प्रभाकर वर्धन के विषय में आप क्या जानते हैं?

प्रभाकर वर्धन – वर्धन वंश का सर्वप्रथम ‘महाराजाधिराज’ से विभूषित होने वाला शासक प्रभाकर वर्धन ही या प्रारम्भ में प्रभाकर वर्धन भी एक सामन्त शासक था परन्तु उसने अपने प्रताप के बल पर स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की तथा ‘परम भट्टारक’ उपाधि से विभूषित हुआ।

बाण ने लिखा है कि ‘हूण-हरिण-केसरी’ (ग रूपी हिरनों के पातक सिंह के समान), सिन्धु-राज्य ज्वरों (सिन्धु-देश के राजा को ज्वर के समान संतप्त करने वाले), गुर्जर-अजागरों (गुर्जर देश के राजा की नींद भंग करने वाला), लाट पाटव, पाटच्चरों (लाट देश की पटुता का उपहारण करने वाला) और मालव लक्ष्मीला परशु (माल-समृद्धि का विनाश करने वाला) तथा प्रतापशील राजा राजाधिराज प्रभाकर वर्धन, आदित्यवर्धन का पुत्र था और इसकी माता का नाम महासेन गुप्ता देवी था। प्रभाकर वर्धन ने मालवा, पंजाब व कश्मीर में हूणों को पराजित किया था। कंनिघम महोदय का मत है कि प्रभाकर वर्धन का राज्य दक्षिणी पंजाब तथा पूर्वी राजपूताना तक विस्तृत था। ‘हर्षचरित्र’ के अनुसार प्रभाकर वर्धन को रानीमती से दो पुत्र (राज्यवर्धन एवं हर्षवर्धन वा एक पुरी (राज्यश्री)उत्पन्न हुई।

गहड़वाल शासक चन्द्रदेव पर टिप्पणी कीजिए।

परिणाम

इस त्रिकोणात्मक संघर्ष ने तीनों वंशों की शक्ति को कमजोर किया जिससे भारत पर विदेशी आक्रमणकारियों को आक्रमण करने का अवसर प्राप्त हुआ। जहां महमूद गजनवी के आक्रमणों ने प्रतिहार वंश की शक्ति को समाप्त कर दिया, वहीं बंगाल में पालवंश की दुर्बलता का लाभ उठाकर सेन वंश ने अपनी सत्ता स्थापित कर ली। दक्षिण में तब तक राष्ट्रकूट भी निर्बल हो चुके थे ऐसी स्थिति में चालुक्यों ने यहां अपनी सत्ता स्थापित की।

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