श्रीनिवास के जाति विषयक क्षेत्रीय अध्ययन का उल्लेख।

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एम. एन. श्रीनिवास के विचार (Views of M. N. Srinivas) – एम. एन. श्रीनिवास ने अपनी पुस्तक ‘भारत की सामाजिक संरचना’ (India : Social Structure) में भारतीय | समाज के उन महत्वपूर्ण पक्षों को स्पष्ट किया जो भारत की समकालीन सामाजिक संरचना पर प्रकाश डालते हैं। उनके अनुसार भारतीय समाज की सामाजिक संरचना में जाति व्यवस्था, धार्मिक संयोजन, विवाह, नातेदारी, उत्तराधिकार तथा परिवार व्यवस्था वे महत्वपूर्ण पक्ष हैं। जिनमें होने वाले विभिन्न परिवर्तनों के आधार पर ही वर्तमान भारतीय समाज की प्रकृति को समझा जा सकता है। अतीत में भारतीय समाज एक परम्परागत समाज था तथा किसी भी व्यक्ति को जन्म के आधार पर मिली हुई सामाजिक प्रस्थिति, व्यवसाय और खान-पान के सम्बन्धों में किसी तरह का परिवर्तन करने की छूट नहीं थी।

असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम का वर्णन कीजिए।

भारतीय समाज का बन्द स्तरीकरण काफी सीमा तक आज खुले स्तरीकरण के रूप में बदल रहा है। आज भारतीय समाज अनेक संस्कृतियों से बनने वाला एक बहुजन समाज है। व्यावहारिक रूप से भारतीय सामाजिक संरचना का निर्माण करने वाली सभी संस्थाओं और समूहों के रूप में परिवर्तन हो रहा है, यद्यपि सामाजिक संरचना के विभिन्न पक्षों में होने वाला परिवर्तन किसी क्षेत्र में अधिक है तो किसी क्षेत्र में तुलनात्मक रूप से कुछ कम श्रीनिवास के अनुसार वर्ण विभाजन तथा आश्रम व्यवस्था के परम्परागत प्रतिमान पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं तथा धर्म अपने परम्परागत परिवेश से हटकर लौकिक मूल्यों से सम्बन्धित होता जा रहा है। प्रोफेसर श्रीनिवास ने भारतीय सामाजिक संरचना के समकालीन अथवा आनुभविक रूप को निम्नांकित विशेषताओं के आधार पर स्पष्ट किया है-

जाति व्यवस्था (Caste System)

भारतीय समाज में सामाजिक स्तरीकरण की व्यवस्था का आरम्भिक रूप वर्ण-व्यवस्था के रूप में था लेकिन उत्तर वैदिक काल से ही पवित्रता और अपवित्रता के आधार पर एक-एक वर्ण के अन्दर सैकड़ों जातियों का विकास होना आरम्भ हो गया। ईसा से लगभग 500 वर्ष पहले भारत में जब जैन और बौद्ध धर्म का तेजी से प्रसार होने लगा तो इसे रोकने के लिए स्मृतिकारों ने विभिन्न जातियों के संस्तरण को इतना दृढ़ रूप दे दिया कि कोई भी व्यक्ति अपने छोटे से छोटे व्यवहार में भी जाति के नियमों का उल्लंघन न कर सके। जाति पंचायतों और गाँव पंचायतों के द्वारा जाति के नियमों का उल्लंघन करने वाले लोगों को कठोर दण्ड दिया जाने लगा। यह सच है कि भक्तिकाल में अनेक संतों द्वारा जातिगत असमानताओं का विरोध करने के लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक आन्दोलन चलाये गये लेकिन बंगाल, कर्नाटक, तमिलनाडु तथा उत्तर भारत में ऐसे सभी संतों के अनुयायियों को एक अलग जाति का दर्जा मिल गया।

असहयोग आंदोलन के इतिहास का संक्षिप्त विवरण दीजिए। यह क्यों आवश्यक रहा?

