जाति एवं वर्ग के आधार पर लैंगिक विषमता पर प्रकाश डालिये।

जाति एवं वर्ग के आधार पर लैंगिक विषमता

जाति एवं वर्ग के आधार पर लैंगिक विषमता इससे अछूता नहीं रहा है। जाति-व्यवस्था का रूप सदैव से ही एक-सा नहीं रहा है, बल्कि समय के साथ-साथ जटिल होता गया। आज इसी जटिलता के कारण 3000 जातियाँ और उपजातियों भारत में पाई जाती है। श्री हट्टन के शब्दों में, “भारतीय आति-व्यवस्था के समुचित अध्ययन के लिये विशेषज्ञों की एक सेना की आवश्यकता होगी।” भारत में जाति की व्यापकता एवं महत्व को बताते हुए डॉ. मजूमदार ने लिखा है, “जाति व्यवस्था भारत में अनुपम है। सामान्यतः भारत जातियों एवं सम्प्रदायों की परम्परात्मक स्थलीय माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ की हवा में जाति घुली हुई है और यहाँ तक कि मुसलमान तथा ईसाई भी इससे अछूते नहीं बचे हैं।” श्रीमती कर्वे का मत है कि यदि हम भारतीय संस्कृति के तत्वों को समझना चाहते है तो जाति प्रथा का अध्ययन नितान्त आवश्यक है।

जाति का अर्थ तथा परिभाषा (Meaning and Definition of Caste)

जाति के लिये अंग्रेजी में Caste शब्द का प्रयोग किया जाता है। Caste पुर्तगाली भाषा में Casta शब्द से निकला है जिसका अर्थ होता है ‘प्रजाति या नस्ल’। इसी आधार पर ‘जाति’ शब्द का प्रयोग हम उस सामाजिक समूह के लिये करते हैं जिसकी सदस्यता का आधार वंशानुक्रम होता. है, अर्थात् किसी व्यक्ति की जाति उसके जन्म से निश्चित होती है। जाति का अर्थ और अधिक स्पष्ट करने के लिये हम उनकी प्रमुख परिभाषाओं को देखेंगे।

(1) रिजले के अनुसार, “जाति परिवारों के समूहों का एक संकलन है जिसका एक सामान्य नाम होता है जो एक काल्पनिक पूर्वज, मानव या देवता से सामान्य वंश परम्परा होने का दावा करते हैं। एक ही परम्परागत व्यवसाय को करने पर जोर देते हैं और सजातीय समूह के रूप में उनके द्वारा मान्य होते हैं जो अपना ऐसा मत व्यक्त करने योग्य हैं।”

(2) चार्ल्स कूले के अनुसार, “जब कोई भी वर्ग पूर्णतया वंशानुक्रम पर आधारित हो जाता है तो वह जाति कहलाता है।”

(3) एन. के. दत्त के अनुसार, “एक जाति के सदस्य जाति के बाहर विवाह नहीं कर सकते। अन्य जाति के लोगों के साथ भोजन करने और पानी पीने के सम्बन्ध में इसी प्रकार के परन्तु कुछ कम कठोर नियन्त्रण हैं। अनेक जातियों में कुछ निश्चित व्यवसाय हैं। जातियों में संस्तरणात्मक श्रेणियाँ हैं जिनमें सर्वोपरि ब्राह्मणों की सर्वोच्च स्थिति है। मनुष्य की जाति का निर्णय जन्म से होता है। यदि व्यक्ति नियमों को भंग करने के कारण जाति से बाहर नहीं निकाल दिया गया है तो एक जाति से दूसरी जाति में परिवर्तन होना सम्भव नहीं है।”

(4) मैकाइवर तथा पेज के अनुसार, “जब व्यक्ति की स्थिति पूर्व निश्चित होती है अर्थात् जब व्यक्ति अपनी स्थिति में किसी भी तरह के परिवर्तन की आशा लेकर नहीं उत्पन्न होता तब व्यक्ति समूह या वर्ग जाति के रूप में स्पष्ट होता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि जाति व्यक्तियों का ऐसा समूह है जिसके सदस्यों की सामाजिक स्थिति पूर्णतया जन्म अथवा वंशानुक्रम से निर्धारित होती है अर्थात् उस प्रदत्त स्थिति को बदलना उनके अपने वंश में नहीं होता। इसके अतिरिक्त जाति-विवाह, खानपान, छुआछूत, व्यासाय आदि के सम्बन्ध में अनेक प्रतिबन्धों से बंधी होती है। दूसरे शब्दों में, कहा जा सकता है। कि जाति एक आनुवंशिक अन्तर्विवाही समूह है जो सामाजिक संस्तरण में व्यक्ति का स्थान व व्यवसाय आदि निश्चित करती है।

जाति प्रथा की विशेषतायें (Characterisstics of Casteism)

