समाज में लैंगिक भेदभाव के कारण बताइये।

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समाज में लैंगिक भेदभाव

सामान्य रूप से भारतीय शिक्षा व्यवस्था के प्राचीन स्वरूप पर विचार किया जाय तो समाज में लिंग भेद के आधार पर शिक्षा व्यवस्था की उपलब्धता थी। बालिकाओं को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं था। समाज में पुरुष वर्ग की प्रधानता के कारण शिक्षा क्षेत्र में पुरुषों की ही प्रधानता थी। इसके मूल में अनेक कारण थे। आज की दृष्टि पर विचार किया जाय तो समाज में बालिकाओं को पराया धन कहकर माता-पिता उनकी उपेक्षा करते हैं। इस स्थिति में उसे शिक्षा प्रदान नहीं कराते हैं। इसके साथ-साथ वंश चलाने का दायित्व भी पुत्र को ही दिया जाता है। इसलिये पुत्रियों के प्रति उपेक्षा का भाव रखा जाता है। वर्तमान समाज में भी यह रूढ़िवादी परम्परा चली आ रही है। आज भी शिक्षित माता-पिता विभेद उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार की मानसिकता का विकास समाज में अनेक कारणों से है जिनका वर्णन निम्नलिखित रूप में किया जा सकता है

प्रतिभाशाली बालकों के बारे में बताइये ।

(1) समाज में बालिकाओं की बराबर संख्या का अभाव – सामान्य रूप से वर्तमान समय में बालक-बालिकाओं का अनुपात समाज में बराबर नहीं है। बालिकाओं की संख्या दिन-प्रतिदिन गिरती जा रही है। इसके परिणामस्वरूप नारी अपने संघर्ष के लिये साहस एकत्रित नहीं कर पा रही है। भ्रूण हत्या की अनेक तकनीकियों ने बालिकाओं की संख्या कम कर दी है। इससे भी समाज में नारी को उचित सम्मान नहीं मिल पा रहा है। परिणामस्वरूप शिक्षा के क्षेत्र में नारी की स्थिति पिछड़ी हुई है।

(2) पुरुष प्रधान समाज (Male dominent society) भारतीय समाज में पुरुष वर्ग की पूर्ण प्रधानता है। इसके साथ सम्पूर्ण विश्व में कुछ स्थानों को छोड़कर पुरुष वर्ग की प्रधानता ही रही है। इस कारण प्राचीन काल से अब तक समाज में शिक्षा का अधिकार पुरुष वर्ग को ही रहा है। समाज में नारी एवं पुरुष दोनों के क्षेत्र को विभाजित कर दिया गया है। पुरुष का क्षेत्र पर के बाहर है तथा नारी का क्षेत्र घर के अन्दर इसलिये शिक्षा बाहरी क्षेत्र होने के कारण उसे पुरुष वर्ग के लिये ही सीमित रखा गया है। नारी को कोमल एवं अबला मानकर उसके हितों की उपेक्षा की गयी है तथा शिक्षा के क्षेत्र पर उसे पूर्ण अधिकार प्रदान नहीं किये गये हैं।

(3) नारी की योग्यता पर सन्देह (Doubt on ability of women) – नारी की योग्यता पर भी समाज में सन्देह किया जाता है। समाज के अनेक व्यक्ति अनेक भ्रामक उदाहरण लोकोक्ति एवं मुहावरों का प्रयोग करके यह सिद्ध करना चाहते हैं कि नारी में पुरुष की तुलना में। योग्यता का अभाव माना जाता है जबकि ऐसा नहीं है। इस धारणा से भी बालिकाओं को समाज में उचित स्थान प्राप्त नहीं होता है तथा शिक्षा के क्षेत्र में असमानता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

(4) बालिकाओं को कमजोर समझना (To understand weak to girls) बालिकाओं को कमजोर समझने की परम्परा समाज में प्रारम्भ से ही है जो कि आज भी दृष्टिगोचर होती है। नारियों को पुरुषों की तुलना में कम वेतन दिया जाता है तथा समाज की यह भावना है। कि नारी शारीरिक रूप से कमजोर होती है। इन सभी भ्रामक एवं निराधार धारणाओं ने नारी को शिक्षा के क्षेत्र में अधिकार प्राप्त नहीं होने दिया है। बालिकाओं को सामान्य शिक्षा प्रदान करके ही। अभिभावक अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। जबकि बालिकाओं को उच्च शिक्षा के लिये। धन की कमी बताकर या अनेक ऋण बताकर अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाते हैं। कुछ अभिभावक तो बालिकाओं को सामान्य शिक्षा भी प्रदान नहीं कर पाते हैं।

(5) नारी की संकीर्ण सोच (Narrow thinking of women) नारी की संकीर्ण सोच भी उसकी समाजिक की है। अनके खियाँ अपने गर्भ से उत्पन्न होने पर दुःखी हो जाती हैं। उनका मोह पुत्र से सम्बद्ध होता है। इस प्रकार वह बालिकाओं के प्रति भेदभाव करने में भी संकोच नहीं करती हैं। इसलिये यह माना जाता है कि नारी ही नारी की शोषक है। यदि यह अपने पुत्र एवं पुत्रियों के प्रति समान व्यवहार के लिये वचनबद्ध हो जाय तो निश्चित ही समाज में नारी को सम्मान की प्राप्ति सम्भव है। इस प्रकार नारी की सोच भी उसको शिक्षा के क्षेत्र में पीछे कर देती है। स्वयं नारी आगे बढ़ने का प्रयास ही नहीं करती है।

