भारतीय समाज के अध्ययन के संरचनात्मक प्रकार्यात्मक उपागम की विवेचना

भारतीय समाजशास्त्र के अध्ययन के संरचनात्मक प्रकार्यात्मक उपागम

संरचनात्मक प्रकार्यात्मक उपगम ऐसा उपागम है जो भारतीय समाजशास्त्र के अध्ययन में सर्वप्रथम काम में आया। इस उपागम के माध्यम से भारत में समाजशास्त्र का सर्वाधिक समृद्ध तथा व्यवस्थित विकास के एक पक्ष की संरचना होती है। भारत में समाजशास्त्रीय अध्ययनों में संरचनात्मक प्रकार्यात्मक उपागम की दिशा में प्रारम्भिक रूप में कार्य ब्रिटिश समाजशास्त्रीय एवं सामाजिक मानवशास्त्रियों द्वारा आरम्भ किया गया था। अब तक भारत में संरचनात्मक प्रकार्यात्मक उपागम द्वारा अनेक अध्ययन सम्पन्न किये गये हैं। यद्यपि यह उपागम अपने मूल रूप में सामाजिक मानवशास्त्रीय ही रहा है तथापि बाद में समाजशास्त्रियों ने इस उपागम का अधिक उपयोग किया है।

भारत में ग्रामीण समुदाय उनकी धार्मिक संस्थाओं तथा कर्मकाण्ड शक्ति का परिवर्तनकारी स्वरूप, नेतृत्व तथा संचार के अध्ययन की ओर केन्द्रित रही है। नगरीय पारिवारिक संरचना तथा परिवर्तन के क्षेत्र में भी कुछ अध्ययन किये गये हैं। भारतीय समाज के अध्ययन के लिये उपागम का प्रयोग करने वाले प्रमुख भारतीय समाजशास्त्रियों में श्री एम. एन. श्रीनिवास, श्री श्यामाचरण दुबे, तथा श्री डी. एम. मजूमदार के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। प्रो. योगेन्द्र सिंह ने अपने लेख ‘भारत के लिये समाजशास्त्र’ में अनेक भारतीय समाजशास्त्रियों के कार्यों को संरचनात्मक प्रकार्यात्मक कोटि में रखा है। प्रो. एस. सी. दुबे का ‘इण्डियन विलेज’ तथा ‘ग्रामीण परिवर्तन के विश्लेषण, ‘अमंग द कुर्स ऑफ साउथ इण्डिया बेली की ‘कास्ट एण्ड द इकोनॉमिक फ्रन्टियर: ट्राइब कास्ट एण्ड नेशन’ तथा पोलिटिक्स एण्ड सोशियल चेंज इन साउस इण्डियन विलेज आदि कुछ महत्वपूर्ण अध्ययन हैं जिन्होंने संरचनात्मक प्रकार्यात्मक उपागम का प्रयोग किया है।

मेरियट द्वारा सम्पादित ग्रंथ ‘विलेज इण्डिया स्टडीज इन द लिटिल कम्युनिटी’ त श्रीनिवास द्वारा सम्पादित ‘इण्डियाज विलेजेज’ गांवों पर अनेक लेखों का संकलन किया गया है। जिसका अध्ययन इसी विषय परिधि के आधार पर किया गया है। इसी प्रकार ए.डी. रॉस क ‘फेमिली इन एन अर्बन सेटिंग’ में भारत में परिवार में होने वाले परिवर्तन के अध्ययन प्रकार्यात्मक विश्लेषण के प्रयोग का अच्छा उदाहरण देखने को मिलता है। इरावती कर्वे ‘किनशिप ऑर्गेनाइजेशन इन इण्डिया’ भी इसी प्रकार की है। यद्यपि इसमें ‘आइडिल टाइप’ अवधारणाओं का भी प्रयोग किया गया है।

आदिवासियों के अध्ययन में भी मानवशास्त्रियों द्वारा यह अनुस्थापन देखने को मिलत है। इसके अतिरिक्त डी. एन. मजूमदार की ‘रूरल प्रोफाइल’ तथा ‘कास्ट एण्ड कम्युनिकेशन तथा अन्य शोध प्रबंधों में भी इस उपागम का प्रयोग किया गया है।

भारत में संरचनात्मक प्रकार्यात्मक समाजशास्त्रीय अध्ययनों की प्रमुख विशेषताओं भारतीय समाज के अध्ययन में संरचनात्मक प्रकार्यात्मक उपागम को प्रयोग में लेते हुए अनेक समाजशास्त्रियों ने विभिन्न अध्ययन किये हैं। डॉ. योगेन्द्र सिंह ने अपने लेख में बताया है कि इन

अध्ययनों की निम्न विशेषतायें बतायी जा सकती हैं

(1) आन्तरिक प्रकार्यात्मक समाकलित तथा मिश्रित वैशिष्य सामाजिक घटना के अध्ययन पर बल-इन अध्ययनों में ऐसी सामाजिक घटना के अध्ययन पर बल दिया गया जो कालातीत अथवा ऐसी उप व्यवस्था हो जिसमें प्रकार्यात्मक समाकलन तथा मिश्रित वैशिष्य हो।

