समाजशास्त्र का आरम्भ कैसे हुआ और समाजशास्त्र के विकास में अगस्ट कॉम्टे का क्या योगदान था ?

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समाजशास्त्र का आरम्भ-प्रायः कहा जाता है कि समाजशास्त्र का अतीत लम्बा इतिहास संक्षिप्त है। समाजशास्त्र, जिसे “समाज के विज्ञान” के नाम से जाना जाता है, सामाजिक विज्ञान में सबसे नए और पुराने में से एक विज्ञान है। यह सबसे नया इसलिए है कि सामाजिक विज्ञानों में इसका जन्म सबसे बाद में ज्ञान की एक शाखा के रूप में हुआ, जिसकी अपनी अवधारणाओं एवं अन्वेषण विधियों का एक विशिष्ट “कुलक” था। समाजशास्त्र प्राचीनतम विज्ञानों में से एक है, क्योंकि सभ्यता के प्रभातकाल से ही मानव अपनी जिज्ञासा की प्रवृत्ति के कारण घटनाओं का रहस्योद्घाटन करने के लिए अनवक रूप से सक्रिय रहा है। शताब्दियों पूर्व से ही मनुष्य समाज के बारे में सोचता- विचारता रहा है। वह यह चिन्तन करता रहा है कि समाज, कैसे संगठित किया जा सकता है, मनुष्य एवं और सभ्यताओं का उत्थान और पतन कैसे होता है, आदि। यद्यपि मनुष्य का यह चिन्तन वास्तव में “समाजशास्त्रीय” ही था, किन्तु उसे दार्शनिक, इतिहासकार, विचारक, विधि-निर्माणवेत्ता कहा जाता रहा। अतः विस्तृत रूप में कहा जा सकता है कि समाजशास्त्र की उत्पत्ति के चार आधार रहे हैं-

  1. राजनीतिक दर्शनशास्त्र,
  2. इतिहास का दर्शन,
  3. उद्विकास के जैविकीय सिद्धांत एवं
  4. सामाजिक और राजनीतिक सुधार के लिए आंदोलन

समाजशास्त्र की प्रकृति का वर्णन कीजिए।

समाजशास्त्र के विकास में अगस्ट कॉम्टे का क्या योगदान

समाजशास्त्र के विकास का आधुनिक युग “समाजशास्त्र के पिता” कहे जाने वा फ्रांसीसी विचारक ऑगस्ट कॉप्टे से प्रारम्भ माना गया है। कॉम्टे ने अरस्तू से लेकर सेंट साइमन तक के सामाजिक दर्शन के विद्वानों से बहुत कुछ प्राप्त किया। उसे मात्र समाजशास्त्र का जनक ही नहीं, प्रत्यक्षवाद का जन्मदाता होने का श्रेय भी प्राप्त है। कॉम्टे के अनुसार प्रत्यक्षवाद का एक अर्थ “वैज्ञानिकता” भी है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अपरिवर्तनशील प्राकृतिक नियमों के द्वारा ही व्यवस्थित एवं निर्देशित होता है। हमें यदि इन नियमों को ठीक ढंग से समझना है, तो उन्हें धार्मिक अथवा तात्विक आधारों पर नहीं, वरन् विज्ञान की पद्धतियों के आधार पर ही समझा जा सकता है। वैज्ञानिक पद्धति वास्तव में, निरीक्षण, परीक्षण, प्रयोग एवं वर्गीकरण की एक क्रमबद्ध और व्यवस्थित कार्य-प्रणाली है तथा इसके आधार पर ही सब कुछ समझना और ज्ञान को प्राप्त करना “प्रत्यक्षवाद” है। प्रत्यक्षवाद के साथ-साथ कॉम्टे ने समाजशास्त्र के विकास में अन्य योगदान भी किया है, जिसमें उनके द्वारा प्रस्तुत विज्ञानों का संस्तरण, तीन स्तरों का नियम, सामाजिक पुनर्निर्माण की योजना प्रमुख है।

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