शिक्षा शास्त्र

शिक्षा के अभिकरण (साधन) से आपक्या समझते हैं ? शिक्षा के औपचारिक अथवा अनौपचारिक साधनों का वर्णन कीजिए।

शिक्षा के अभिकरण (साधन) :-

विद्यार्थी को शिक्षा जिस साधन से प्राप्त होती है वही शिक्षा अभिकरण अथवा साधन कहलाते हैं। विद्यालय के अतिरिक्त भी कई साधन है जिनसे शिक्षा प्राप्त की जाती है। ये संस्थाएँ ही शिक्षा का साधन कहलाती है। जैसे- घर-परिवार, चर्च, प्रेस, समाज इत्यादि । औपचारिक व अनौपचारिक शिक्षा पाठ्यक्रम के आधार पर शिक्षा के निम्न स्वरूप अथवा प्रकार है

(1) औपचारिक शिक्षा (Formal Education)-

औपचारिक शिक्षा, वह शिक्षा है जो विभिन्न औपचारिकताओं के साथ जानबूझ कर दी जाती है। यह शिक्षा एक निश्चित नियमानुसार क्रियाशील होती है तथा यह नियमित रूप से विधिवत् प्रदान की जाती है। औपचारिक शिक्षा का स्थान और समय निश्चित होता है। इस शिक्षा की विषय-सामग्री भी निश्चित होती है। विद्यालय औपचारिक शिक्षा का प्रमुख स्थल है, जहाँ राजकीय शिक्षा विभाग अथवा किसी विद्वत परिषद द्वारा निर्धारित नियम या योजनानुसार किसी विशेष क्रम में शिक्षा प्रदान की जाती है। हेन्डरसन के अनुसार “जब बालक लोगों के कार्यों को देखता है, उनका अनुकरण करता है तथा उनमें भाग लेता है और जब उसको सचेत करके एवं जान-बूझकर पढ़ाया जाता है, तो वह औपचारिक रूप से शिक्षित होता है।

” इस प्रकार औपचारिक शिक्षा से तात्पर्य शिक्षा के उस प्रकार या स्वरूप से हैं, जो कि कुछ पूर्व-निर्धारित नियमों के अन्तर्गत तथा सोच-विचार कर इसके लिए निर्धारित संस्थाओं (स्कूल, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों, आदि) द्वारा दी या ली जाती है। इसमें पाठ्यक्रम की पद्धति पाठ्य-पुस्तकें, शिक्षक आदि शिक्षा के समस्त उपकरण पूर्व-निश्चित होते हैं। इस प्रकार की शिक्षा की योजना सोच-विचारकर तथा जान-बूझकर बनायी जाती है। इसके पाठ्यक्रम की रूपरेखा पहले से ही तैयार कर ली जाती है तथा इसके उद्देश्य भी पहले से ही निश्चित कर लिए जाते हैं।

औपचारिक शिक्षा के अन्तर्गत वे सभी शैक्षिक प्रयास आ जाते हैं जो किसी मान्यता प्राप्त शिक्षण संस्था अथवा शैक्षिक प्रणाली द्वारा संचालित होते हैं। विद्यालय के अतिरिक्त इस शिक्षा के प्रमुख साधन लाइब्रेरी, चिड़ियाघर, संग्रहालय, आर्ट गैलरी आदि है।

(2) अनौपचारिक शिक्षा (Informal Education)-

अनौपचारिक शिक्षा मुक्त शिक्षा है। अतः इसमें विद्यालय जैसे प्रतिबन्ध, शिक्षण विधि, शिक्षक, परीक्षा, पाठ्यक्रम, समय तालिका, स्थान आदि नहीं होते हैं। जिन वस्तुओं से अनुभव प्राप्त किये जाते हैं वे शिक्षक तथा जो अनुभव लेते हैं, उन्हें शिक्षार्थी कहा जा सकता है। इस शिक्षा का कोई कार्यक्रम निश्चित नहीं होता।।

अनौपचारिक शिक्षा में छात्र व्यावहारिक साधनों के माध्यम से शिक्षा ग्रहण करता है। उदाहरण के लिए साहचर्य यात्रा, गोष्ठी, आदि से व्यक्ति का ज्ञान बढ़ता है तथा उसे कई नयी बातों को सीखने का अवसर मिलता है। यह शिक्षा न तो किसी पूर्व योजना के और न किन्हीं नियमों के अनुसार दो जाती है। यह शिक्षा अपेक्षाकृत सरल होती है तथा आजीवन चलती रहती है। इस शिक्षा के प्रमुख साधन परिवार पड़ोस, मित्र- मण्डली, खेल समूह, समाज तथा वातावरण आदि है जिनसे व्यक्ति अचेतन रूप में कुछ न कुछ सीखता रहता है। इस शिक्षा का क्षेत्र पर्याप्त रूप से विस्तृत होता है।

अनौपचारिक शिक्षा माता की गोद से शुरू हो जाती है। बच्चा अपने सामाजिक वातावरण के विस्तार के साथ अपने स्वजनों, परिजनों, परिचितों के सम्पर्क में आकर शिक्षा प्राप्त करने लगता है। जीवन के प्रतिदिन के व्यवहार और विभिन्न घटनाओं के माध्यम से प्राप्त अनुभवों के द्वारा बच्चा आदान-प्रदान, क्रय-विक्रय, शिष्टाचार आदि के विभिन्न तरीकों को सीखता जाता है।

