ग्रामीण शहरी सम्बद्धताओं पर प्रकाश डालिए।

ग्रामीण शहरी सम्बद्धताओं पर प्रकाश

ग्रामीण शहरी सम्बद्धताओं पर प्रकाश आधुनिक भारतीय समाज के जनजीवन में सामाजिक परिवर्तन की गति इतनी तीव्र है कि देहात और नगर दो ध्रुव नहीं रह गए हैं। यही कारण है कि देहात और नगर का विभेद गुणों के आधार पर नहीं, वरन मात्रा के आधार पर किया जाता है। पर्यावरण तथा मानव जीवन परस्पर घनिष्ठ रूप में सम्बन्धित हैं। पर्यावरण में विभिन्नता पाई जाती है। सामाजिक जीवन के दो आधार अत्यन्त महत्वपूर्ण है। गाँव और नगर ग्रामीण और नगरीय जीवन में अनेक विभेदों के बद भी यह अन्तःसम्बन्धित है। यदि हम मानव जीवन का यथार्थ अध्ययन करना चाहते हैं, तो आवश्यक है कि इन दोनों ही पहलुओं का अध्ययन किया जाए। ग्रामीण व नगरीय जीवन में विद्यमान विभेदों को देखते हुए कुछ विद्वान यह प्रश्न करते हैं कि क्या गाँव नगर एक-दूसरे से सर्वदा पृथक समुदाय है? किन्तु वस्तुस्थिति यह है कि दोनों में भेद मात्रा का है। ऐसा सम्भव नहीं है कि जो विशेषताएँ गाँव में पाई जाती हैं, वे शहरी/ नगरों में नहीं होंगी तथा नगरों की विशेषताएँ गाँवों की विशेषताओं से एकदम अलग होंगी। वर्तमान समय में गाँव और नगर दोनों ही समुदाय परस्पर निकट आते जा रहे हैं अतः एक की विशेषता दूसरे में फैलने लगी है। मैकाइवर में पेज के अनुसार, “गाँव तथा नगर दोनों ही समान हैं, इसमें से न तो कोई दूसरे से अधिक प्राकृतिक है एवं न ही कृत्रिम “

ग्रामीण और शहरी जीवन एक-दूसरे से सर्वथ पृथक नहीं हैं, क्योंकि दोनों के मध्य अनेक कड़ियाँ और सम्बद्धताएँ देखी जाती हैं। गाँव तथा नगर दोनों में पारस्परिक आदान-प्रदान और अन्तःक्रिया भी होती रहती है, जिसके परिणामतः दोनों का ही जीवन प्रभावित और परिवर्तित होता रहता है। नगरीय केन्द्रों तथ मनोवृत्तियों और ग्रामीण दशाओं के बीच निहित सम्बन्ध में प्रत्यक्ष सम्बन्ध पाया जाता है। ग्राम और नगर के पारस्परिक प्रभावों ने भारतीय समाज ने ग्राम्यीकरण, आदि प्रक्रियाओं को जन्म दिया है, जिसके फलत: ग्राम तथा नगर की विशेषताओं का मिला-जुला रूप प्रकट हुआ है। भारत में औद्योगिकरण और आर्थिक तथा सामाजिक विकास ने गाँवों की परम्परागत आत्मनिर्भरता को समाप्त कर दिया है। अब नगर कच्चे माल की उपलब्धता की दृष्टि से ग्रामों पर निर्भर रहने लगे हैं। नगरों की प्रबलता, आकर्षण एवं उपलब्ध सुविधाओं/साधनों ने ग्रामवासियों के मन में उनके प्रति महत्वपूर्ण तरीके से आकर्षण बढ़ाया है। स्पष्ट है कि इससे ग्रामवासियों का नगरीकरण होता जा रहा है।

