भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के दोषों की विवेचना।

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इस अधिनियम द्वारा जहाँ भारत को स्वतन्त्रता प्राप्त हुई वहाँ भारत का विभाजन भी हुआ। इससे भारतीय उपमहाद्वीप की राष्ट्रीय एकता समाप्त हो गयी। देशी रियासतों पर से सर्वोच्च सत्ता को हटाकर उन्हें स्वतन्त्र कर देने के फलस्वरूप 600 रियासतों के एकीकरण की समस्या उत्पन्न हो गयी थी। भारत एवं पाकिस्तान नामक केवल दो देश ही बने, अपितु भारतवर्ष को भारत, पाक एवं 600 के करीब रियासतों के मध्य विभाजित (Balkanised) कर दिया गया था। इससे भविष्य में अनेक राजनीतिक समस्याएँ उठ खड़ी हुईं। एक बार भारत विभाजन को स्वीकार कर लेने के पश्चात् देश में जो साम्प्रदायिक उन्माद उमड़ा, उसने खून की नदियाँ बहा दीं विभाजन के समय की ये दुःखद स्मृतियाँ भारत एवं पाकिस्तान के सम्बन्धों को आज तक प्रभावित कर रही हैं। निःसंदेह इस प्रकार देश को स्वतन्त्रता देना साम्राज्यवादी प्रवृत्ति के प्रतिकूल है, फिर भी केवल एक सीमा तक इसके लिए ब्रिटिश शासन की प्रशंसा की जानी चाहिए।

प्लेटो के न्याय सम्बन्धी विचार व् प्लेटो के न्याय सिद्धान्त का वर्णन।

देश एवं विश्व रंगमंच की घटनाओं के कारण ब्रिटिश साम्राज्य भारत को स्वतन्त्र करने के लिए बाध्य था। लेकिन चलते-चलते अंग्रेज ‘विभाजन करो एवं शासन करो’ की परम्परा में विभाजन के रूप में ऐसी कुटिल चाल चल गये जिससे भविष्य में भी वे उपमहाद्वीप की राजनीति में हस्तक्षेप कर सकें। “स्वतन्त्रता के संघर्ष काल में मुस्लिम लीग ने कांग्रेसका विरोध करके ब्रिटिश साम्राज्यवाद की जो असीम सेवा की थी, उसके प्रतिकार के रूप में उसे पाकिस्तान ब्रिटिश से उपहार था।”

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