(6) धार्मिक साहित्य का प्रभाव (Effeet of Religious Literature) अनेक अवसरों पर यह देखा जाता है कि हमारे मनीषियों ने नारी की स्वतंत्रता पर ही प्रतिबन्ध लगा दिया है जिससे कक्षा में उत्पन्न होती है। धार्मिक ग्रन्थों में वर्णन किया जाता है कि स्वता प्राप्त करने पर नारी बिगड़ जाती है। नारी का कार्य क्षेत्र सीमित करते हुए उसे पुरुष की आज्ञा का पालन करने की सलाह दी जाती है। पुरुष कितना भी अधर्मी एवं अत्याचारी हो उसकी सेवा करना नारी का धर्म माना जाता है। इस प्रकार की धार्मिक विचारधाराओं ने भी लिंग भेद की समस्या को जन्म दिया है तथा नारी को उसके उचित स्थान एवं शिक्षा प्राप्त करने के अधिकार से बंचित कर दिया है।

(7) संघर्ष शक्ति का अभाव (Lack okf struggle power) संघर्ष शक्ति के अभाव के कारण भी नारी को समाज में उचित स्थान प्राप्त नहीं हुआ है। सामान्य रूप से अन्याय सहन करने वाला व्यक्ति भी उतना ही दोषी है जितना अन्याय करने वाला। इसलिये नारी की समाज में निम्न स्थिति के लिये स्वयं नारी भी दोषी है। उसके द्वारा पुरुष के अमर्यादित व्यवहार कर प्रतिरोध नहीं किया जाता है जिससे पुरुष वर्ग का अत्याचार बढ़ता जाता है। इससे समाज में नारी का सम्मान गिरता है तथा शिक्षा के क्षेत्र में भी उसके साथ भेदभाव किया जाता है।

(8) बालिकाओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण (Negatic view to girls ) – समाज में बालिकाओं के प्रति नकारात्मक सोच है। बालिका के जन्म लेने पर अभिभावक इस चिन्ता से ग्रस्त हो जाते हैं कि इसके शादी-विवाह में हमको आवश्यकता से अधिक धन खर्च करना होगा। इसके बाद भी बालिका के ससुराल वाले उसको दुःखी रखते हैं तो अभिभावकों को आजीवन कष्ट सहन करना पड़ता है। इन अनेक नकारात्मक विचारों से बहुत से अभिभावक गर्भ में ही बालिका की हत्या करा देते हैं। इसके अतिरिक्त शेष अभिभावक बालिकाओं को शिक्षा प्रदान करने की अपेक्षा उसकी शादी के लिये धन एकत्रित करने में अपना समय व्यतीत करते हैं। इससे समाज में बालिकाओं को शिक्षा प्राप्त नहीं हो पाती है।

(9) व्यावहारिक रूप से समान अधिकार का अभाव (Lack of equal rights in Practical)– शिक्षा के क्षेत्र में समान व्यवहार की स्थिति का न होना सामाजिक व्यवहार में समानता का अभाव है। समाज में नारी एवं पुरुष दोनों को प्रत्येक क्षेत्र में समान अधिकार प्राप्त हैं। धर्म में भी इस तथ्य का उल्लेख है। प्रत्येक कार्य में पुरुष नारी की समान सहभागिता होनी चाहिये परन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं है। व्यवहार में पुरुष द्वारा नारी से किसी भी निर्णय में सलाह नहीं ली जाती है। इसके परिणामस्वरूप समाज में नारी उपेक्षा का पात्र बनकर रह जाती है। इसका प्रभाव यह होता है कि बालिकाओं को बालकों के समान शिक्षा के अवसर प्राप्त नहीं होते।

(10) नारी सम्मान का अभाव (Lack of women respect)- समाज में नारियों के सम्मान का आज भी अभाव है। समाज में पुरुष नारी से किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिये सलाह नहीं लेता है। उसकी सलाह पर सन्देह व्यक्त किया जाता है कि उसमें बुद्धि का अभाव है। इस प्रकार अनेक क्षेत्रों में नारी का सम्मान नहीं होता है। सरकार के प्रयास से नारी आरक्षण के अनुसार ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में महिलाएँ जनप्रतिनिधि के रूप में चुनी जाती हैं परन्तु वह चुनने के बाद अपने पति की इच्छा के विरुद्ध किसी कागज पर हस्ताक्षर नहीं कर सकती हैं। इस प्रकार की स्थिति शिक्षा में असमानता की स्थिति उत्पन्न करती है क्योंकि नारी पुरुष के हाथ का खिलौन मात्र बनकर रह जाती है।

(11) सामाजिक परम्पराएँ (Social Traditions) समाज में कन्या पक्ष द्वारा धन देकर वर पक्ष को सन्तुष्ट करने की परम्परा है जो कि नारी शिक्षा के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा है। अभिभावक बालिका की शिक्षा पर जो धन खर्च करना चाहता है उसे एकत्रित करके वह उसका विवाह कर देता है। शिक्षित अभिभावक भी बालिका को सामान्य शिक्षा प्रदान करके सन्तुष्ट हो जाते हैं तथा अपने इस कार्य को सही ठहराने के लिये तर्क देते हैं कि उसको चौका चूल्हा ही तो सम्भालना है। इसके लिये सामान्य शिक्षा ही पर्याप्त है। इस प्रकार की परम्पराएँ ही बालिका शिक्षा के मार्ग में बाधा उत्पन्न करती है।

उपरोक्त विवचेन से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय समाज की संरचना पूर्णतः पुरुष केन्द्रित है। इसलिये नारी को पुरुष कभी अपने समकक्ष नहीं देखना चाहता परन्तु वह यह नह समझता है कि शिक्षित नारी समाज एवं राष्ट्र के लिये उपयोगी है तथा घर की रोशनी होती है।

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