मुद्रा स्फीति किसे कहते हैं? मुद्रा स्फीति के नियंत्रण के लिए मौद्रिक एवं राजकोषीय उपयोग की व्याख्या।

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मुद्रा स्फीति की परिभाषा

उस स्थिति को मुद्रा स्फीति कहा जाता है जब मुद्रा का परिमाण बढ़ जाता है। बहुत अधिक मुद्रा बहुत कम वस्तुओं का पीछा करती है। ऐसी स्थिति में सरकारी बजट में लगातार घटा रहता है। एमिली जेम्स के अनुसार, “पूर्ति की क्षमता की तुलना में माँग अतिरेक के कारण कीमतों में अपने को बनाए रखने वाली तथा न उलटने वाली वृद्धि को मुद्रा स्फीति कहते हैं।”

केमर के अनुसार, ‘मुद्रा प्रसार वह स्थिति है जिसमें किये जाने वाले व्यापार की तुलना चलन तथा निरपेक्ष मुद्रा की मात्रा से अधिक हो।

केमर

पीगू – मुद्रा प्रसार की स्थिति उस समय होती है जब मौद्रिक आय उत्पादन की तुलना में बढ़ रही हो।

पीगू

पाल ऐन्विग ‘मुद्रा प्रसार की वह स्थिति है जिसमें क्रयशक्ति का विस्तार मूल्य स्तर में वृद्धि की प्रवृति दिखलाता है।

पाल ऐन्विग

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मुद्रा स्फीति के कारण

मौद्रिक कारण किसी देश में मुद्रा प्रसार की स्थिति उस समय उत्पन्न होती है जबकि लोगों की मौद्रिक आय में वृद्धि होती है। मौद्रिक आय में वृद्धि होने के निम्नलिखित कारण हैं-

  1. बैंक की मुद्रा साख सम्बन्धी नीति- सरकार कभी-कभी संकट काल में मुद्रा अधिक निर्गमन करती है जिससे विनियोग प्रोत्साहित हो सके और देश में विकास हो सके, इससे मुद्रा प्रसार होता है।
  2. हीनार्थ प्रबन्धन- सरकार के व्यय जब आय से अधिक हो जाते हैं तो उसे घाटे का बजट या हीनार्थ प्रबन्धन कहते हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार अधिक मात्रा में पत्र मुद्रा का निर्गमन करती है इससे लोगों की मौद्रिक आय में वृद्धि हो जाती है और मुद्रा प्रसार की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  3. प्राकृतिक कारण- कभी-कभी देश में नये-नये स्वर्ण तथा रजत का नयी-नयी खानें निकलती हैं और जब देश स्वर्ण तथा रजत धातुमान पर होता है तो मुद्रा की मात्रा में वृद्धि हो जाती है और इससे मुद्रा प्रसार होता है।
  4. मुदा की चलन गति- मुद्रा प्रसार की स्थिति उस समय भी उत्पन्न होती है जब लोगों में तरलता पसन्दगी कम होती है और मुद्रा का चलन वेग बढ़ जाता है।
  5. व्यापारिक बैंकों का व्यवहार- व्यापारिक बैंकों के व्यवहार से भी मुद्रा प्रसार की स्थिति उत्पन्न होती है क्योंकि जब बैंक द्वारा साख का अधिक निर्माण होता है तो उसका ठीक वितरण नहीं हो पाता और मुद्रा प्रसार होने लगता है।
  6. लाभ में वृद्धि- कभी-कभी उत्पादकों की मात्रा में लाभ होने लगता है जिससे विनियोग भी बढ़ता है तथा मुद्रा प्रसार की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  7. मजदूरी में वृद्धि- कभी-कभी ऐसा भी होता है कि श्रमिक संघ अधिक शक्तिशाली – हो जाते हैं और वे सामूहिक सौदेबाजी के द्वारा श्रमिकों के वेतन में वृद्धि करवाते हैं और मुद्रा प्रसार की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

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मुद्रा स्फीति उत्पादन सम्बन्धी कारण

