जेण्डर संवेदनशीलता का समाज में क्या महत्व है?

जेण्डर संवेदनशीलता का समाज में महत्त्व

जेण्डर संवेदनशीलता का समाज की व्यवस्था का विकास एवं निर्धारण जेण्डर पर ही निर्भर है। समाज में प्रत्येक वस्तु या व्यक्ति का निर्धारण स्त्रीलिंग, पुल्लिंग एवं नपुंसक लिंग से होता है। समाज की स्थिति एवं स्वरूप का वर्णन भी जेण्डर के आधार पर किया जाता है, जैसे भारतवर्ष की जनगणना मे स्त्री एवं पुरुषों की जनगणना की जाती है जिसके आधार पर बालक एवं बालिकाओं का अनुमान

लगाया जाता है। इस प्रकार जेण्डर समाज का आधारभूत तथ्य है जिसके आधार पर समाज का संचालन, विकास एवं स्वरूप निर्धारित होता है। समाज में जेण्डर की स्थिति को निम्नलिखित रूप में स्पष्ट किया जा सकता है

जेण्डर संवेदनशीलता से क्या आशय हैं?

(1) पेषभूषा में जेण्डर – भारतीय परिवेश में वेषभूषा में भी जेण्डर देखा जाता है। भारतीय समाज में महिलाएँ साड़ी एवं सलवार सूट पहनती है तथा पुरुष पेण्ट शर्ट एवं धोती मुर्गा आदि धारण करते है महिलाएँ चोटी करती हैं तथा पुरुषों के बाल महिलाओं की तुलना में कम लम्बे होते हैं। इस प्रकार वेषभूषा भी जेण्डर के आधार पर समाज में निश्चित की जाती है।

(2) वर्ण विभाजन में जेण्डर – समाज में जब किसी कार्य के लिये वर्ग विभाजन की आवश्यकता होती है तब जेण्डर का उल्लेख अनिवार्य रूप से किया जाता है; जैसे विद्यालय में आयोजित होने वाली पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाओं में कुछ क्रियाओं को बालक एवं बालिका वर्ग दोनों के लिये आयोजित किया जाता है। कुछ क्रियाओं को बालिका वर्ग के लिये तथा कुछ क्रियाओं को बालकों के वर्ग के लिये आयोजित किया जाता है। इस प्रकार की स्थिति वर्ण विभाजन के आधार पर देखी जाती है तथा जेण्डर के आधार पर निश्चित की जाती है।

(3) धार्मिक व्यवस्था में जेण्डर – समाज में धर्म के अनेक कार्यों में महिलाओं को वंचित कर दिया जाता है जैसे – व्यास गद्दी पर या भागवत आदि कथाओं के कहने पर महिलाओं की आलोचना की जाती है परन्तु वर्तमान समय में कुछ महिलाएं कथा पढ़ने लगी हैं, वेद पाठ करने लगी है। इस प्रकार धार्मिक व्यवस्था में भी जेण्डर का प्रभाव देखा जाता है।

(4) विकास में जेण्डर – सामान्य रूप से समाज में जेण्डर के आधार पर ही विकास की योजनाएँ बनायी जाती हैं। जैसे बर्तमान समय में समाज में बालिका उत्थान एवं महिला सशक्तिकरण के लिये योजनाएं बनायी जाती हैं क्योंकि समाज में बालकों का स्तर शिक्षा में अधिक आगे होता है। अभिभावक उनको अधिक महत्व देते हैं तथा बालिकाओं को कम महत्व देते हैं। इसलिये बालिकाओं के विकास के लिये योजनाओं का निर्माण किया जाता है।

(5) सामाजिक स्थिति में जेण्डर – भारतीय समाज एक पुरुष प्रधान समाज है। इसलिये इस समाज में पुरुषों की तुलना में खियों को कम महत्व दिया जाता है। बालकों को वंश चलाने वाला माना जाता है। इसलिये पुत्र जन्म पर खुशी मनायी जाती है जबकि पुत्रियों के जन्म पर अभिभावक खुश नहीं होते। इस प्रकार सामाजिक स्थिति को जेण्डर पूर्णतः प्रभावित करता है। वर्तमान समय में पुत्र एवं पुत्रियों के नाम के साथ अब माता का नाम लिखा जाता है जिससे समानता की स्थिति हो सके।