(2) आन्तरिक संरचना के विश्लेषण की ओर व्यवस्थित प्रयास- भारतीय समाज के अध्ययन में संरचनात्मक प्रकार्यात्मक उपागम का प्रयोग जिन विद्वानों ने अपने विभिन्न अध्ययनों में किया है, उनकी एक प्रमुख विशेषता यह बताई जा सकती है कि इन अध्ययनों के द्वारा भारतीय सामाजिक संरचना के विश्लेषण की ओर व्यवस्थित प्रयास किया गया है जिसमें परियार, जाति, जनजाति के समूह शक्ति संगठन, दलबंदियां आदि सम्मिलित है तथा जिनमें सांस्कृतिक प्रणालियाँ अपने स्वाभाविक अन्त: श्रृंखलीकरण तथा पारस्परिक अन्तःक्रियाओं की संज्ञाओं में हो तथा उनमें कर्मकाण्ड मूल्य तथा विश्वास आदि सम्मिलित हैं।

(3) प्रसारवादी आधार पर परिवर्तन का विश्लेषण – इन अध्ययनों में ऐतिहासिक इन्द्रात्मक की अपेक्षा प्रसारवादी आधार पर परिवर्तन का विश्लेषण किया गया है। प्रसारवादी आधार पर परिवर्तन के विश्लेषण में यह अनुमान किया जाता है कि सामाजिक उ परिवर्तन, विरोधी शक्तियों तथा यदाकदा होने वाले असंतुलन तथा विशेषताओं के द्वारा क्रियाशील होने की अपेक्षा अधिकार संचयी तथा आत्मवरणीय लक्षण को प्रकट करता है।

(4) सामाजिक घटनाओं का गहन विश्लेषण- डॉ. योगेन्द्र सिंह ने भारतीय समाज के संरचनात्मक प्रकार्यात्मक अध्ययनों का एक अन्य लक्षण यह बताया है कि यह वैज्ञानिक पर्यवेक्षण की एक समृद्ध परम्परा है तथा इसके अध्ययन गहन सामाजिक घटनाओं के विश्लेषण पर आधारित है और ये विश्लेषण प्रत्यक्ष क्षेत्रीय अध्ययनों तथा सहभागिक पर्यवेक्षण के माध्यम पर आधारित है।

वैज्ञानिक समाजशास्त्रीय विश्लेषण के क्षेत्र में भारतीय समाजशास्त्र के इस अनुस्थापन का भारत में सामाजिक अनुसंधान की परम्परा पर सर्वाधिक गम्भीर तथा स्थायी संघात पड़ा है यद्यपि अब तक किये गये अध्ययन स्थानीय अथवा लघु क्षेत्रीय मण्डल के हैं तथापि अवधारणायें ऐसी हैं जिन्हें सामाजिक परिवर्तन के विश्लेषण के लिये प्रयोग किया गया है जैसे- श्रीनिवास की संस्कृतिकरण तथा पश्चिमीकरण की अवधारणा मेरियट की सार्वभौमिकरण तथा स्थानीयकरण स की अवधारणा एस. सी. दुबे की अन्तःक्रियात्मक सांस्कृतिक परम्पराओं के श्रेणीबद्ध स्तरों का अवधारणा तथा बेली की सेतु संक्रिया की अवधारणा आदि।

यद्यपि इन अध्ययनों की अनेक सीमायें है तथापि केवल ये ही कार्यकारी अवधारणा प्रदान करते हैं और भारत में वैज्ञानिक ढंग से समाजशास्त्रीय अध्ययन जारी रखने के लिये क्रियाशील परिधि प्रस्तुत करते हैं।

भारतीय समाज के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य (दृष्टिकोण) पर प्रकाश डालिए।

भारत में समाजशास्त्र की समृद्धि के लिये संरचनात्मक प्रकार्यात्मक उपागम का योगदान- संरचनात्मक प्रकार्यात्मक उपागम ने भारत में समाजशास्त्र की समृद्धि के लिये अनेक प्रकार से योगदान दिया है। इसे निम्नलिखित बिन्दुओं के अन्तर्गत स्पष्ट किया गया है।

  1. सांस्कृतिक तथ्यों तथा नृजातीय अभिलेखों का संग्रह- इस उपागम के प्रयोग 5 के अन्तर समाज के विभिन्न क्षेत्रों में सांस्कृतिक तथ्यों नृजातीय अभिलेखों का संग्रह किया गया, जिससे उनकी तुलना तथा विश्लेषण किया जा सके।
  2. पर्यवेक्षण की वैज्ञानिक तथा व्यवस्थित पद्धति का प्रारम्भ- इस उपागम के प्रयोग के अनन्तर ही ऐतिहासिक अनुमानों के प्रतिकारक के रूप में पर्यवेक्षण की वैज्ञानिक तथा व्यवस्थित पद्धति का शुभारम्भ हो सका है।
  3. समाजशास्त्र की प्रतित्र को बढ़ाना-संरचनात्मक प्रकार्यात्मक उपागम के आधार पर हुए भारतीय समाज के अनेक क्षेत्रों के अध्ययनों ने तात्कालिक व्यावहारिक तथा नीति विषयक समस्याओं में समाजशास्त्र की रुचि प्रदर्शित कर जनता तथा प्रशासकों की आंखों में समाजशास्त्र की प्रतित्र की अभिवृद्धि की है। अतिलघु एवं

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