भारत में समाजशास्त्र के उद्भव एवं विकास का वर्णन कीजिए।

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भारत में समाजशास्त्र के उद्भव एवं विकास का वर्णन

समाजशास्त्र के उद्भव और विकास को समझने के लिए यह ध्यान रखना आवश्यकहै कि समाजशास्त्र हमारे सामाजिक जीवन, विभिन्न समूहों और समाजों का वैज्ञानिक अध्ययन है। एक सामाजिक विज्ञान होने के साथ ही यह एक मानविकी विज्ञान भी है। यह सामाजिक सम्बन्धों के विभिन्न स्वरूपों और उन्हें प्रभावित करने वाली दशाओं का वैज्ञानिक अध्ययन है। मानव की सामाजिक क्रियाओं की प्रकृति, मानव द्वारा विकसित विभिन्न सामाजिक संस्थाओं और सामाजिक घटनाओं की वास्तविकता को स्पष्ट करना इस विज्ञान का मुख्य कार्य है। इसके साथ ही यह सामाजिक संरचना, सामाजिक व्यवस्था, संस्कृति, सामाजिक मूल्यों और परिवर्तन की प्रक्रियाओं की प्रकृति को समझकर यह स्पष्ट करता है कि विभिन्न समाजों की प्रकृति एक-दूसरे से किस प्रकार भिन्न है। यह हम समाजशास्त्र के अध्ययन से सम्बन्धित इन पक्षों पर विचार करें तो अक्सर यह विवाद पैदा हो जाता है कि समाजशास्त्र के प्रादुर्भाव और विकास का आरम्भ यूरोप से माना जाये अथवा भारत से इससे सम्बन्धित प्रमुख आधारों तथा तथ्यों से वास्तविकता का मूल्यांकन किया जा सकता है। इस मूल्यांकन से यह भी स्पष्ट हो सकता है कि यूरोप के दृष्टिकोण से समाजशास्त्र का आधुनिक रूप भले ही अधिक पुराना न हो लेकिन भारत में समाजशास्त्र के प्रादुर्भाव और विकास का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है।

भारत में आज जैसे-जैसे नए सामाजिक अनुसंधान बढ़ते जा रहे हैं, उनसे प्राप्त होने वाले निष्कर्षो से यह प्रमाणित होने लगा है कि भारत में समाज के वैज्ञानिक ज्ञान का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। 21 वीं शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में अनेक समाजशास्त्रियों, भू-विज्ञानियों, भूगोलविदों, पुरातत्व के विशेषज्ञों, खगोलशास्त्रियों तथा इतिहासकारों की संयुक्त टीम के द्वारा भारतीय संस्कृति और अतीत के गर्भ में छिपे सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास के बारे में जो विस्तृत जानकारियाँ मिलीं, उनसे यह स्पष्ट होता है कि भारत की वैदिककालीन व्यवस्था में ही वैयक्तिक और सामाजिक जीवन को व्यवस्थित करने के लिए अनेक ऐसे सिद्धांत विकसित कर लिए गये थे जिन्हें आधुनिक समाजशास्त्र की कसौटियों पर भी वैज्ञानिक माना जा सकता है। दुनिया के किसी भी देश के वैज्ञानिक आज तक इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सके कि भारत में वेदों की रचना ईसा के कितने हजार वर्ष पहले हुई थी। अनेक शोध कार्यों से वाल्मीकि द्वारा ‘रामायण’ की रचना ईसा से 5000 वर्ष पहले होने के प्रमाण मिले हैं जिन्हें यूरोप के विशेषज्ञ स्वीकार नहीं करते। रामायणकालीन प्रमाणों से सम्बन्धित अनेक तथ्य अमेरिका के ‘नासा’ (दुनिया में वैज्ञानिक शोध का सबसे प्रमुख केन्द्र) द्वारा भी खोजे गये लेकिन विश्व-स्तर के संगठन इस विषय पर चुप रहे।

