो जाती हैं।

ग्रामीण सीमान्तकारी महिलाओं की स्थिति अपेक्षाकृत अधिक गम्भीर है। क्योंकि शिक्षा का प्रकाश गाँवों की महिलाओं तक मन्द गति से पहुँच रहा है। अशिक्षित महिलाएँ स्वयं के साथ साथ अपने परिवार व अपने बच्चों के वर्तमान व भविष्य के लिए विकासशील योजनायें बना पाने में अमसर्व होती है। क्योंकि शिक्षा ही किसी व्यक्ति में प्रगतिशील सोच व विचारधारा क संचार करती है। अशिक्षित होने के कारण सीमान्तकारी महिलायें स्वयं के अधिकारों व सरकार द्वारा उनके उन्नयन के लिए चलायी जा रही विभिन्न योजनाओं जैसे राष्ट्रीय मातृत्व योजना, महिला उत्थान योजना, महिला सुधार योजना आदि के विषय में अपेक्षित जानकारी नहीं रख पाती है। जो कि उनके विकास के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करता है।

(12) सामाजिक भेदभाव – सामाजिक भेदभाव भी सीमान्तकारी महिलाओं की शिक्षा में उत्पन्न एक बाधा है जिसे समाज में उनकी स्थिति प्रभावित होती है, जोकि धीरे-धीरे समाप्ति की ओर अग्रसर है, किन्तु अभी भी समाज में से इसका अन्य पूर्ण रूप से नहीं हुआ है। बालकों को बालिकाओं की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण समझ कर उनकी शिक्षा पर ध्यान देना तथा बालिकाओं की शिक्षा की उपेक्षा करना सामाजिक भेदभाव के कारण ही है जिसके कारण महिलाओं को उचित शिक्षा की व्यवस्था नहीं हो पाती है तथा वे शिक्षा से वंचित रह जाती हैं तथा अशिक्षा की स्थिति महिलाओं की स्थिति पर सीधा दुष्प्रभाव डालती है। वह अपने हर प्रकार के अधिकारों से यक्ति रहने पर भी उसका विरोध करने में स्वयं को अक्षम अनुभव करती है। सामाजिक भेदभाव के कारण महिलाओं को स्थिति सम्माननीय न होकर एक आश्रित की हो जाती है।

(13) शराब के सेवन की प्रवृत्ति – स्त्री एवं पुरुष दोनों में शराब के सेवन की प्रवृत्ति बढ़ने लगी है।

(14) अत्याचार, बलाकार, उत्पीड़न की समस्या – अत्याचार, बलात्कार, उत्पीड़न की समस्या सीमान्तकारी महिलाओं की एक बड़ी समस्या है जिससे समाज में उनकी स्थिति प्रभावित होती है. यह एक भयावह समस्या है।

(15) मूलभूत आवश्यकताओं का अभाव – पानी, बिजली, सड़क, चिकित्सा व शिक्षा के भवन जैसी मूलभूत आवश्यकताओं के विकास के दायित्व का निर्वहन नहीं हो रहा है। अतः पलायन की प्रवृत्ति दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।

(16) प्रवासी श्रमिक – अनुसूचित जाति की बहुत-सी महिलाएँ प्रवासी श्रमिक हैं। जो अपने परिवार को एक स्थल से दूसरे स्थल तक स्थानान्तरित करते रहते हैं। विशेष रूप से निर्माण कार्य में। वे कठिन शारीरिक श्रम, ठेकेदारों एवं दलालों का शिकार होती है। निरन्तर स्थान बदलते रहने से उन्हें प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य, राशन कार्ड आदि की सुविधा नहीं मिल पाती हालांकि अन्तर्राष्ट्रीय प्रवासी अधिनियम कानून बनाये जा चुके हैं।

(17) घरेलू श्रमिक बहुत-सी महिलाएँ घरेलू श्रमिकों के रूप में कपड़े साफ करने, बर्तन माजने, बच्चों की देशमाल करने आदि कार्य करती हैं। इनमें से बहुत-सी 14 वर्ष से कम आयु समूह की है। इनके लिए सुरक्षात्मक विधि का अभाव है। इनकी मजदूरी बहुत कम होती है और उनको प्रतिदिन 10-14 घण्टे काम करना होता है।

(18) झाडूकश सफाई वाले – शहरी क्षेत्रों में महिलाएँ और पुरुष दोनों ही झाडूकश व सफाई वाले का काम करते हैं जबकि पुरुष (अधिकांश) नगर पालिकाओं में नियोजित होते हैं। महिलाएं लोगों के घरों में ऐसे कार्य पारम्परिक प्रणाली के अधीन कम करती है। महिलाओं की आम बहुत कम होती है जो नकद रूप में और सामग्री के रूप में मिलती है।

(19) फेरी वाले – कुछ अनुसूचित जाति की महिलाएँ सब्जी, मछली, कपड़े, घरेलू समान आदि बेचने का काम करती है। इनकी मुख्य समस्या है

  1. ऋण की कमी,
  2. पुलिस तथा नगर अधिकारियों द्वारा सताया जाना।

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