जाति प्रथा की मुख्य विशेषतायें निम्न हैं

(1) जाति में खान-पान सम्बन्धी नियम होते हैं – प्रत्येक जाति के अपने खान-पान सम्बन्धी कुछ निश्चित नियम होते हैं। फल, दूध, मेवा, घी तथा तथा पक्के भोजन में साधारणतया कोई रोक-टोक नहीं होती, परन्तु कच्चा भोजन (रोटी आदि) केवल अपनी जाति तथा अपने से ऊँचे जाति के व्यक्ति के हाथ का ही खाया जा सकता है।

(2) जाति जन्मजात होती है – जाति की सदस्यता जन्म द्वारा निश्चित होती है। जो मनुष्य जिस जाति में जन्म लेता है वह सदैव उसी जाति का सदस्य कहलाता है और पद, व्यवसाय, शिक्षा, धन आदि में परिवर्तन होने पर भी उसकी जातीय सदस्यता में परिवर्तन नहीं होता। पढ़ा लिखा घमार भी चमार ही रहता है और मूर्ख ब्राह्मण, ब्राह्मण ही होता है।

(3) जाति अन्तर्विवाही होती है– प्रत्येक जाति के सदस्य विवाह सम्बन्ध अपनी ही जाति में स्थापित करते हैं, किसी अन्य जाति में नहीं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, वैश्य, सभी अपनी जातियों में ही विवाह करते हैं। वैस्टरमार्क ने इसको जाति की मुख्य विशेषता माना है। अन्तर्जातीय विवाह को हिन्दू समाज में भी अच्छा नहीं समझा जाता।

(4) सामाजिक तथा धार्मिक निर्योग्यतायें जाति-व्यवस्था के अन्तर्गत कुछ जातियों को विशेष रूप से सामाजिक तथा धार्मिक अधिकार प्राप्त होते हैं। इन विशेषाधिकारों के साथ-साथ विभिन्न जातियों के साथ अनेक निर्योग्यतायें भी जुड़ी हुई हैं।

(5) अधिकांश जातियों के व्यवसाय निश्चित होते हैं- हिन्दू शास्त्रों में वर्णित जाति की मूल वर्ण व्यवस्था में प्रत्येक वर्ण के व्यवसाय निश्चित थे। अतः अधिकतर जातियों के व्यवसाय भी लगभग निश्चित से ही होते हैं। मनु के अनुसार, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के कार्य निश्चित होते थे। ब्राह्मण का कार्य अध्ययन, अध्यापन, यज्ञ करना, दान देना और दान सेना, क्षत्रियों का कार्य अध्ययन, यज्ञ, दान, दुष्टों को दण्ड देना और युद्ध करना, वैश्य का कार्य अध्ययन, यज्ञ, दान, कृषि, व्यापार और पशु-पालन तथा शूद्र का कार्य अन्य वर्गों की सेवा है। हिन्दू समाज में आज भी चमार का लड़का चमार, बढ़ई का लड़का बहुई और लोहार का लड़का लोहार का व्यवसाय करता है।

(6) जाति का राजनीतिक रूप – डॉ. आर. एन. सक्सैना के शब्दों में, “जाति एक रानीति इकाई भी है क्योंकि प्रत्येक जाति व्यावहारिक आदर्श के नियम प्रतिपादित करती है और अपने सदस्यों पर उनको लागू करती है। जाति-पंचायत, उसके कार्य और संगठन जाति के राजनीतिक पक्ष के ही प्रतीक हैं। जाति के द्वारा विधायिका, न्यायिक और निष्पादित कार्य भी सम्पन्न होते हैं जिनके कारण उसे राजनीतिक इकाई का रूप मिलता है।” जहाँ तक जाति-पंचायतों के संगठन का प्रश्न है, यह उच्च जातियों की अपेक्षा निम्न जातियों में अधिक सुदृद्र । है।

(7) एक जाति में अनेक उपजातियाँ – यद्यपि हिन्दू धर्मशासों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र केवल इन चार जातियों का वर्णन किया गया है किन्तु पदार्थ यह है कि इनमें से प्रत्येक जाति अनेक उपजातियों में बंटी हुई है। ये उपजातियों भी परस्पर दिवाह सम्बन्धी प्रतिबन्धों का पालन करती है अर्थात् एक उपजाति के सदस्य दूसरी उपजाति में विवाह सम्बन्ध नहीं बनाते।

(8) आर्थिक असमानता – जाति व्यवस्था में यह भावना प्रबल रूप से पाई जाती है कि जो निम्न हैं, उन्हें कोई अधिकार प्राप्त नहीं होने चाहिये। निम्न जाति के कार्य यद्यपि जीवन-यापन की दृष्टि से अत्यन्त उपयोगी होते हैं, लेकिन ये मूल्य की दृष्टि से हीन समझे जाते हैं। इन सबका परिणाम यह हुआ है कि उनकी आय, सम्पत्ति व सांस्कृतिक उपलब्धियाँ बहुत कम रही हैं। सामान्यतः देखा जाता है कि उच्च जातियों की आर्थिक स्थिति उच्च तथा निम्न जातियों की आर्थिक स्थिति निम्न रहती है।