(6) आरक्षण में जेण्डर – समाज के अनेक क्षेत्रों में पुरुष वर्ग का ही अधिकार होता है। वहाँ पर महिलाओं को पहुँच नहीं हो पाती है। वर्तमान समय में प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं को सम्मान देते हुए उनके लिये पद आरक्षित कर दिये जाते हैं जिससे महिलाओं को यह अनुभव हो सके कि उनकी भी समाज में अहम् भूमिका है। आरक्षण की स्थिति जेण्डर के आधार पर आँकड़े एकत्रित करके निश्चित की जा सकती है।

(7) शारीरिक आकार में जेण्डर – शारीरिक आकार एवं शारीरिक क्रियाओं के आधार पर भी स्त्रियों एवं पुरुषों में भेद पाया जाता है। स्त्रियों में स्वाभाविक रूप से कोमलता पायी जाती है जबकि पुरुषों में कठोरता की स्थिति पायी जाती है। शारीरिक संरचना में अन्तर के आधार पर ही पुरुष एवं स्त्रियों को समाज में पहचाना जाता है तथा समाज में प्रत्येक जेण्डर की विशेषता पायी जाती है। यह विशेषता पुरुष वर्ग एवं स्त्री वर्ग के लिये पृथक् रूप में होती है।

(8) योजनाओं में जेण्डर – समाज में विकास की योजनाओं को तैयार करने से पूर्व जेण्डर के आधार पर विकास की स्थिति देखी जाती है; जैसे समाज में पुरुष वर्ग की स्थिति शोचनीय है तो पुरुष वर्ग के कल्याण की योजनाओं को अधिक महत्त्व दिया जाता है तथा महिलाओं की स्थिति शोचनीय है तो महिलाओं को महत्त्व दिया जाता है तथा महिलाओं के कल्याण की योजनाएँ बनायी जाता हैं। इस प्रकार समाज में विकास योजनाओं का आधार जेण्डर होता है।

(9) रोजगार में जेण्डर – वर्तमान समय में प्रत्येक रोजगार महिलाओं के लिये उपलब्ध है। इस रोजगार प्रणाली के अन्तर्गत महिलाओं के लिये आरक्षण निश्चित किया जाता है। कुछ रोजगार महिलाओं के लिये अच्छे माने जाते हैं, जैसे- बैंक एवं शिक्षण व्यवसाय आदि तो दूसरी ओर फौज एवं कठिन कार्य वाले व्यवसाय पुरुषों के लिये उपयोगी माने जाते हैं। इस प्रकार जेण्डर के आधार पर रोजगार की व्यवस्था को सम्पन्न किया जाता है तथा इस प्रकार के रोजगार को अच्छा भी माना जाता है।

(10) शिक्षा में जेण्डर – वर्तमान समय में शिक्षा व्यवस्था में भी जेण्डर का ध्यान रखा जाता है। बालिका शिक्षा के विकास के लिये पृथक बालिका विद्यालयों की व्यवस्था की गयी है। इन विद्यालयों में बालिकाओं के लिये विशेष सुविधाओं की व्यवस्था की जाती है।

बालिकाओं की रुचियों से सम्बन्धित विविध पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाओं को विद्यालय में स्थान दिया जाता है। इस प्रकार शिक्षा व्यवस्था में भी जेण्डर पर ध्यान दिया जाता है। इससे शिक्षा का विकास सर्वोत्तम एवं सन्तुलित रूप में होता है।

उपरोक्त विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि समाज की समस्त गतिविधियों एवं परम्पराओं को जेण्डर के आधार पर निश्चित किया गया है। समाज में बोलचाल, वेशभूषा एवं सामाजिक परम्पराओं का निवर्हन भी जेण्डर के आधार पर किया जाता है। वैवाहिक परम्पराओं में लड़की अपने पति के घर जाती है। इसी प्रकार लड़कों के जन्म पर उत्सव जैसा समय होता है। इस प्रकार समाज में पूर्णतः जेण्डर का प्रभाव देखा जाता है।

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