चौहान कौन थे?

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चौहान कौन थे? इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। कुछ विद्वान जहाँ इन्हें विदेशी मानते हैं तो कुछ विद्वान इन्हें भारतीय क्षत्रिय मानते हैं।

(1) प्रथम मत के अनुसार चाहमान विदेशी थे। डॉ. डी. आर. भण्डारकर का मत है कि चाहमान खिजरों की संतान है, जो विदेशी थे।

(2) दूसरे मत के अनुसार चाहमान (चौहान) भारतीय क्षत्रीय थे। चन्दरबरदायीकृत पृथ्वीराज रासो का कथन है कि ब्रह्म के यज्ञ को असुरों ने अपवित्र कर दिया था। ब्रह्मा इससे बहुत क्रुद्ध हुए और असुरों के दमन के लिए एवं देवों के हित के लिए उन्होंने यज्ञ कुण्ड को प्रज्वलित किया। इसी यज्ञकुण्ड से अनल चाहान उत्पन्न हुआ, जिसके चार हाथ थे और चारों हाथों में नंगी तलवारें थीं। हम्मीर काव्य का कथन है कि ‘एक बार ब्रह्मा के हाथ से कमल पृथ्वी पर गिर गया, जो स्थान पुष्कर नाम से प्रसिद्ध हुआ। देवताओं ने इसी स्थान पर यज्ञ प्रारम्भ कर दिया। ब्रह्मा ने यज्ञ की रक्षा के लिए चौहान नामक एक वीर योद्धा की नियुक्ति की। इसी चौहान नामक वीर योद्धा से चाहमान वंश की स्थापना हुई बिजौलिया अभिलेख से भी चाहमान को भारतीय माना गया है।

प्रतिहारों, चन्देलों परमारों और चालुक्यों के इतिहास से स्पष्ट है कि विदेशी विध्वंसक आक्रमणों से धरा और धर्म की रक्षा के लिये रक्षकों, दिव्य पुरूषों की आवश्यकता थी। राजस्थानी अनुश्रुति के अनुसार परिहार (प्रतिहार) पवार (परमार) और चालुक्य तथा चाहमानों का जन्म अग्निकुण्ड से हुआ पृथ्वीराज रासों से ज्ञात होता है कि ब्रह्मा ने असुरों को नष्ट करने के लिये सोचा कि ऐसा उपाय होना चाहिये जिससे सम्पूर्ण राक्षसों का संहार हो। यह सोच कर उन्होंने ऐसा शूर उत्पन्ना करना चाहा जो लड़कर और उछलकर दुष्ट शत्रुओं का रणस्थल में नाश करे ‘निर्मो सु सुर संग्राम भर’, अरि अलवि खंडै सु खला यह सोचकर देवताओं की भलाई के लिये यज्ञ कुण्ड को प्रज्वलित किया गया और कमलासन (ब्रह्मा) ने यज्ञ आरम्भ किया। स्तुति के बाद मंत्रोच्चारण कर (ब्रह्मा) ने कमंडल के हाथ में जल लिया और यज्ञ कराने वालों ने उस स्थान पर आहुति देकर ‘दुष्टों को भगा दो’, दुष्टों को भगा दों, इस प्रकार आवाज दी तब उससे अनल चाहुवान उत्पन्ना हुआ जो चार हाय वाला था और चारों हाथों में तलवारें लिये हुए प्रकट हुआ

अनकुण्ड किय अनल, सज्जि उपागर सार सुन,

कमलासन आसनह, मंडि जग्योपवीत जुरि।

चतुरान स्तुति सद, मंत्र उच्चार सार किय,

सुकरि कमण्डल वारि, जजित, अह्नान थान दिय

जाजान्नि पानि श्रय आहुति जजि, भजि सु दुष्ट अह्नान करि

उपज्यो अनल चाहुवान तब, चल सु वाहु असि वाह घरि ॥

इस प्रकार अग्निकुण्ड से रक्त वर्ण के मुँह वाला प्रचंड सेनापति के रूप में चहुआन प्रकट हुआ। उस वीर धनुर्धर चहुआन ने ब्रह्मा के यज्ञ की रक्षा की। बाद में इसी योद्धा के द्वारा प्रचलित वंश चाहमान वंश कहलाया।

हर्ष के शासन प्रबन्ध पर एक लेख लिखिए।

पृथ्वीराज विजय से भी ज्ञात होता है कि पुष्कर मातंग-भय (तुरुष्क भय) से पीड़ित था। म्लेच्छों ने पवित्र यज्ञ स्थलों को नष्ट-भ्रष्ट कर अपवित्र कर दिया था। इस प्रकार वहां म्लेच्छ- उपद्रव (उप्पलव म्लेच्छकृत) था। इसलिये ब्रह्मा द्वारा असुर वध के लिये प्ररित पुरुष (विष्णु) का अवतार हुआ। वही पुरूष चाहमान के नाम से प्रसिद्ध हुआ। विष्णु-बल से युक्त वह पुरूष हाय में धनुष, मान और नय से विभूषित होकर चाहमान कहलाया

करेणा चापस्य हरेर्मनीचा

बलेन मानस्य नयेन मंत्रिभिः

स चाहमानोयमिति प्रथां ययौ ॥

उसका और इसी प्रकार इस मान-धन संपन्ना वंश का इतिहास में एक ही कार्य था कि उपद्रव को शान्त करे.

अर्थात् वह म्लेच्छोपदव का शीघ्र ही अन्त करे।

अतः स्पष्ट है कि पृथ्वीराज विजय जो लगभग 1191 ई. में लिखा गया था और पृथ्वीराज रासो के अनुसार पुरूषावतार चाहमान ही असुरविनाश के लिये अवतरित हुआ था जिससे ही अन्य वंशों की भाँति इस वंश का भी इतिहास में चाहमान वंश नाम प्रसिद्ध हो गया ( तदाख्यया जायत चाहमानवंशस्त्रिलोकीविहित प्रशंसः)। उस समय चाहमान ने ही साम्राज्य प्राप्त कर यश प्राप्त किया। अभिलेखों में प्राची दिशाधिपति (अग्नि) के नेत्रों से चाहमान का जन्म हुआ। अभिलेखीय और साहित्यिक स्रोतों में चाहमानों को सूर्यवंशी क्षत्रिय कहा गया है।

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