समाजशास्त्र की वास्तविक प्रकृति क्या है? तथा समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र।

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समाजशास्त्र की वास्तविक प्रकृति क्या है? तथा समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र।
समाजशास्त्र की वास्तविक प्रकृति क्या है? तथा समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र।

समाजशास्त्र को विज्ञान मानने के प्रमुख आधार या कसौटियाँ/प्रकृति निम्नलिखित है-

  1. समाजशास्त्र में तथ्यों का वर्गीकरण एवं विश्लेषण किया जाता है।
  2. समाजशास्त्र में “क्या है’ का वर्णन किया जाता है।
  3. समाजशास्त्र में सिद्धान्तों की स्थापना की जाती है।
  4. समाजशास्त्र के सिद्धान्त सार्वभौमिक (Universal) हैं।
  5. समाजशास्त्रीय ज्ञान का आधार वैज्ञानिक पद्धति है।
  6. समाजशास्त्र में भविष्यवाणी (Predication) करने की क्षमता है।
  7. समाजशास्त्र में अवलोकन द्वारा तथ्यों को एकत्रित किया जाता है।
  8. समाजशास्त्र में कार्य कारण सम्बन्धों की विवेचना की जाती है।
  9. समाजशास्त्र सिद्धान्तों की पुनर्परीक्षा सम्भव है।

सामाजिक समस्याओं के संदर्भ में समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण

समाजशास्त्र का विषय-क्षेत्र

समाजशास्त्र का विषय क्षेत्र – सामाजिक सम्बन्धों के फल से निर्मित समाज का अध्याय ही समाज समाज शास्त्र की विषय वस्तु है। गिन्सवर्ग के अनुसार, समाज शास्त्र की विषय वस्तु में चार तत्व सम्मिलित हैं – (i) सामाजिक अकारिकी (ii) सामाजिक नियंत्रण (iii) सामाजिक प्रक्रियायें तथा सामाजिक वनाचिकी। दुर्खीम ने समाजशास्त्र की विषय वस्तु को तीन भागों में विभाजित किया है-(i) समाजिक अकारिकी (ii) समाजिक शरीर शास्त्र तथा (iii) सामान्य समाजशास्त्र | केरन्स ने समाजशास्त्र की विषयवस्तु को छः भगों में विभाजित किया हैं-(i) मानीव क्रियाएं (ii) समाजिक संगठन (iii) समाजिक संस्थाएं (iv) समाजिक नियंत्रण (v) समाजिक परिवर्तन एवं (vi) समाजिक संहितायें। जार्ज सिम्मेल ने समाजशास्त्र की विषय वस्तु एक मात्र समाजिक प्रक्रिया को माना है। उनके अनुसार समाज व्यक्तियों का एक संकलन भाव है जिसकी रचना आपसी अंतक्रियाओं के आधार पर होती है।”

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