सामाजिक जेण्डर (लिंग) से क्या आशय है ?

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सामाजिक जेण्डर (लिंग) का आशय

सामाजिक जेण्डर (लिंग) का आशय पुल्लिंग तथा स्त्रीलिंग के सांस्कृतिक तथा सामाजिक आधार पर जेण्डर की विचारधारा का तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण विश्व में महिलाएँ उत्पादन के मामलों के सम्बन्ध में निरन्तर अलाभकारी स्थिति में रही है। उनको प्राणिशास्त्रीय सिद्धान्तों के आधार पर सन्तान को उत्पन्न करने का यंत्र अथवा उपकरण स्वीकार किया गया है। स्त्री और पुरुष में श्रम तथा साधनों के स्वामित्व के विषय में न केवल मतभेद पाया जाता है, अपितु साथ ही साथ सेवाओं के प्रयोग तथा उनको प्रयोग करने के विषय में भी पर्याप्त विभेद देखने को मिलता है। जेण्डर विभेद वर्तमान समय में जीवन का सार्वभौमिक तत्व बन गया है। विश्व के अनेक समाजों में, विशेषकर विकासशील देशों में महिलाओं के साथ समाज में प्रचलित विभिन्न कानूनों, रूविगत नियमों के आधार पर विभेद किया जाता है तथा उनको पुरुषों के समान राजनीतिक तथा सामाजिक अधिकारों से वंचित किया जाता है।

सामाजिक जेण्डर की परिभाषा एवं व्याख्या

(1) सुप्रसिद्ध विचारक पेपनेक के अनुसार, “सामाजिक जेण्डर सी तथा पुरुष से सम्बन्धित है, जो स्त्री-पुरुष की भूमिकाओं को सांस्कृतिक आधार पर परिभाषित करने का प्रयास करता है एवं सी-पुरुष के विशेषाधिकारों से सम्बन्धित है। सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक आधार पर जेण्डर सामान्यतया शक्ति सम्बन्धों का कार्य तथा असमानता का सामाजिक संगठन है। “

(2) फेमिनिस्ट विद्वानों के अनुसार, “सामाजिक जेण्डर को स्त्री-पुरुष विभेद के सामाजिक संगठन अथवा स्त्री-पुरुष के मध्य असमान सम्बन्धों की व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।”

मनुष्य की विशिष्ट स्थिति का निर्धारण करने में सामाजिक संरचना महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। प्राणीशास्त्रीय स्थिति मनुष्य को ‘नर’ और ‘माया’ के रूप में रूपान्तरित करती है, किन्तु उसे पुरुष और स्त्री में विभाजित करने के अन्य कारक है। जैविक अर्थों में हम नर और मादा की तरह पैदा होते हैं, लेकिन हमें सामाजिक जेण्डर की मान्यता स्त्री और पुरुष के रूप में मिलती है।

समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के मध्य सम्बन्धों को स्पष्ट कीजिए।

भारत में पितृसत्तात्मकता एवं रूढ़िवादिता प्रचलित होने के कारण महिलाओं के साथ प्रत्येक क्षेत्र में असमानतापूर्ण व्यवहार किया जाता है। प्रायः सभी कार्यों के क्षेत्र में, जैसे वेतन के क्षेत्र में, अध्ययन के क्षेत्र में एवं प्रस्थिति आदि के क्षेत्र में महिलाओं को निम्न स्थान ही प्राप्त है। समाज में महिलाओं के पास कोई शक्ति नहीं है। महिलाएं जो देश की जनसंख्या का लगभग आधा भाग हैं, यदि इनका विकास अवरुद्ध होगा तो प्रत्यक्षतः देश का विकास भी अवरुद्ध होगा। महिलाएँ जन्मदात्री हैं, यदि वे ही पूरी तरह से विकसित नहीं होगी तो वे किस प्रकार एक सुदृढ़ नई पीढ़ी को जन्म दे सकेंगी। अतः स्पष्ट है कि महिलाओं का विकास प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में देश के विकास के लिए अति आवश्यक है।

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