मुद्रा प्रसार की स्थिति उस समय भी उत्पन्न होती है जब देश में उत्पादन की कमी हो जाती है, जिससे वस्तुओं की कमी हो जाती है और उनके मूल्यों में वृद्धि होने लगती है। उत्पादन में कमी होने के कारण निम्नलिखित हैं-

  1. दैवी प्रकोप- जब देश में सूखा पड़ता है या बाढ़ आती है तो उससे फसल नष्ट हो जाती है और उद्योगों को कच्चा माल पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाता है, जिससे वस्तुओं के दाम बढ़ जाते हैं और मुद्रा प्रसार की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  2. औद्योगिक संघर्ष- श्रमिक संघों के शक्तिशाली होने से श्रमिकों में असन्तोष से तथा सेवायोजकों के श्रमिकों के प्रति शोषण का व्यवहार करने से औद्योगिक क्षेत्र में हड़ताल या तालाबन्दी होती है जिससे उत्पादन की मात्रा गिरने लगती है और वस्तुओं के दाम भी बढ़ जाते हैं और मुद्रा प्रसार की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  3. उत्पादन ह्रास नियम की कार्यशीलता- उत्पादन के क्षेत्रों में जब उत्पादन के घटने का नियम कार्यशील होने लता है तो मूल्य में वृद्धि होने लगती है। इससे मुद्रा प्रसार की स्थिति होने लगती है।
  4. उत्पादन प्रणाली में परिवर्तन- जब उत्पादन प्रणाली में अन्तर होने लगता है तो इसका प्रभाव मूल्य स्तर पर पड़ता है और कभी-कभी उत्पादन में कमी हो जाती है और जिसके फलस्वरूप मूल्य में वृद्धि होती है।
  5. सरकारी नीति- कभी-कभी सरकार की नीतियों का भी प्रभाव उत्पादन पर पड़ता है। जब उत्पादन पर सरकारी नियंत्रण अधिक होने लगता है तथा आयात पर प्रतिबन्ध होने लगते हैं तो देश में वस्तुओं की कमी होने लगती है और मुद्रा प्रसार की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

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मुद्रा स्फीति अन्य कारण

  1. जनसंख्या में वृद्धि – जब देश में अधिक जनसंख्या बढ़ने लगती है और उस अनुपात में उत्पादन में वृद्धि नहीं होती है तो मुद्रा प्रसार की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  2. युद्ध- कभी-कभी देश में आन्तरिक युद्ध छिड़ जाता है और देश की दशा अस्त व्यस्त हो जाती है और कभी अन्तर्राष्ट्रीय युद्ध होने से सम्पूर्ण विश्व की आयात-निर्यात प्रणाली में अन्तर हो जाता है। जिससे मुद्रा प्रसार की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  3. योजनाबद्ध विकास- जब देश में आर्थिक नियोजन की प्रणाली कार्यशील होती है तो उसमें बहुत ही बड़ी धनराशि की आवश्यकता पड़ती है। इससे देश की मुद्रा की मात्रा में वृद्धि करना पड़ता है और मुद्रा प्रसार की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

मुद्रा प्रसार का प्रभाव

मुद्रा प्रसार का प्रभाव देश के लगभग सभी वर्ग के ऊपर पड़ता है। कुछ वर्ग पर इसका प्रभाव अच्छा पड़ता है और कुछ वर्ग पर इसका प्रभाव बुरा पड़ता है। इसलिए मुद्रा प्रसार को अन्यायपूर्ण भी कहा गया है। नीचे मुद्रा प्रसार के प्रभावों का वर्णन किया गया है।