(3) निरौपचारिक शिक्षा (Non formal Education)-

यह शिक्षा औपचारिक एवं अनौपचारिक शिक्षा के बीच की स्थिति में होती है। यह शिक्षा औपचारिक एवं अनौपचारिक शिक्षा का मिला-जुला स्वरूप है। इसमें न तो औपचारिक शिक्षा के समान विभिन्न बन्धन होते हैं तथा न ही अनौपचारिक शिक्षा का खुलापन। इस शिक्षा के अन्तर्गत औपचारिक पाठ्यक्रम उद्देश्य शिक्षण विधि आदि की औपचारिकता ऐसी होती है कि बालक अथवा शिक्षार्थी जब भी जहाँ भी जितना भी अपनी योग्यता रुचि, गति और समय के अनुसार, सीखना चाहे, सीख सकता है। इस शिक्षा विधि द्वारा शिक्षा को बालक तक पहुँचाया जाता है। निरौपचारिक शिक्षा सभी प्रकार के छात्रों के लिए है, अतः इसमें प्रवेश का आधार लचीला और बहु-आयामी भी होता है। इस शिक्षा को औपचारिकेत्तर शिक्षा भी कहा जाता है।

निरौपचारिक शिक्षा स्वतः सीखने पर आधारित है। यह न तो पूर्णतः मुक्त है, न बंधित ही। इसका पाठ्यक्रम स्थायी और विभिन्नीकृत होता है, जो कि सीखने वाले और वातावरण की आवश्यकताओं के अनुकूल होता है। इसमें बालक का समाजीकरण, अनुभवों की प्राप्ति, उसके विभिन्न कौशलों का निर्माण बन्द कमरों, चहारदीवारी के अन्दर नहीं, बल्कि खुले आकाश के तले होता है। यह लक्ष्य प्रधान, वास्तविक जीवन से सम्बन्धित और स्वतः अधिगम पर आधारित शिक्षा है।

निरौपचारिक शिक्षा को शिक्षार्थी, युवा, बाल, प्रौढ़ कोई भी प्राप्त कर सकता है। इस दिशा की प्राप्ति हेतु हमें न तो किसी संस्था में नामांकन कराना पड़ता है न वहाँ तक जाना ही पड़ता है। इस शिक्षा में लचीलेपन और आवश्यकता को आधार बनाया गया है, जिसे औपचारिक शिक्षा के कठोर बन्धनों से मुक्ति मिलती है। निरौपचारिक शिक्षा उद्देश्यों की दृष्टि से औपचारिक शिक्षा है।

स्पष्ट है कि निरौपचारिक शिक्षा अधिगम या सीखने की वह प्रक्रिया है, जो कि सीखने के औपचारिक एवं अनौपचारिक शिक्षा के अन्तर को दूर करती है। यह विद्यालय से परे दी जाने वाली यह शिक्षा है जो अधिकांशतः उन युवाओं के लिए है, जो कभी विद्यालय न जा पाये हो। इस शिक्षा का मुख्य उद्देश्य लचीली, विकेन्द्रित और विद्यालय स्तरीय शिक्षा प्रदान करना है। यह शिक्षा पूर्व में प्राप्त किये गये अनुभवों का नयी परिस्थितियों में अनुप्रयोग करना है।

मानवीय संसाधनों का शिक्षा में महत्त्व स्पष्ट करें।

औपचारिक और अनौपचारिक शिक्षा में अन्तर

औपचारिक और अनौपचारिक शिक्षा में निम्नलिखित अन्तर होता है

  1. औपचारिक शिक्षा में प्रवेश तथा विकास के कुछ बिन्दु निहित होते है जबकि अनौपचारिक शिक्षा प्रवेश तथा विकास के प्रतिबन्धों से मुक्त रहती है।
  2. औपचारिक शिक्षा शिक्षक द्वारा विद्यार्थियों पर थोपी जाती है जबकि अनौपचारिक शिक्षा पारस्परिक भागीदारी की प्रक्रिया है।
  3. औपचारिक शिक्षा आदेश तथा आज्ञाकारिता पर बल देती है अतएव दमनात्मक है जबकि अनौपचारिक शिक्षा खुले विचार, आत्म सुधार, स्वावलम्बन, पर बल देती है।
  4. औपचारिक शिक्षा सामाजिक ढांचे के भीतर ही कार्य करती है जबकि अनौपचारिक शिक्षा सामाजिक परिवर्तनों के साथ चलती है।
  5. औपचारिक शिक्षा परिमित, सीमित तथा विद्यालयी जीवन से बंधी हुई है जबकि अनौपचारिक शिक्षा अपरिमित, असीमित, तथा कार्यात्मक जिन्दगी से गुथी हुई होती है।
  6. औपचरिक शिक्षा पूर्व निर्धारित पाठ्यक्रम, पाठ्य पुस्तकों तथा शिक्षण विधियों में बंधी हुई है जबकि अनौपचारिक शिक्षा विविध प्रकार की लचीली शिक्षा प्रक्रिया अपनाती है।

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