सम्प्रेषण के विविध रूप क्या हैं?

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सम्प्रेषण के विविध रूप – जब से मानव समाज अस्तित्व में आया है या यूँ कहें जब से धरती पर मानव जीवन अस्तित्व में आया है, तब से प्राणी जगत के बीच सम्प्रेषण जारी है, अन्य प्राणियों में भी सम्प्रेषण के अनेक माध्यम हैं जिनका उपयोग पशु-पक्षी करते हैं। मानव के अस्तित्व में आने, उसमें बोलने की क्षमता का विकास होने तथा उच्चरित एवं लिखित भाषा के विकास होने से तो जैसे सम्प्रेषण के क्षेत्र में क्रान्ति हो गई है। विशेष तौर पर मानव भाषा के विकास से सम्प्रेषण के अनेक रूप अस्तित्व में आये हैं और इन रूपों में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है। इन्टरनेट एवं वेबसाइट आदि सम्प्रेषण के निरंतर विकास का ही प्रमाण देते हैं। प्राणिजगत के विकास के साथ-साथ सम्प्रेषण के अनेक रूप विकसित हुए हैं जो निम्नलिखित है

(1) साक्षात्कार-

साक्षात्कार दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच किसी विशेष संदर्भ में होने वाला वार्तालाप है। यह साक्षात्कार विशुद्ध व्यावसायिक भी हो सकता है, पूर्णतया निजी एवं घरेलू भी, यह नौकरी से सम्बन्धित भी हो सकता है एवं राजनीति से सम्बन्धित भी। अर्थात् साक्षात्कार का घेरा पर्याप्त व्यापक है। साक्षात्कार में एक प्रश्नकर्त्ता होता है जो प्रश्न पूछता है। इस प्रकार से साक्षात्कार में कम से कम दो व्यक्तियों का शमिल होना आवश्यक है। साक्षात्कार के पाँच सिद्धान्त होते हैं

  1. औपचारिक सम्प्रेषण,
  2. परस्पर संवाद,
  3. दो पक्षों का शामिल होना,
  4. गम्भीर विषय,
  5. प्रश्नोत्तर

(2) संवाद-

संवाद भी सम्प्रेषण का सशक्त माध्यम है। वास्तव में प्रातः उठने से लेकर रात को सोने तक व्यक्ति कई तरह के संवादों से गुजरता है। संवाद दो या दो से अधिक व्यक्तियों में किसी विषय विशेष को लेकर किया जाने वाला वार्तालाप है। लेकिन इस वार्तालाप के कई रूप व्यवहार में प्रचलित हैं जैसे-दो देशों के बीच शिखरवार्ता।

(3) सामाजिक आदान-

मनुष्य जीवन में इतनी विविधता है कि प्रातः उठने से लेकर रात को सोने तक इतना सामाजिक आदान-प्रदान होता है कि मनुष्य स्वयं इस सम्बन्ध में संचेत नहीं होता है। इस सामाजिक आदान-प्रदान के विशाल क्रम से कुछ अधिक प्रचलित रूप सामाजिक रस्मों, त्यौहारों, जीवन व्यवहार के कुछ विशिष्ट रूपों में होने वाले आदान-प्रदान हैं।

धर्म का अर्थ एवं परिभाषा का वर्णन कीजिए।

मानव जीवन में सामाजिक आदान-प्रदान के अनेक रूप और स्तर हैं। प्रातः उठने से लेकर रात सोने तक उसका यह आदान-प्रदान अनवरत रूप से चलता रहता है। इस आदान प्रदान को कुछ वर्गों में रखा गया है। जो निम्नलिखित हैं

  1. सामान्य शिष्टाचार का आदान-प्रदान।
  2. सामाजिक-सांस्कृतिक रस्मों/त्योहारों का आदान-प्रदान।
  3. उच्च ज्ञान, साहित्य, कला संस्कृति सम्बन्धी आदान-प्रदान।
  4. देश के विभिन्न क्षेत्रों/ प्रान्तों में आदान-प्रदान।
  5. व्यावसायिक आदान-प्रदान।
  6. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का आदान-प्रदान।

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