(9) जाति में ऊँच-नीच और छुआछूत के नियम होते हैं – हिन्दू सामाजिक संगठन की भित्र-भित्र जातियों एक-दूसरे से उतार-चढ़ाय के सोपान क्रम में बेटी हुई हैं। इस क्रम में ब्राह्मणों को सबसे ऊँचा और अछूतों को सबसे नीचा स्थान प्राप्त है। ऊँच-नीच के भाव के साथ-साथ छुआछूत का नियम भी लगा हुआ है छुआछूत की प्रथा का कठोरता से पालन होने पर हिन्दू समाज की कुछ नीची जातियाँ अस्पृश्य अथवा अछूत कहलाने लगी जिनको मन्दिर में प्रवेश करने, श्मशान घाटों का प्रयोग करने, विद्यालयों, जलमार्गों और होटलों, सार्वजनिक कुओं का उपयोग करने तथा नगर में रहने तक की मनाही हो गयी।

(10) जातीय चेतना – जाति व्यवस्था की एक प्रमुख विशेषता जातीय चेतना है। प्रत्येक जाति अन्य जातियों की तुलना में अपने को श्रेष्ठ समझती है। एक जाति के सदस्य आपस में घनिष्ठता तथा अपनाय का अनुभव करते हैं। हिन्दुओं का प्रत्येक कार्य इस जातीय भावना से प्रभावित होता है।

जाति के आधार पर लैंगिक विषमता

यदि जातियों में जेण्डर को देखें तो सभी जातियों में महिलाओं की स्थिति सोचनीय है। राजपूत, जाट आदि परिवारों में महिलाओं को अनेक बंधनों से बांधा जाता था। अनुभूति जाति, जनजाति महिलाओं के साथ तो अत्याचार होता है, उन्हें उच्च वर्ग या जाति के लोग उठाया ले जाते थे व उत्पीड़न करते थे।

सामाजिक इतिहास में उस क्षण, जब जाति वर्ग एवं लिंग की समस्याओं से निजात नहीं मिली, तो सामाजिक उत्सुकताओं को किशोरी स्त्रियों पर ही लाद दिया गया। सामाजिक नियंत्रण के लिए संघर्षो को इन गैर-दावेदार क्षेत्रों से ही जोड़ दिया गया जैसे कि किशोरी की गर्भावस्था के संबंध में सार्वजनिक वाद-विवादों में प्रमाण, किशोरावस्था में असंयम, गर्भनिरोध एवं गर्भपात के लिए अभिभावकों की स्वीकृति, बलात्कार तथा यौन शोषण की घटनाएँ एवं महिलाओं द्वारा स्वयं को भूखा रखने के आत्म-वृतान्त एवं घटना के संबंध में खुद को निर्दोष साबित करने के विवरण आदि । हालांकि, इन सभी सामाजिक विवादों के संबंध में सभी एकमत नहीं होते एवं उनमें समझौता होता है। युवा महिलाएँ एक स्त्री होने के प्रश्न से जूझती हैं कि कौन उन पर नियंत्रण रखेगा और वह किस सीमा तक उनकी देह पर नियंत्रण करेगा ?

विद्याधर चन्देल की उपलब्धियों की विवेचना कीजिए।

छोटे शहरों या ग्रामीण क्षेत्र अथवा शहर की गंदी बस्तियों में महिलाएँ अभी तक सामाजिक एवं आर्थिक शोषण की शिकार हैं। छोटे शहरों एवं गांवों में, यहाँ तक कि ऊंची जाति की महिलाओं को आज भी सिर्फ घरेलू क्रियाकलाप एवं अपने सगे-संबंधियों के कल्याण एवं उत्तरदायित्व तक ही सीमित रखा गया है। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की महिलाओं की सामाजिक एवं आर्थिक रूप से शोषण के बढ़ते दृष्टान्त जाति, वर्ग एवं लैंगिक शक्तियों की निराशा, कुण्ठा एवं एकजुटता को दर्शाता है। ग्रामीण क्षेत्र में महिलाओं द्वारा घर के कमरतोड़ कार्य करने एवं ईंधन की लकड़ी इकट्ठा करके लाना एक आम बात है। इस संबंध में प्रो. श्रीनिवास का अवलोकन ध्यान देने योग्य है। उनका कहना है कि “जहाँ ग्रामीण परम्परा के अनुसार निचले स्तर की महिलाएँ आतारिक और बाहरी दोनों कार्य संभालती हैं, वहाँ इसका खामियाजा आगे आने वाली पीढ़ी को भुगतना पड़ता है, भूतपूर्व पीढ़ी को नहीं। ऊंचे स्तर की महिलाओं को प्रतिबंधों में रखा जाता है।”

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