परामर्श की विशेषता बताइये तथा परामर्श के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।

परामर्श की विशेषताएँ

परामर्श की विशेषता इन परिभाषाओं के अतिरिक्त कुछ विद्वानों ने परामर्श के अर्थ को स्पष्ट करने हेतु परामर्श से सम्बन्धित विभिन्न तत्वों का निर्धारण भी किया है। उनके अनुसार इन तत्वों अथवा विशेषताओं के आधार पर परामर्श को परिभाषित किया जा सकता है। उदाहरण के लिये आर्बकल (Arbuckle) के अनुसार परामर्श की प्रमुख विशेषताएं है

  1. परामर्श की प्रक्रिया दो व्यक्तियों के पारस्परिक सम्बन्ध पर आधारित है।
  2. दोनों के मध्य विचार-विमर्श के अनेक साधन हो सकते हैं।
  3. प्रत्येक परामर्शदाता को अपनी प्रक्रिया का पूर्ण ज्ञान होना चाहिये।
  4. प्रत्येक परामर्श साक्षात्कार पर आधारित होता है।
  5. परामर्श के फलस्वरूप, परामर्शप्रार्थी की भावनाओं में परिवर्तन होता है।

उपरोक्त परिभाषाओं में परामर्श की विशेषताओं, उद्देश्यों तथा कार्यों का उल्लेख किया गया है परामर्श की प्रमुख विशेषतायें निम्नलिखित हैं

  1. परामर्श वैयक्तिक सहायता प्रदान की प्रक्रिया है इसे सामूहिक रूप में सम्पादित नहीं किया जाता है।
  2. परामर्श शिक्षण की भाँति निर्णय नहीं लिया जा है अपितु परामर्श प्रार्थी स्वयं निर्णय लेता है।
  3. परामर्श सम्पूर्ण परिस्थिपितों के आधार पर समायोजन हेतु प्रार्थी को जानकारी देता है और उसकी सहायता भी करता है।
  4. परामर्श प्रार्थी अपनी समस्याओं का समाधान बिना किसी सुझाव व सहायता के स्वयं ही करने में समर्थ नहीं होता है। समस्याओं के समाधान हेतु वैज्ञानिक सुझाव की आवश्यकता होती है। वैज्ञानिक सुझाव को ही परामर्श कहते हैं।
  5. परामर्श प्रार्थी को समझने में पर्याप्त सहायता देता है जिससे वह अपनी समस्याओं के समाधान के लिये निर्णय लेता है।
  6. परामर्श द्वारा भाव को अपनी सेवाओं को प्राप्त करने की दिशा में कर सके तथा जिसके फलस्वरूप उसे सफलता एवं सन्तोष प्राप्त हो सके।
  7. परामर्श में एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की समस्याओं के समाधान हेतु सहायता इस प्रकार करता है जिससे स्वयं निर्णय लेकर सीखता है।
  8. परामर्श की निर्देशीय अधिक होती है। इसमें प्रार्थी के सम्बन्ध में सम्पूर्ण तथ्यों का संकलन करके सम्बन्धित अनुभवों पर बल दिया जाता है।
  9. परामर्श में प्रार्थी की समस्याओं का समाधान नहीं किया जाता है अपितु इस प्रक्रिया से उसे स्यवं ही इस योग्य बना दिया जाता है कि वह अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं कर सके।
  10. परामर्श की प्रक्रिया केन्द्रित होती है जिसमें पारस्परिक विचार-विमर्श, वार्तालाप तथा सौहार्दपूर्ण तर्क-वितर्क के आधार पर प्रार्थी को इस योग्य बनाया जाता है कि अपनी समस्याओं के समाधान के लिये स्वयं निर्णय ले सके।

(11) परामर्श की प्रक्रिया में प्रार्थी का उत्तरदायित्व स्वयं को समझना तथा उस मार्ग को सुनिश्चित करना जिस ओर उसे अग्रसर होना है। परामर्श से समाधान के लिये आत्मविश्वास का विकास होता है।

(12) परामर्श प्रार्थी को सामाजिक उत्तरदायित्वों को सहर्ष स्वीकार करने में सहायता करना, उसे साहस देना जिससे उसमें हीन भावना न विकसित हो

परामर्श के उद्देश्य

परामर्श मनोवैज्ञानिकों (Counselling Psychologists) ने उपबोधन एवं मनचिकित्सा को पर्यायवादी माना है तथा इसी को ध्यान में रखकर ही उपबोध के लक्ष्यों को निर्धारित किया है। राबर्ट, उब्ल्यू व्हाइट के शब्दों में- “जब कोई व्यक्ति मनश्चिकित्सक के रूप में कार्य करता है तब उसका अभीष्ट प्रभाव डालने या सहमति प्राप्त न होकर मात्र उत्तम स्वास्थ्य की स्थिति को पुनःस्थापित करना होता है। एक मनचिकित्सक को न तो कुछ कहना होता है और न ही प्रस्तावित करना।”

व्हाइट महोदय के उपरोक्त कथन से यह स्पष्ट होता है कि उपबोधक अथवा मनश्चिकित्सक का कार्य मात्र प्रार्थी के मानसिक स्वास्थ्य को सामान्य बनाना है। अपना कोई विचार, सुझाव अथवा दृष्टिकोण को उस पर थोपना उसका लक्ष्य नहीं होता। उपबोधन के अन्तर्गत उपबोधक। सेवार्थी को किसी विशिष्ट जीवन शैली अथवा विचारधारा को स्वीकार करने पर बल नहीं देता।

हिन्दू विवाह का अर्थ एवं परिभाषा का उल्लेख कीजिए।

सेवार्थी केन्द्रित परामर्श (Clicat-centred Counselling) की प्रकृति के बारे में ए० बीo ब्वाय एवं जी० जे पाइन ने उपबोध द्वारा विशिष्ट रूप से माध्यमिक स्तर पर, विद्यार्थी को “अधिक परिपक्व एवं स्वयं क्रियाशील बनाने विशेषयात्मक तथा रचनात्मक दिशा की ओर अप्रसारित होने, अपने साधनों एवं संभावनाओं के उपयोग तथा समाजीकरण की ओर अप्रसरित होने में सहायता प्रदान करने के लक्ष्य पर ध्यान देते हुए कहा है।

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