जाति-व्यवस्था में वर्तमान परिवर्तन होने से पहले यह व्यवस्था जिन विशेषताओं पर आधारित थी, उनमें श्रीनिवास के अनुसार 9 विशेषताएँ प्रमुख थीं-

  1. विभिन्न जातियों के बीच एक निश्चित संस्तरण,
  2. अन्तर्विवाह तथा कुलीन विवाह का नियम,
  3. जातिगत व्यवसाय,
  4. भोजन तथा हुक्का-पानी से सम्बन्धित प्रतिबन्ध
  5. विभिन्न जातियों की प्रथाओं का वेश-भूषा में अन्तर
  6. विभिन्न जातियों के साथ जुड़े पवित्रता सम्बन्धी विश्वास
  7. जातिगत संस्तरण के अनुसार विभिन्न जातियों के विशेषाधिकार और निर्योग्यताएँ
  8. जाति संगठन तथा
  9. दण्ड व्यवस्था

श्रीनिवास के अनुसार जाति व्यवस्था का सार इसके द्वारा विभिन्न जातियों को उनकी आनुवंशिक स्थिति में रखकर उनके बीच ऊँच-नीच के संस्तरण को बनाये रखना था। जाति व्यवस्था का वर्ण-व्यवस्था से केवल इतना ही सम्बन्ध रह गया कि ब्राह्मण वर्ण की जातियाँ सर्वोच्च स्थान पर रहीं, जबकि हरिजन जातियों को इस संस्तरण में सबसे नीचा स्थान मिलता रहा। इसके बाद भी एक वर्ण से सम्बन्धित विभिन्न जातियों के बीच भी ऊंच-नीच का एक निश्चित संस्तरण बनाये रखा गया। यह संस्तरण केवल हिन्दू जातियों तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि मुस्लिम, और ईसाई जातियों में भी ऊँच-नीच का एक संस्तरण विकसित हो गया।

भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के उद्देश्य।

जहाँ तक जाति व्यवस्था में अन्तर्विवाह और कुलीन विवाह के नियम का प्रश्न है, यह नियम इसलिए बनाये गये जिससे विवाह और सामाजिक सम्पर्क के क्षेत्र में सभी जाति-समूहों को अपने से निम्न जाति की तुलना में श्रेष्ठ माना जाता रहे। प्रत्येक व्यक्ति के लिए जातिगत व्यवसाय करना इसलिए आवश्यक किया गया जिससे उसके सम्बन्ध केवल अपनी जाति के लोगों तक ही सीमित रहें। यही उद्देश्य भोजन और हुक्का-पानी से सम्बन्धित नियंत्रणों का कारण थे। जातिगत नियमों के अनुसार विभिन्न जातियों की वेश-भूषा और प्रथाएँ एक-दूसरे से इसलिए अलग रखी गयीं जिससे जातियों के बीच किसी तरह का मिश्रण न हो सके।

वैसे भी सभी जातियों द्वारा केवल अपनी जाति तक ही सीमित रहने के कारण उनकी एक पृथक् संस्कृति विकसित हो गयी। जाति व्यवस्था के अन्तर्गत पवित्रता और अपवित्रता की धारणा को सबसे अधिक महत्व इसलिए दिया गया जिससे सभी जाति समूह मानसिक रूप से अपनी सामाजिक प्रस्थिति के बारे में संतुष्ट रहें। उच्च जातियों को धार्मिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्र में विशेष अधिकार दिये गये, जबकि निम्न जातियों को सामान्य नागरिक अधिकारों से भी वंचित कर दिया गया। प्रत्येक जाति के अलग-अलग संगठन बना दिये गये जिससे वे अपनी जाति के सदस्यों के व्यवहारों पर नियंत्रण रख सकें। इस व्यवस्था के अन्तर्गत एक विशेष दण्ड व्यवस्था विकसित की गयी जिसके अन्तर्गत ब्राह्मण जाति के लोगों को किसी भी तरह का दण्ड देने पर निषेध था, जबकि दूसरी जातियों को उनके अपराध के अनुसार कठोर शारीरिक दण्ड तक दिया जा सकता था। संक्षेप में, जाति व्यवस्था एक लम्बे समय तक भारतीय सामाजिक संरचना का सबसे प्रमुख आधार रही तथा इसी के अनुसार समाज में व्यक्ति की प्रस्थिति का निर्धारण होता रहा।

