भारतीय ग्राम समाज की बनावट/संयोजन पर प्रकाश डालिए।

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भारतीय ग्राम समाज की बनावट/संयोजन – ग्राम से हमारा तात्पर्य उस थोड़ी जनसंख्या वाले छोटे क्षेत्र से है, जहाँ कृषि लोगों का मात्र व्यवसाय ही नहीं, वरन उनकी जीवन-पद्धति भी है। ग्राम मनुष्य का प्राचीनतम समुदाय है। ऐसी कोई मानव प्रजाति या किसी राष्ट्र नहीं है, जिसमें ग्रामीण समुदाय का युग न रहा हो। मानव समाज का पालन-पोषण ग्रामीण समुदायों में ही हुआ है। भारत में जनजीवन के प्रारम्भ से ही देहात / ग्राम की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। भारत को उचित ही देहातों का देश’ कहा गया है, क्योंकि इसकी अधिकांश जनसंख्या अब भी देहातों में निवास कर अब भी देहातों में निवास करती है।

भारत में शिक्षा में समानता का क्या अर्थ है ? शिक्षा में समानता की क्या अथवा आवश्यकता है ? शिक्षा में समानता लाने के कुछ उपाय बताइये।

भारतीय ग्रामों की मुख्य विशेषताएँ

  1. एकाकीकरण या पृथकता और आत्मनिर्भरता।
  2. सादगी शांति और चैनपूर्वक जौवन-यापन।
  3. रूढ़िवादी दृष्टिकोण।
  4. निर्धनता और निरक्षरता ।
  5. स्थानीय स्वशासन
  6. शक्तिशाली परम्पराएँ1
  7. प्रकृति में विश्वास और लगाव
  8. भाग्यवाद में दृढ विश्वास
  9. अपरिवर्तनशील कार्यप्रणालियाँ।
  10. जनसंख्या की समरूपता।
  11. समुदाय का लघु आकार।
  12. श्रम का विशेषीकरण।
  13. कृषि ही प्रमुख व्यवसाय
  14. सामुदायिक भावनाएँ आदि।

ग्रामीण समाज की संरचना एवं संगठन-

ग्रामीण समाज की संरचना और संयोजन के सन्दर्भ में निम्नलिखित संस्थाएँ उल्लेखनीय है

(1) ग्रामीण परिवार व नातेदारी– भारत के देहात/ ग्राम निर्विवाद रूप से पारिवारिक इकाई पर ही निर्भर करते हैं तथा सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था अन्ततः ग्रामीण परिवार से ही सम्बन्धित होती है। आधारभूत और प्राथमिक सामाजिक समूह के रूप में भी हम इसको ग्रामीण सामाजिक संरचना का प्रमुख आधार स्वीकार कर सकते हैं। ग्रामीण समाज में प्रचलित संयुक्त परिवार व्यवस्थ एवं इसके अन्तर्गत निवास करने वाले विभिन्न सदस्यों में निहित पारस्परिक अन्तःसंबंधी ही नातेदारी नामक सामाजिक संस्था का निर्माण भी करते हैं।

(2) ग्रामीण विवाह की संस्था– भारतीय ग्रामों में अति प्रारम्भ से ही विवाह नामक सामाजिक संस्था को एक अप्रतिम स्थान प्राप्त रहा है, क्योंकि हिन्दू सामाजिक व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में विवाह प्रथा के माध्यम से ही दो संयुक्त परिवारों के सभी सदस्यों में नवीन सम्बन्धों तथा व्यवहारों का विकास होता है। इसी प्रकार भारतीय ग्रामों में प्रचलित कतिपय विशिष्ट वैवाहिक मान्यताएँ और निषेध की कुछ पद्धतियाँ की ओर हमें आकर्षित करते हैं। ग्रामीण समाज में प्रचलित सजातीय विवाह, ग्रामीण बहिर्विवाह दहेज यथा तथा बाल विवाह इसके ज्वलन्त उदाहरण माने जा सकते हैं।

(3) जाति व्यवस्था -भारतीय ग्रामीण सामाजिक संरचना में अति प्रारम्भ से ही जाति प्रथा को एक अति विशिष्ट और निर्माणक संस्था माना जाता है, क्योंकि भारतीय समाज में प्रचलित जाति व्यवस्था भारतीय ग्रामों में एकता, संगठन, संस्तरण, वर्गीकरण एवं पारस्परिक भेदभावों, सहानुभूति एवं तनावों तथा विभिन्न प्रकार के व्यवहारों की आधारभूत शिला मानी जाती रही है। जाति प्रथा के द्वारा ही विभिन्न प्रकार के ग्रामीण समूहों में खान-पान और रहन-सहन और ऊँच-नीच आदि का निर्धारण भी होता रहा है।