  1. उत्पादक तथा व्यापारी वर्ग का प्रभाव- मुद्रा प्रसार का प्रभाव उत्पादक तथा व्यापारी वर्ग पर अच्छा पड़ता है। इन वर्गों को इस परिस्थिति में विशेष लाभ होता है, क्योंकि एक ओर तो वस्तुओं की मांग बढ़ती है और दूसरी ओर उत्पादन लागत में कमी होती है।
  2. विनियोग वर्ग पर प्रभाव- विनियोगी दो प्रकार के होते हैं प्रथम प्रकार के विनियोगी वे हैं जो अपने विनियोगों पर निश्चित मात्रा या प्रतिशत में लाभ प्राप्त करते हैं। ऐसे विनियोगों को मुद्रा प्रसार की स्थिति में विशेष लाभ नहीं होता। दूसरे प्रकार के वे विनियोगी हैं। जिनकी लाभ की मात्रा निश्चित नहीं होती, ऐसी विनियोगों को मुद्रा प्रसार की स्थिति में अधिक लाभ होता है।
  1. श्रमिक तथा निश्चित आय वर्ग पर प्रभाव- श्रमिक वर्ग को व निश्चित आय के कर्मचारियों को मुद्रा प्रसारर की स्थिति में हानि ही होती है क्योंकि उनकी वास्तविक आय वस्तुओं के मूल्यों के बढ़ने के कारण घटती जाती है।
  2. उपभोक्ता वर्ग पर प्रभाव- मुद्रा प्रसार की स्थिति में उपभोक्ता वर्ग हानि में रहता – है, क्योंकि एक ओर तो वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि होती है और दूसरी ओर वस्तुओं की कमी के कारण उनमें मिलावट होती है।
  3. ऋणी तथा ऋणदाता वर्ग पर प्रभाव- मुद्रा प्रसार की अवस्था में मुद्रा का मूल्य कम हो जाने से ऋणदाताओं को हानि होती है।

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अन्य प्रभाव

  • सामान्य जनता को मूल्य में वृद्धि के कारण तथा वस्तुओं की कमी के कारण असन्तोष होता है।
  • इस अवस्था में औद्योगिक विकास होता है तथा व्यापार की प्रगति में कष्ट होता है।
  • कृषक वर्ग को मुद्रा प्रसार की स्थिति में लाभ होता है।
  • सरकार को इस काल में अधिक व्यय करना पड़ता है, जिसके लिए सरकार करों में वृद्धि करती है और नये कर लगाती है। इससे समस्त जनता को कष्ट होता है।
  • मुद्रा प्रसार की स्थिति में देश में निर्यात व्यापार में कमी तथा आयात व्यापार में वृद्धि होती है, जिसके परिणामस्वरूप भुगतान सन्तुलन विपक्ष में हो जाता है।
  • मुद्रा प्रसार में अनैतिकता में वृद्धि होती है। चोरबाजारी को तथा वस्तुओं में मिलावट आदि को प्रोत्साहन मिलता है।
  • इस काल में अमीर अधिक अमीर हो जाते हैं तथा गरीब अधिक गरीहब हो जाते हैं।
  • इस काल में राजनैतिक वातावरण बड़ा दूषित होता है। इसके साथ ही साथ औद्योगिक अशान्ति भी उत्पन्न हो जाती है।
  • मुद्रा प्रसार की स्थिति में वस्तुओं का संग्रह अधिक होता है तथा मुद्रा का संग्रह कम होता है। इसका प्रभाव विनियोग पर बुरा पड़ता है।
  • इस काल में रोजगार तथा आय में अधिक वृद्धि होती है।

मुद्रा प्रसार को नियंत्रित करने वाले उपाय

मुद्रा प्रसार को रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय हैं-

  • मुद्रा की चलन तथा चलनगति में कमी की जानी चाहिए।
  • साख निर्माण तथा वितरण व्यवस्था में विशेष नियंत्रण होना चाहिए।
  • सरकार को विभिन्न प्रकार की बचत योजनायें कार्यान्वित करनी चाहिए।
  • सार्वजनिक ऋणों में वृद्धि की जानी चाहिए।
  • वस्तुओं तथा सेवाओं के उत्पादन को बढ़ाना चाहिए।
  • वस्तुओं के मूल्यों को नियंत्रित करना चाहिए।
  • आवश्यक वस्तुओं के संचय पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।
  • प्रत्यक्ष करों में वृद्धि की जानी चाहिए।
  • आयात में वृद्धि तथा निर्यात में कमी की जानी चाहिए।
  • घाटे के बजट को नहीं बनाना चाहिए।
  • सरकार को ऋण पत्र प्रकाशित करने चाहिए तथा जनता को यह पत्र क्रय करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

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