यह सच है कि वर्तमान भारतीय समाज में आज भी विभिन्न जातियों का अस्तित्व बना हुआ है लेकिन जाति-व्यवस्था की संरचना तथा जाति से सम्बन्धित नियम पूरी तरह बदल चुके है। दूसरे शब्दों में, आज जाति-व्यवस्था सामाजिक स्तरीकरण का एकमात्र आधार नहीं है। इस तथ्य को जाति-व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं में होने वाले परिवर्तनों की सहायता से समझा जा सकता है।

हात्मा गांधी द्वारा चलाये गये भारत छोड़ो आंदोलन का वर्णन।

(1) सर्वप्रथम जातिगत संस्तरण पूरी तरह टूट चुका है। नयी राजनीतिक व्यवस्था में सभी जातियों को समान अधिकार मिले हुए हैं तथा जाति के आधार पर किसी भी व्यक्ति को उच्च अथवा निम्न नहीं कहा जा सकता। इसके फलस्वरूप अनेक निम्न जातियों ने अपने आपको एक उच्च जाति अथवा ब्राह्मण जाति के रूप में घोषित करना आरम्भ कर दिया। श्रीनिवास ने दक्षिण भारत का उदाहरण देते हुए लिखा है कि यहाँ सुनार जातियाँ अपने आपको ‘विश्वकर्मा ब्राह्मण’ मानती हैं। इसी तरह मैसूर में जिन्हें ‘मार्क ब्राह्मण’ कहा जाता है, मूल रूप से उनका सम्बन्ध भी शूद्र जातियों से रहा है।

(2) व्यवहार में अन्तर्विवाह के नियम का आज भी प्रचलन है लेकिन कुलीन विवाह को नैतिकता के विरुद्ध समझा जाने लगा है। अन्तर्विवाह का प्रचलन भी इसलिए बना हुआ है कि विभिन्न जाति समूहों की संस्कृति एक-दूसरे से आज भी काफी भिन्न है। दूसरे शब्दों में, पारिवारिक सामंजस्य के दृष्टिकोण से ही व्यवहार का यह नियम प्रचलन में है।

(3) वर्तमान भारतीय समाज में कोई भी व्यक्ति अपने जातिगत व्यवसाय के द्वारा ही आजीविका उपार्जित करने के लिए बाध्य नहीं है। व्यावसायिक आधार पर विभिन्न जातियों के अन्तर्सम्बन्ध बढ़े हैं। विभिन्न व्यक्तियों और समूहों के व्यवसायों में इतनी गतिशीलता आ चुकी है कि सर्वोच्च जातियों के लोग निम्नतम और परम्परागत रूप से अपवित्र समझे जाने वाले व्यवसायों से भी आजीविका उपार्जित कर रहे हैं, जबकि निम्न जातियों द्वारा वे सभी व्यवसाय किये जाने लगे हैं जिन पर कुछ समय पहले तक सर्वोच्च जातियों का एकाधिकार था।

(4) भोजन तथा हुक्का-पानी से सम्बन्धित प्रतिबन्धों का भी वर्तमान समाज में कोई प्रभाव देखने को नहीं मिलता। कुछ समय पहले तक कच्चे और पक्के भोजन से सम्बन्धित प्रतिबन्ध बहुत कठोर थे लेकिन सभी जाति के लोगों की मानसिकता में आज इस तरह के परिवर्तन हो रहे हैं कि किसी न किसी रूप में सभी जातियाँ एक-दूसरे के द्वारा बनाये गये भोजन को ग्रहण करने में आपत्ति नहीं करतीं। कुछ समय पहले तक उत्तर भारत में व्यक्ति की जातिगत प्रतिष्ठा का मूल्यांकन इस बात से किया जाता था कि वह किन व्यक्तियों के साथ हुक्का-पानी के सम्बन्ध रखता है। अब जिस हुक्के का सेवन जाट और अहीर जातियाँ करती हैं, उसी हुक्के से लोहार और खाती जातियाँ भी धूम्रपान कर सकती हैं।

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