(4) प्रबल जाति– ग्रामीण क्षेत्रों के परिप्रेक्ष्य में निहित प्रबल जाति वस्तुतः एक ऐसी शक्ति का प्रतीक होती है, जो कि ग्रामीण जीवन के सभी पक्षों पर एकाधिकारी प्रभुत्व और नियंत्रण स्थापित करती है तथा इस क्षेत्र में उसी को सर्वोत्तम जाति माना जाता है। प्रबल जाति का एक पृथक और सर्वथा विशिष्ट व्यवाय भी होता है।

(5) जजमानी व्यवस्था– भारतवर्ष के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली विभिन्न जातियों में वंशानुगत अथवा पैतृक रूप से पिछली कई पीढ़ियों से अपने जजमानों के परिवारों में एक परम्परागत कार्य अथवा सेवा करने का विशिष्ट एकाधिकार भी प्रचलित है, जिसको जजमानी प्रथा कहा जाता है। यह जजमानी पीढ़ी दर पीढ़ी चलती आयी है, जिसके विनिमय में सेवक या परिजनों को उचित नजराना, फलाना। अथवा पुरस्कार आदि समयानुसार प्राप्त होते रहते हैं।

(6) जाति पंचायतें– भारतीय ग्रामीण सामाजिक संरचना में जाति पंचायतों की भी एक विशिष्ट भूमिका होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में सामान्यत: नांची और पिछड़ी जातियों में इस प्रकार की जाति पंचायते कुछ अधिक पाई जाती है, तथापि वर्तमान समय में ग्राम पंचायतों की स्थापना के परिणामस्वरूप इतकी संख्या उत्तरोत्तर कम होने लगी है।

ग्रामीण समुदाय में परिवर्तन

ग्रामीण समुदाय में वर्तमान समय में निम्नलिखित परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं-

  1. देहातों में जातियाँ अपने परम्परागत व्यवसाय को छोड़कर अन्य पेशों के प्रति आकर्षित हो गई है। जाति पंचायत का बंधन शिथिल हुआ है। खान-पान, जीवन पद्धति, वेश-भूषा सम्बन्धी जाति-आरोपित प्रतिबन्ध दूर हो गए हैं। अस्पृश्यता का बन्धन ढीला हो गया है। स्वार्थपूर्ण राजनीतिक हितों के कारण जाति प्रथा कमजोर, किन्तु जातिवाद सुदृढ़ हो रहा है।
  2. जजमानी प्रथा उत्तरोत्तर समाप्त होती जा रही है। ग्रामीणों द्वारा अपनाए गए व्यवसाय अब पूर्णत: आनुवंशिक नहीं है और न जातिप्रथा पर आधारित हैं। अब निम्न जातियों द्वारा प्रदत्त सेवाओं का भुगतान वस्तुओं के रूप में नहीं, बल्कि अधिकांशतः नकद रूप में किया जाता है।
  3. संयुक्त परिवारों का स्थान एकाकी परिवार लेते जा रहे हैं। परिवार आर्थिक इकाई नहीं रहा है। भोजन, वस्त्रों और विवाह के विषयों पर परिवार का नियंत्रण शिथिल होता जा रहा है।
  4. यद्यपि अन्तर्जातीय, प्रेम विवाह और तलाक नगण्य है, किन्तु जीवन-साथी के विषय में लड़के-लड़कियों से परामर्श किया जाने लगा है। बाल-विवाह और विवाह रीतियाँ कम हो गई हैं। विवाह के लिए अब शिक्षा, व्यवसाय, सुन्दरता पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
  5. गाँवों के लोगों का जीवन-स्तर धीरे-धीरे ऊँचा हो रहा है। खान-पान और वस्त्र नगरीकृत हो रहे हैं। प्रकाश घरों को आधुनिक स्वरूप दिया जाने लगा है। लोगों में स्वच्छता के प्रति रुचि बढ़ रही है। शिक्षा के स्तर में भी सुधार आ रहा है।
  6. आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तन हुए हैं। शिक्षित ग्रामीण कृषि के स्थान पर नगर में नौकरी/व्यापार को पसन्द करते हैं। खेती को वैज्ञानिक रूप दिया जा रहा है। सहकारी खेती के प्रति रुचि बढ़ी है, क्योंकि उससे सभी को लाभ होता है।
  7. पंचायतों की पुनर्स्थापना से राजनीतिक जागरूकता पैदा हुई है किन्तु गुटबाजी बढ़ने लगी है। सामुदायिक भावना कम हुयी है, जबकि स्वार्थवादिता और व्यक्तिवादिता बढ़ने लगी है।

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