उत्तर- वैदिक काल में लिखे गये उपनिषद् उस महान तात्विक ज्ञान से भरे पड़े हैं। जिसे आज भी व्यक्ति और समाज पर नियंत्रण रखने वाली एक उपयोगी वैचारिकी के रूप में देखा जाता है। इस काल में ऋषियों के रूप में मान्यताप्राप्त सामाजिक अध्येताओं ने व्यक्ति और सम्मान के सम्बन्धों को अधिक स्थायी और प्रकार्यात्मक बनाने के लिए संयुक्त परिवार, आश्रम व्यवस्था और ग्रामीण गणतंत्र जैसी उन्नत व्यवस्थाओं को स्थापित किया। इसके साथ ही वैयक्तिक और सामाजिक जीवन को अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए पुरुषार्थ, कर्म और धर्म सम्बन्धी सिद्धांतों को विकसित किया गया। गीता एक ऐसा ऐतिहासिक ग्रन्थ है जिसमें कर्म के सिद्धांत को समाज के प्रति मानवीय कर्तव्यों और व्यावहारिक जीवन व्यतीत करने वाले मूल्यों की व्यापक विवेचना की गयी है। ऐसा लगता है कि पारसंस द्वारा प्रस्तुत ‘क्रिया का सिद्धांत’ इसी व्याख्या से प्रभावित हुआ। यदि पारसंस के सिद्धांत को एक प्रमुख समाजशास्त्रीय रचना माना जाता है तो गीता में प्रस्तुत कर्म के सिद्धांत की प्रकृति को समाजशास्त्रीय क्यों नहीं माना गया ? आज से लगभग 2300 वर्ष पहले जिन पुराणों और स्मृतियों की रचना हुई उनमें मानवीय अन्तर्क्रियाओं, विभिन्न समुदायों और समूहों, मानव प्रवृत्तियों, सामाजिक संस्थाओं तथा सामाजिक नीतियों का विस्तार से उल्लेख मिलता है। इनके द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया कि सामाजिक संस्थाएँ और विभिन्न प्रकार के सामाजिक मूल्य किस प्रकार व्यक्ति और समाज के सम्बन्धों को प्रभावित करते हैं। यदि समाजशास्त्र को आज सामाजिक सम्बन्धों और सामाजिक संरचना का वैज्ञानिक अध्ययन माना जाता है तो सुदूर अतीत में किये जाने वाले ऐसे सभी अध्ययनों पर आधारित व्यवस्थाओं को समाजशास्त्रीय मानना भी आवश्यक है।

समाजशास्त्रीय अध्ययन के क्षेत्र में यहाँ ईसा से लगभग 300 वर्ष पहले का समय बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस समय मौर्य युग में कौटिल्य ने अपने ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र’ रचना की। यह वह महान ग्रंथ है जिसमें समाज के सभी वर्गों के कर्तव्यों और अधिकारों का न सिरे से मूल्यांकन करके सामाजिक व्यवस्था में ऐसे परिवर्तन लाने के प्रयत्न किये गये जो कु हितसमूहों द्वारा वर्ण व्यवस्था की असमानता से पैदा होने वाली समस्याओं को दूर करने सम्बन्धित थे। इसी समय शुक्राचार्य ने भारतीय समाज के तत्कालीन कानूनों, प्रथाओं अर्थव्यवस्था, राजनीति, संस्कृति, नैतिकता तथा संस्कारों की वैज्ञानिक व्याख्या की। शुक्राचार्य अपने ग्रन्थ ‘नीतिशास्त्र’ में जिस तरह नैतिकता, सामाजिक प्रथाओं, व्यवहार के नियमों और “लोकाचारों का वर्णन किया, उनकी पृष्ठभूमि व्यावहारिक अनुभवों पर आधारित है। कौटिल्य और शुक्राचार्य ने अपनी रचनाओं में समाज के जिन पक्षों का आनुभविक अध्ययन करने सामाजिक व्यवस्था, गतिशीलता, मानवीय अन्तर्क्रियाओं और सामाजिक नियंत्रण पर ज महत्वपूर्ण विचार दिये, वे समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से भिन्न नहीं है। इस युग में चन्द्रगुप्त मौर्य के एक ग्रीक मंत्री मेगस्थनीज ने भारतीय समाज के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन से सम्बन्धित जो विवरण दिये हैं उन्हें भी ऐतिहासिक और आनुभविक पद्धति पर आधारित समाजशास्त्रीय तथ्य कहा जा सकता है। इस समय की रचनाओं में मनुस्मृति वह प्रमुख ग्रंथ है जिसमें सामाजिक अस्थिरता को दूर करने के लिए व्यक्ति और समाज, वर्ण व्यवस्था, आश्रम व्यवस्था, जीवन-पथा के संस्कारों, विवाह, परिवार, न्याय व्यवस्था, धर्म तथा व्यवहार प्रतिमानों की व्यापक विवेचना की गयी है। मनु ने यह समाजशास्त्रीय सिद्धांत सबसे पहले प्रतिपादित किया कि व्यक्ति अपनी सामाजिक व्यवस्था के अधीन है तथा सामाजिक व्यवस्था से पृथक रहकर उसका कोई अस्तित्व नहीं

