भीम द्वितीय चालुक्य वंश का महान शासक था।” वर्णन कीजिए।

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भीम द्वितीय चालुक्य वंशीय शासक था। वह 1178ई. में अपने भाई मूलराज द्वितीय के बाद सिंहासन पर बैठा। उसका शासनकाल 1178 ई. से 1247 ई. तक था। भीम द्वितीय एक महान शासक था। अपने शासक काल में उसने अनेक महत्वपूर्ण विजय प्राप्त की।

भीम द्वितीय की उपलब्धियाँ: भीम द्वितीय का शासनकाल उपलब्धियों से भरा रहा है। उसकी प्रमुख उपलब्धियाँ निम्नलिखित श्री

(1 ) चाहमानों से युद्धः

भीम द्वितीय का पहला संघर्ष चाहमान शासक पृथ्वीराज तृतीय के साथ हुआ। चन्द्रवरदायी दोनों के बीच युद्ध का कारण भीम की जैत्र परमार की पुत्री से विवाह की इच्छा को बताया है जिसकी मंगनी पहले ही पृथ्वीराज तृतीय के साथ हो चुकी थी। वरदायी यह भी बताता है कि प्रतिष्ठा के लिये होने वाले इस युद्ध में भीम ने पृथ्वीराज के पिता सोमेश्वर को मार डाला बदले में पृथ्वीराज ने भीम को मार डाला। लेकिन यह विवरण दोनों के बीच होने वाले संघर्ष की वास्तविक व्याख्या नहीं करता। वास्तव में युद्ध का वास्तविक कारण आबू और नागौर के क्षेत्र पर अपना-अपना आधिपत्य स्थापित करने का प्रयत्न था। इसी मुद्दे को लेकर दोनों में संघर्ष हुआ। इस युद्ध का कोई निर्णय न हो पाया।

(2) परमारों के साथ संघर्षः

भीम द्वितीय को परमार वंशीय शासकों के आक्रमणों का भी सामना करना पड़ा। गुजरात पर मुस्लिम आक्रमण से उत्पन्ना स्थिति का लाभ उठाते हुये परमार विन्ध्यवर्मा ने धारा पर अधिकार कर लिया। यही नहीं विन्ध्यवर्मा के पुत्र सुभट्ट वर्मा ने 1190 ई. में लाट और अन्हिलवाड़ पर भी धावा बोला। लेकिन भीम के सामंत लवणा प्रसाद ने उस आक्रमण को विफल कर दिया।

(3) यादवों से युद्ध:

परमारों के आक्रमण के समय ही देवगिरि के यादव शासक पंचम मिल्ल ने दक्षिणी गुजरात तथा लाट क्षेत्रों पर आक्रमण कर दिया। सौभाग्य से भीम की ओर से लवणाप्रसाद जैसा योग्य मंत्री उपस्थित हुआ। जिसने अपने गुप्तचरों के माध्यम से सिंहण को संधि के लिये विवश कर दिया। उस संधि के तहत परस्पर अनाक्रमण, तीसरी सत्ता के आक्रमण के समय एक दूसरे का सहयोग तथा दूसरे की राज्य सीमाओं को अतिक्रमण न करने का प्रावधान किया गया इस प्रकार लवणा प्रसाद ने चालुक्य राज्य की रक्षा की।

(4) तुर्कों से संघर्षः

भीम द्वितीय को तुर्कों से भी संघर्ष करना पड़ा 1178ई. में मुद्द गौरी के नेतृत्व में तुर्कों ने उसके राज्य पर आक्रमण कर दिया। लेकिन काशहद के मैदान में भीम द्वितीय ने उन्हें बुरी तरह पराजित किया। भीम की उस सफलता के कारण मुस्लिम सेनायें वर्षों तक गुजरात पर पुनः आक्रमण करने की हिम्मत नहीं कर सकीं। लेकिन तराइन 1192ई. और चन्दावर 1194ई. के युद्धों में सफलता ने तुर्कों की महत्त्वाकांक्षा को बढ़ा दिया और वे भारत में अपनी सत्ता स्थायी बनाने के प्रयत्न करने लगे। 1195 ई. में कुतुबुद्दीन को अजमेर में सूचना मिली कि मेड़ों ने नाहरवाला (अन्हिलवाड़) के शासक से मिलकर मुसलमानों पर आक्रमण करने की योजना बना रहे हैं। कुतुबुद्दीन ने उस योजना को असफल कर देने के उद्देश्य से उन पर आक्रमण कर दिया लेकिन अन्हिलवाड़ की सेनाओं की मदद से मेड़ों ने उसे पराजित कर अजमेर तक खदेड़ दिया। कुतुबुद्दीन ने उसकी सूचना गजनी भेजी और वहाँ से एक विशाल सहायक सेना प्राप्त कर 1197 में पुनः गुजरात पर आक्रमण कर दिया। काशहद के निकट लड़े गये इस युद्ध में भीम पराजित हुआ और उसके पचास हजार सैनिक मारे गये तथा बीस हजार बन्दी बना लिये गये। लेकिन भीम द्वितीय ने शीघ्र ही अपना साम्राज्य पुनः तुर्कों से प्राप्त कर लिया।

हर्ष के शासन प्रबन्ध पर एक लेख लिखिए।

(5) आन्तरिक विद्रोहः

विभिन्ना युद्धों के कारण भीम द्वितीय के साम्राज्य की शक्ति काफी कमजोर हो गयी थी। ऐसी स्थिति में आन्तरिक विद्रोह का खतरा बढ़ गया। सिंहण के आक्रमण के समय में मारवाड़ में जालोर के उदयसिंह, गोडवड के सोम सिंह और धारावर्ष के चन्द्रावती जैसे सामंत स्वतंत्र होने के लिये प्रयत्न करने लगे। मेवाड़ का गुहिलोत शासक जैन सिंह ने चौलुक्य आधिपत्य को नकार कर अपने को महाराजधिराज कहने लगा। इसी प्रकार सौराष्ट्र में भीम सिंह ने भी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। लवणा प्रसाद तथा वीरधवल जैसे इन विद्रोहों को कुछ समय तक शान्त रखने में सफल रहे। लेकिन भीम की इन पर निर्भरता के कारण वास्तविक सत्ता उनके हाथों में चली गयी। भूमि के पश्चात् उसके मंत्री लवणा प्रसाद ने गुजरात में बघेल वंश की स्थापना की 1240ई. के लगभग उसके उत्तराधिकारियों ने अन्हिलवाड़ पर अधिकार कर लिया। शीघ्र ही यह सत्ता तुर्कों द्वारा हस्तगत कर ली गयी।

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