प्राचीन कालीन शिक्षक के महत्त्व की विवेचनात्मक वर्णन कीजिए।

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शिक्षक की अवधारणा (महत्व)

प्राचीन कालीन शिक्षक के महत्त्व वैदिक शिक्षा में गुरु का पर्याप्त महत्त्व था। गुरु के अभाव में ज्ञान असंभव माना जाता था। यद्यपि उपनिषदों में स्वाध्याय को विशेष महत्त्व दिया गया है किन्तु गुरु का स्थान विशिष्ट बना रहा। स्वाध्याय से पूर्व गुरु वचन सुनना अनिवार्य है। गुरु के अभाव में आध्यात्मिक ज्ञान के गूढ़ तत्वों को समझना असंभव है, अत: इसके लिए विद्वान् गुरु परम आवश्यक है। जो व्यक्ति गुरु चरणों की शरण नहीं लेता और स्वयं ही ज्ञान प्राप्त करने की चेष्टा करता है वह अन्धा है। इस प्रकार साहित्य में गुरु की अत्यधिक महिमा बतलायी गयी है और उसे ब्रह्मस्वरूप कहा गया है। वही व्यक्ति गुरु बनने योग्य माना गया, जो ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर चुका है। इस प्रकार उसे शिष्य का मार्ग-दर्शक माना गया। विद्वान, दार्शनिक, ज्ञानी और चरित्रवान् व्यक्ति ही गुरु पद पाने योग्य माना गया। गुरु के विशेष ज्ञान की सहायता से ही शिष्य अपनी अंतज्योंति को प्रदीप्त करके आत्म-ज्ञान प्राप्त कर सकता है।

शिक्षक के सम्मान का कारण-

भारत में प्राचीन काल में वेदों की शिक्षा मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पोढ़ी तक संचरित की जा रही थी। वैदिक शिक्षा के शुद्ध उच्चारण के ऊपर अत्यधिक बल दिया जाता था और श्लोकों एवं मंत्रों का शुद्धोचारण केवल कुशल आचार्यों के द्वारा ही सोखा जा सकता था। इसके अतिरिक्त वेदों में निहित बहुमूल्य ज्ञान केवल शिक्षक के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तान्तरित किया जा सकता था। इसलिए समाज में शिक्षक का स्थान बहुत ही ऊँचा था। दूसरे, उपनिषद् काल में दर्शन के अभ्युदय के कारण गुरुओं का सम्मान और अधिक बढ़ा क्योंकि आध्यात्मिक ज्ञान उचित निर्देशन के ऊपर ही निर्भर करता था। गुरु ही उनके मोक्ष में सहायक तथा पथ प्रदर्शक माने जाते थे। तीसरे, चूँकि इस काल में पुस्तकें दुर्लभ थीं, इसलिए छात्रों को ज्ञान-प्राप्ति के लिए गुरुओं पर ही निर्भर रहना पड़ता था।

शिक्षक की योग्यताएँ-

वैदिक काल में चूँकि गुरुओं का अत्यधिक आदर होता था, इसलिए उसमें अनेक गुणों की अपेक्षा की जाती थी। शिक्षकों में निम्नलिखित योग्यताओं तथा गुणों का होना आवश्यक था

  • (1) विद्यार्थी शिक्षक को एक आदर्श चरित्रवान व्यक्ति के रूप में देखते थे। अतः उन्हें चरित्रवान तथा ज्ञानी होना आवश्यक था।
  • (2) उसे धैर्यवान होना चाहिए तथा छात्रों के साथ उसका व्यवहार निष्पक्षता का होना चाहिए।
  • (3) उसे अपने विषय का पूर्ण ज्ञाता होना चाहिए। उसे जीवन पर्यन्त अध्ययन करना चाहिए। इसके साथ-साथ उसमें अद्भुत वाक्- शक्ति होनी चाहिए। उसे प्रत्युत्पन्नमति तथा मनोविनोदी भी होना चाहिए और अध्यापन कला में भी निपुण होना आवश्यक है।
  • (4) अपने ज्ञान तथा चरित्र से उसे छात्रों पर अमिट छाप छोड़नी चाहिए।
  • (5) उसे छात्रों को प्रोत्साहित तथा निर्देशित करना चाहिए।