है। यही वह विचारधारा है जिसे वर्तमान समाजशास्त्री ‘समाज की सावयवी विचारधारा’ कहते हैं। भारत में मौर्य और गुप्त साम्राज्यों का पतन हो जाने के बाद लगभग 1000 वर्ष का समय छोटे-छोटे राजाओं के बीच निरंतर युद्ध होते रहने के कारण चेतनाहीन हो गया। इसे ‘अंधयुग’ के रूप में जाना जाता है। इस बीच 16वीं शताब्दी में होने वाले भक्ति आंदोलन को ऐसा पुनर्जागरण कहा जा सकता है जब बहुत से संतों ने कवित्व की शैली में उन रूढ़ियों, कुरीतियों और अंधविश्वासों का विरोध करना आरम्भ किया जो समाज के निर्जीव ढाँचे में लगातार अपनी जड़ें जमाते जा रहे थे। भारतीय समाज और संस्कृति के इतिहास में होने वाला यह पहला सुधार आंदोलन था जिससे समाज के विभिन्न वर्गों में एक नयी सामाजिक चेतना पैदा होना आरम्भ हुई। यद्यपि इसका प्रभाव बहुत सीमित था ।

समाज का शिक्षा पर क्या प्रभाव है ? व्याख्या कीजिए।

उपर्युक्त प्रयत्नों के बाद भी प्राचीन भारत में सामाजिक व्यवस्था से सम्बन्धित जो अध्ययन किये गये, उन्हें पश्चिमी विचारकों द्वारा समाजशास्त्रीय नहीं माना गया। यह तर्क दिया गया कि भारत में वैदिककाल से लेकर स्मृतिकाल तक किये जाने वाले सामाजिक अध्ययनों का दृष्टिकोण सामाजिक न होकर धार्मिक था। दूसरा तर्क यह दिया गया कि प्राचीन भारत में विभिन्न धर्मग्रंथों में दी गयी सामाजिक व्यवस्थाओं का निर्माण कुछ पक्षपातपूर्ण मनोवृत्तियों के आधार पर किया गया तथा उनमें परस्पर विरोधी विचारों का समावेश है। इसके विपरीत, भारतीय समाजशास्त्री यह मानते है कि भारत में धर्म का अर्थ किसी अलौकिक विश्वास से न होकर व्यक्तियों को अपने कर्तव्यों का बोध कराने तथा उन्हीं कर्तव्यों के सन्दर्भ में जीवन की एक विशेष विधि को विकसित करने से है। जहाँ तक परस्पर विरोधी विचारों के समावेश का प्रश्न है, आज भी किसी एक विषय पर विभिन्न समाजशास्त्रियों द्वारा दिये गये सिद्धांतों और अध्ययन पद्धतियों के बारे में किसी तरह का एकमत नहीं है। विचारों की भिन्नता बौद्धिक परिपक्वता को दर्शाती है, पारस्परिक विरोध को नहीं। जैसा कि भारत के प्रमुख समाजशास्त्री डी.पी. मुकर्जी का कथन है। कि धर्म प्रत्येक समाज की संस्कृति का आधार होता है तथा सामाजिक तथ्यों की विवेचना धर्म या दूसरे शब्दों में परम्परा से हटकर नहीं की जा सकती।

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