गाँव तथा नगर के पारस्परिक सम्पर्क और मिलन तथा अन्तःक्रिया के कारण एक समन्वयपूर्ण अवस्था उत्पन्न हुई है, जिसमें ग्रामीण व नगरीय विशेषताओं की सह-उपस्थिति के दर्शन होते हैं। वर्तमान समय में हमें बड़े-बड़े नगरों/महानगरों के चारों ओर बसे उपनगरों में दोनों का ही जीवन दृष्टिगोचर होता है। इन नगरों के आसपास कुछ ऐसे ग्रामीण क्षेत्र विकसित हुए हैं, जिनमें निर्विवाद रूप से कुछ नगरीय लक्षण पाए जाते हैं। कानपुर महानगर के आसपास बसे उन्नाव, फतेहपुर, इटावा, फर्रुखाबाद आदि कस्बे इसके ही उदाहरण है, क्योंकि इनमें ग्रामीण और नगरीय दोनों ही विशेषताएँ देखी जाती हैं। आज नगरनिवासी नगर से दूर खुली हवा और प्राकृतिक वातावरण में अपने बंगलों/इमारतों का निर्माण करते हैं। कभी इन बंगलों में गांवों की झोपड़ी जैसी डिजाइनें भी बनाई जाती हैं और रिक्त स्थान में फल-फूल और अनाज भी पैदा किया जाता है। इन बंगलों में आधुनिक नगरों की समस्त सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं। विद्युत, जल, फ्रिज, रेडियो,टी.वी., सोफा, कुर्सी- मेज, किचेन, फर्नीचर, मोटर कार और कहीं-कहीं पर ‘स्विमिंग पूल’ तक की व्यवस्था की जाती है। इन बंगलों में निवास करने वाले व्यक्ति नगरीय व्यवसाय पर ही निर्भर करते हैं। स्पष्ट है कि इस प्रकार हम ग्राम्य नगरीकरण और ग्राम-नगर सातत्य / नैरन्तर्यता की प्रक्रियाओं को ग्राम तथा नगर के पारस्परिक सम्बन्धों/सम्पर्कों/मिलन कड़ी के परिणामतः घटित होते देखते हैं।

स्पष्ट है कि वर्तमान भारतीय समाज में नगरीकृत जीवन पूर्णत: नगरीय जीवन न होकर किसी

न किसी सीमा तक ग्रामीण जीवन से प्रभावित है। नगरीकृत जीवन के दर्शन हमें गाँवों में भी होते हैं, क्योंकि ग्रामवासियों की जीवन-प्रणाली, खान-पान, वेश-भूषा, भौतिकता और लौकिकता आदि नगरवासियों से प्रभावित होने लगी है। गाँवों पर नगर के सम्पर्क के कारण गांववासियों में अनेक परिवर्तन आए हैं, जिनमें वैचारिक, राजनीतिक, सहिष्णुता, भाग्यवादिता, नैतिकता, धार्मिकता, कृत्रिमता से सम्बन्धित मनोवृत्तियाँ उल्लेखनीय है। नगरों की समृद्धि और अधिकाधिक नगरीकरण होने पर ही ग्राम्य-नगरीकरण की प्रक्रिया निर्भर करती है। यदि नगरों का विकास नहीं होता और नगरीकरण तेजी से नहीं बढ़ता है, तो ऐसे क्षेत्रों के निर्माण की आवश्यकता ही समाप्त हो जाती है। नगरों में स्थापित विभिन्न उद्योगों में काम करने वाले व्यक्तियों को ‘ग्राम-नगरों’ के विस्तृत क्षेत्र में बसाने पर इनका विस्तार और निवास-क्षेत्र विशाल हो जाएगा और कार्य करने के स्थान और निवास-स्थान में भी दूरी उत्पन्न हो जाएगी। स्पष्ट है कि इस अवस्था में उन्हें नगर की सुविधाएँ उपलब्ध न हो सकेंगी। बिजली, नल, सफाई, सड़क, शिक्षा, चिकित्सा यातायात और संचार, प्रशासन सम्बन्धी अनेक सुविधाएँ जुटा सकना उनके लिए कठिन कार्य हो जाएगा। इसका परिणाम यह होगा कि नगरीय लोगों का जीवन-स्तर गिरकर ग्रामीण स्तर के बराबर हो जाएगा। स्पष्ट है कि ग्राम्य- नगरीकरण का अधिक विस्तार होने पर उनकी समस्याओं का समाधान होने के स्थान पर उनमें बढ़ोत्तरी ही करेगा। यह भी सम्भव है कि इसके विस्तार की भावी समस्याएँ भी समाप्त हो जाएँ।

अन्तर्राष्ट्रीय सद्भावना के विकास का एकमात्र साधन शिक्षा है’ उपर्युक्त कर को स्पष्ट कीजिए।

ग्राम्य-नगरीकरण के फलस्वरूप नगरीकरण संस्कृति विकसित होती है। महानगर की सभ्यता और संस्कृति गाँवों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेती है। गाँव महानगरीय संस्कृति के अंश बन जाते हैं। नगरीय प्रभाव के परिणामस्वरूप ग्रामवासी नगर की भाषा जीवन-पद्धति एवं मूल्यों को ग्रहण कर लेते हैं और अपने परम्परागत मूल्यों, रीति-रिवाजों, प्रथाओं, परम्पराओं तथा जीवन-प्रणाली को छोड़ते हैं। ग्राम्य नगरीकरण सातत्य की प्रक्रिया विभिन्न समाजों में अलग-अलग रूप में क्रियाशील होती है, क्योंकि यह देश की सामाजिक एवं आर्थिक प्रगति, औद्योगिकरण, यातायात तथा संचार-साधनों की उपलब्धता, कृषि का आधुनिकीकरण, आदि बातों पर निर्भर करती है ।

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