गुरु-शिष्य सम्बन्ध

वैदिक काल में गुरु तथा शिष्य का सम्बन्ध किसी संस्था के माध्यम से न होकर प्रत्यक्ष हुआ करता था। विद्यार्थी प्रायः ऐसे गुरुओं के पास शिक्षा ग्रहण करने जाते थे, जो कि विद्वता तथा ज्ञान के लिए प्रसिद्ध होते थे। शिक्षक भी उन्हीं छात्रों को स्वीकार करता था, जो कि ईमानदार, सदाचारी तथा अपने उद्देश्यों में गम्भीर प्रतीत होते थे। विद्यार्थी गुरु के ही संरक्षण में रहते थे। गुरु शिष्यों से किसी प्रकार का शुल्क स्वीकार नहीं करता था, वरन् गरीब छात्रों को भोजन, वस्त्र तथा औषधि से सहायता करता था। इस प्रकार से विद्यार्थी भी गुरु-गृह के एक सदस्य के रूप में रहता था और आवश्यकता पड़ने पर उनके घरेलू कार्यों में भी सहायता करता था। ऐसी परिस्थिति में गुरु तथा शिष्य का सम्बन्ध बड़ा ही घनिष्ठ तथा स्नेहमय रहता था। वे पारस्परिक विश्वास, श्रद्धा तथा जीवन के समान आदर्शों के कारण एक दूसरे से बँधे थे। गुरु विद्यार्थियों का मानसिक तथा आध्यात्मिक पिता समझा जाता था।

गुरु तथा शिष्य का यह सम्बन्ध विद्यार्थी जीवन के समाप्त होने के बाद भी पूर्ववत् बना रहता था। शिक्षा समाप्ति के बाद जब विद्यार्थी अपने घर लौट जाता था, तो भी उसे कभी-कभी दर्शन के लिए जाना पड़ता था और अपने साथ कुछ उपहार भी ले जाना पड़ता था, चाहे वह कितना तुच्छ क्यों न हो। शिक्षक भी विद्यार्थियों को देखने के लिए जाते थे। वे इस बात का पता लगाते थे कि छात्र कितनी सीमा तक अपने अध्ययन को बनाये रखे हैं। इस प्रकार से गुरु-शिष्य सम्बन्ध दोनों पक्षों के लिए लाभदायक था। वैदिक काल में गुरु तथा शिष्य के सम्बन्ध घनिष्ठ होने का सबसे बड़ा कारण यह था कि दोनों के जीवन का परम उद्देश मोक्ष प्राप्त करना था। अतएव दोनों एक ही मार्ग के पथिक थे और दोनों संयुक्त प्रयत्न तथा सहयोग द्वारा जीवन के चरम सत्यों को प्राप्त करना चाहते थे।

विद्यार्थियों की नियमित दिनचर्या

विद्यार्थियों की दिनचर्या के विषय में भी यहाँ पर विचार कर लेना आवश्यक है। विद्यार्थियों को ब्रह्ममुहूर्त में साढ़े चार बजे शय्या त्याग देनी पड़ती थी। उनको दैनिक क्रिया से निवृत्त होकर स्नान के उपरान्त पूजन आदि करना पड़ता था। तदुपरान्त उन्हें अपने नये पाठ को याद करना पड़ता था अथवा पुराने पाठ की पुनरावृत्ति करनी पड़ती थी। फिर लगभग 11 बजे उन्हें अपने पठन-पाठन को दोपहर के भोजन के लिए स्थगित करना पड़ता था। इसके पश्चात् वह भिक्षा के लिए निकटस्थ ग्राम या नगर में जाता था। प्राप्त भिक्षान्न से वह स्वयं भोजन बनाता था अथवा •उसे गुरु को देता था और उसके द्वारा पकाये गये भोजन को ग्रहण करता था। दोपहर को लगभग एक घंटे तक विश्राम करता था और उसके बाद दो बजे अपरान्ह फिर अध्ययन प्रारम्भ करता था। सायंकाल का समय शारीरिक व्यायाम में व्यतीत होता था। सूर्यास्त के समय वे संध्या तथा पूजन करते थे और फिर रात्रि का भोजन ग्रहण करते थे। चूँकि इस समय कागज तथा मुद्रण यंत्र का आविष्कार न होने के कारण पुस्तकों का अभाव था, इसलिए आजकल की तरह विद्यार्थियों को कोई विशेष गृह कार्य नहीं दिया जाता था, सिवाय इसके कि गुरु द्वारा मौखिक रूप से बताये गये श्लोकों तथा मंत्रों की पुनरावृत्ति की जाय।

