राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन पर संक्षेप में प्रकाश डालिये।

राष्ट्रीय शिक्षा आन्दोलन जब 1906 ई० में सरकार ने जापान की शिक्षा प्रणाली नामक एक रिपोर्ट प्रकाशित कर दी, तब भारतीय शिक्षा प्रसार की बड़ी तेजी से माँग करने लगे। बड़े-बड़े नेताओं ने देश के लिए औद्योगिक व राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत शिक्षा की आवश्यकता पर बल देते हुए बंगला राष्ट्रीय शिक्षा परिषद् नामक एक संस्था स्थापित की जिसमें एक व्यापक, उदार तथा जीवनोपयोगी शिक्षा की रूपरेखा तैयार की गई। इस रूपरेखा में प्रारम्भिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालयों की शिक्षा तक के सभी प्रश्नों पर विचार करने की इच्छा व्यक्त की गई।

गोपाल कृष्ण गोखले का प्रस्ताव

बड़ौदा राज्य की निःशुल्क अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा की योजना से अनुप्रेरित होकर गोखले ने 19 मार्च, 1910 ई. को इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउन्सिल के सदस्य के रूप में इस काउन्सिल के सामने अग्रलिखित प्रस्ताव रखे

  1. जिन क्षेत्रों में तैंतीस प्रतिशत बालक शिक्षा प्राप्त करते हैं, वहाँ 6 से 10 वर्ष तक के बच्चों की शिक्षा अनिवार्य कर देनी चाहिए।
  2. स्थानीय संस्थायें तथा सरकार मिलकर इस शिक्षा व्यय को 2 के अनुपात में वहन करें।
  3. प्राथमिक शिक्षा की देखभाल के लिए पृथक रूप से एक सेक्रेटरी रखा जाए।
  4. केन्द्र में प्राथमिक शिक्षा के लिये पृथक से एक शिक्षा विभाग गठित किया जाए।
  5. प्रतिवर्ष बजट प्रस्तुत करते समय प्राथमिक शिक्षा की प्रगति का उसमें वर्णन किया जाए।

सरकार ने उपर्युक्त प्रस्तावों पर विचार करने का आश्वासन दे दिया तो गोखले ने अपने प्रस्ताव वापस ले लिये। सरकार ने अपने आश्वासन के आधार पर केन्द्र में एक प्राथमिक शिक्षा विभाग स्थापित किया। बजट में इसकी प्रगति की चर्चा की जाने लगी। किन्तु सरकार ने प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य तथा निःशुल्क करने की दिशा में कोई कदम न उठाया। परिणामस्वरूप शिक्षा की वांछनीय प्रगति न हो पाई। इससे क्षुब्ध होकर गोखले ने 16 मार्च, 1911 ई. को एक विधेयक प्रस्तुत किया। गोखले के शब्दों में, “इस विधेयक का उद्देश्य देश की प्राथमिक शिक्षा प्रणाली को क्रमशः अनिवार्य बनाना है।”

गोखले का विधेयक, 1911

इस विधेयक में विशेषरूप से निम्नलिखित बातें कही गई थी

  1. स्थानीय बोड़ों की सीमाओं में शिक्षा को अनिवार्य बनाया जाए।
  2. अनिवार्यता अधिनियम को स्थानीय बोर्ड सरकार की पूर्व स्वीकृति से लागू करें।
  3. शिक्षा अनिवार्यता के कारण जो व्यय बढ़े, उसके लिए स्थानीय बोर्ड अतिरिक्त ‘शिक्षा कर’ लगायें।
  4. 6 से 10 वर्ष तक के बालकों के लिए प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य कर देनी चाहिए।
  5. बच्चों को स्कूल न भेजना दण्डनीय अपराध हो ।
  6. सरकार सम्पूर्ण व्यय का 2/3 भाग स्थानीय बोड़ों को दे
  7. जिन माता-पिताओं की मासिक आय 10 रुपये से कम हो उनके बालकों को निःशुल्क शिक्षा दी जाए।

17 मार्च, 1912 को इस विधेयक पर तीव्र बहस हुई और दो दिन के बहस के बाद यह प्रस्ताव 13 वोटों के मुकाबले 38 वोटों से गिर गया और गोखले का यह प्रस्ताव असफल हो गया। हरकोर्ट बटलर ने इस बिल का तीव्र विरोध किया और कहा कि देश अभी इस योजना के लिये तैयार नहीं है।

गोखले के इन प्रयासों का बड़ा प्रभाव पड़ा। पं० मालवीय तथा श्री जिला जैसे राष्ट्रीय नेताओं ने गोखले के प्रयासों का खूब समर्थन किया। इससे भारतीय जनता पर गहरा प्रभाव पड़ा। जनता के विचारों के कारण सरकार को सन् 1913 में अपनी शिक्षा नीति में उल्लेखनीय परिवर्तन करना पड़ा। इस नवीन शिक्षा नीति में प्राथमिक शिक्षा से सम्बन्धित निम्नलिखित बातें रखी गई

  1. अध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए और अधिक सुविधायें प्रस्तुत की जायें।
  2. प्राथमिक विद्यालयों की संख्या में वृद्धि की जाए।
  3. इन विद्यालयों के पाठ्यक्रम को विस्तृत तथा उपयोगी बनाया जाए।
  4. बालिकाओं के लिए पृथक पाठ्यक्रम बनाये जायें।

ई-लर्निंग की विशेषताएं बताइए ।

गोखले के बिल का प्रभाव-

गोखले के विधेयक ने देश में क्रान्ति फैला दी। केन्द्र सरकार अब महसूस करने लगी कि देश में प्राथमिक शिक्षा की माँग तीव्र होती जा रही है, अतः केन्द्र सरकार ने प्रान्तीय सरकारों को आदेश दिया कि वे प्राथमिक शिक्षा की ओर ध्यान दें। फलस्वरूप प्रान्तीय सरकारों ने प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य बनाने के लिए अनिवार्य शिक्षा अधिनियम पारित किया। सभी बड़े-बड़े प्रान्तों में प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य कर दी गयी। यह इस बिल का ही प्रभाव था कि जार्ज पंचम जब 1911-12 ई. में भारत आये थे, उस समय एक लाख रुपये के अनुदान की वृद्धि शिक्षा प्रसार हेतु हुई थी। सम्राट ने भी कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा भेंट किये मानपत्र का उत्तर देते हुए शिक्षा-विस्तार की माँग को स्वीकार कर लिया और कहा कि, “मेरी इच्छा है कि भारत में स्कूलों का जाल बिछ जाये और मेरी भारतीय प्रजा कृषि तथा अन्य व्यवसाय में लग सके तथा उसमें वीर राज-भक्त और योग्य नागरिकों का जन्म हो।”

विधेयक का भारतीय जनता पर भी प्रभाव पड़ा। शिक्षित समाज तथा राजनैतिक दल भी प्राथमिक शिक्षा में रुचि लेने लगे। को प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य बनाने की तीव्र माँग को देखते हुए 21 फरवरी, 1913 सरकार अपने शिक्षा नीति सम्बन्धी प्रस्ताव पुनः विचार करके प्रकाश में लायी। इस प्रस्ताव के अनुसार शिक्षा नीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन करने पड़े, जिसमें प्राथमिक शिक्षा में प्रगति एवं विस्तार सम्बन्धी सिफारिशें, स्थानीय संस्थाओं द्वारा प्राथमिक स्कूलों का निर्माण हुआ। इस नीति के मुख्य सुझाव निम्नांकित थे

  1. प्राथमिक शिक्षा से पहले प्राथमिक विद्यालयों का विकास एवं विस्तार किया जाये।
  2. स्कूल के शिक्षकों के प्रशिक्षण की समुचित व्यवस्था की जाये।
  3. नगरीय एवं ग्रामीण स्कूलों का पाठ्यक्रम स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार हो।
  4. इन विद्यालयों के पाठ्यक्रम को विस्तृत तथा उपयोगी बनाया जाये। 1912 ई० से 1917 ई० के मध्य प्राथमिक शिक्षा का पर्याप्त विकास हुआ।

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