शिक्षा का अर्थ स्पष्ट करते हुए इसकी अपने शब्दों में परिभाषा दीजिए।

छात्रों के कर्त्तव्य-

छात्रों के कर्त्तव्य गुरुओं के प्रति प्रमुख रूप से निम्नलिखित थे

  1. गुरुओं का पिता, राजा तथा ईश्वर के समान आदर करना।
  2. छात्रों का बास्य व्यवहार भी गुरुओं के प्रति उपयुक्त होना चाहिए। उन्हें गुरुओं को उचित ढंग से अभिवादन करना चाहिए। उन्हें गुरु के समक्ष उच्च आसन नहीं ग्रहण करना चाहिए। उन्हें आकर्षक वस्त्र भी गुरु के सामने नहीं धारण करना चाहिए।
  3. उसके लिए परनिन्दा निषेध था।
  4. गुरु की आज्ञा का पालन करना। गुरु गृह की अग्नि को प्रज्वलित रखना।
  5. गुरु की गार्यो को चराना, ईंधन इकट्ठा करना, बर्तन साफ करना, गुरुगृह की सफाई करना।
  6. सादा जीवन व्यतीत करना, विद्याध्ययन करना, संयमित जीवन को अपनाना तथा साधारण तथा उत्तेजनारहित भोजन करना।
  7. ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करना।
  8. भिक्षा माँगना प्रत्येक छात्र का धार्मिक कर्तव्य था। यह विश्वास किया जाता था कि भिक्षान्न के अलावा कोई भोजन पवित्र नहीं है। इस प्रथा के पीछे कुछ मनोवैज्ञानिक तथा सामाजिक कारण छिपे थे। पहले, इसके द्वारा विद्यार्थियों में ऊँच-नीच की भावना समाप्त हो जाती थी। गरीब से •लेकर राजा तक के लड़कों को भिक्षा माँगना अनिवार्य था। इसके कारण उनके अंदर किसी प्रकार की होनता की भावना नहीं उत्पन्न होने पाती थी। दूसरे, इस प्रथा के द्वारा बालकों को समाज की वास्तविकताओं से परिचित कराया जाता था। तीसरे, बालकों में समाज सेवा की भावना उत्पन्न करने के लिए भी यह प्रथा अनिवार्य बना दी गयी थी। चौथे, इस प्रथा के द्वारा बालकों में विनम्रता, दया, सहानुभूति तथा परोपकारिता के गुणों का प्रादुर्भाव होता था।

गुरुओं के कर्त्तव्य-

गुरुओं के कर्त्तव्य छात्रों के प्रति निम्नलिखित थे

  1. गुरु छात्र का मानसिक तथा आध्यात्मिक पिता समझा जाता था, अत: वह छात्रों की न्यूनताओं के लिए उत्तरदायी होता था।
  2. वह विद्यार्थियों के आचरण पर नियंत्रण रखता था, तथा उन्हें उचित-अनुचित का ज्ञान कराता था।
  3. वह छात्रों को भोजन, स्वास्थ्य तथा शयन के सम्बन्ध में आवश्यक निर्देश देता था।
  4. गरीब छात्रों के भोजन तथा चिकित्सा की व्यवस्था करता था।
  5. निःस्वार्थ भाव से शिक्षा देना तथा शिष्यों के यश की कामना करना।
  6. शिष्यों के बौद्धिक तथा आध्यात्मिक विकास में सहायता प्रदान करना।
  7. शिष्यों को जीवन के चरम सत्यों का ज्ञान प्रदान करना।
  8. शिष्यों के साथ वात्सल्यपूर्ण व्यवहार करना।

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