गुर्जर प्रतिहार के शासन के महत्व का उल्लेख कीजिए।

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गुर्जर प्रतिहार के शासन के महत्व

गुर्जर-प्रतिहार के शासन का महत्व-गुर्जर-प्रतिहार शासन का भारत के इतिहास में अत्यन्त महत्व है। गुर्जर-प्रतिहार वंश हर्षोत्तर उत्तरी भारत में सबसे अधिक शक्तिशाली शक्ति के रूप में उभरकर सामने आया। नागभट्ट द्वारा धर्मपाल को मात देकर कशीज पर 9वीं शती के प्रारम्भ में अधिकार कर लेने के समय से 10वीं शती के अन्य तक के लगभग 150 वर्षों तक के बीच, पातों और राष्ट्रकूटों की गहरी प्रतिद्वन्द्रिता के होते हुए भी, प्रतीहार सत्ता सारे उत्तरभारत को एक राजनीतिक और प्रशासकीय सूत्र में बांधे रही। यही नहीं पाल और राष्ट्रकूट भारतवर्ष के हृदयस्थल और सदा से भारतीय राजनीति के केन्द्र (उत्तरी और मध्यभारत) को अधिकृत करने की विकोणात्मक लड़ाई प्रतीहारों से हार गये, और अपने-अपने क्षेत्रों में भी उनकी सत्ता का उतना दीर्घकालीन दबदबा नहीं रहा, जितना सारे उत्तरी भारत में गुर्जर प्रतीहारों का था। अपने चरमोत्कर्ष के दिनों में पूर्व में उत्तरी बंगाल से पश्चिम में सिन्ध, सौराष्ट्र और गुजरात तक उत्तर में हिमालय की निचली पहाड़ियों से लेकर दक्षिण में सारे बुन्देलखण्ड और मालवा तक तथा पूर्वी पंजाब और दिल्ली होते हुए सारे राजूपताने तक प्रतीहार सम्राटों की प्रशासकीय आज्ञाएँ समानरूप से स्वीकृत थी तथा इस क्षेत्र के बीच के दसों राजवंश उनकी सैनिक सेवा करते अपने को यशस्वी और गौरवान्वित समझते थे। अपने सर्वाधिक उत्कर्ष और विस्तार के समय केवल मौर्यो का साम्राज्य प्रतीहारों से बढ़ा था, गुप्त साम्राज्य भी विशाल था, किन्तु वह अपने अन्यतम विस्तार के समय भी उसका साम्राज्य महेन्द्रपाल के साम्राज्य विस्तार से छोटा ही था।

हर्ष का साम्राज्य प्रतीहारों जैसा न तो विस्तृत था, न दीर्घकालीन, और न प्रशासन में ही उतना सुसंगठित था आगामी वर्षों में भारत में यदि कोई अन्य साम्राज्य जो प्रतिहार वंश का मुकाबला कर सका तो वह मुगल साम्राज्य (1526-1707) ही था, जो उससे अधिक विस्तृत भी था। किन्तु प्रतीहारों को एक साथ जिस लम्बी अवधि तक विभिन्ना दिशाओं दक्षिण में राष्ट्रकूटों, पूर्व में पालों और पश्चिम में अरबों जैसे अपने सामान ही शक्तिशाली शत्रु राजवंशों का मुकाबला करना पड़ा, पैसी समस्या न तो मौर्योों की थी, न गुप्तों की और न मुगलों की पुनः इन सभी साम्राज्यों के पतन के दो समान कारण दिखायी देते हैं योग्य सम्राटों के अयोग्य और शक्तिहीन उत्तराधिकारी और विदेशी आक्रमण पर जितने समय प्रतिहारों ने विदेशी आक्रमणकारियों का सफलतापूर्वक मुकाबला किया, उतने दिनों तक मुकाबले की समस्या उनके अतिरिक्त किसी अन्य साम्राज्य के सामने थी ही नहीं अरब इतिहासार-सुलेमान, अबूजैद, अलमसूदी और अगदी उनकी असीम सैन्यशक्ति, देशभक्ति, वीरता, अरबों के प्रति शत्रुता तथा उन्हें पीछे ढकेल देने के लिए अनवरत रूप में उनके तैयार रहने की प्रशंसात्मक बातें लिखते हैं। भारत के कुछ योरोपीय इतिहासकार इस बात पर आश्चर्य प्रकट करते रहे हैं कि क्या कारण है कि जिन मुसलमानों ने अपने

आक्रमणों के प्रथम आवेग में ही प्रायः सम्पूर्ण मध्य और पश्चिमी एशिया, उत्तरी अफ्रीका और दक्षिणी योरोप को भयाक्रान्त कर डाला तथा उन सभी भूखण्डों की अधिकांश जनता को इस्लाम मानने को विवश कर दिया, वे ही 8वीं शती के प्रारम्भ में सिन्ध और सुल्तान में सत्ता स्थापित हो जाने के बाद भी उससे आगे बढ़ने में 300 वर्षों तक कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं प्राप्त कर सके ? इस गुत्थी के समाधान में गुर्जर प्रतीहारों के विशाल, शक्तिशाली और सुशासित साम्राज्य की उस जागरुकता का हवाला दिया जा सकता है, जिसके नेतृत्व में राजपूताना और गुजरात की अनेक छोटी-छोटी सत्ताएँ भी अरबों की चुनौतियाँ स्वीकार करने में पीछे नहीं रही। प्रतीहारों ने सच्चे अर्थों में देश की सुरक्षा और मान-मर्याय की रक्षा में प्रतीहार (ड्योंदीदार अथवा रक्षक) के कर्तव्यों का अक्षरक्षः पालन किया। उन्होंने आठवी शताब्दी के प्रथम चरण से ही अरबों का मुकाबला प्रारम्भ कर दिया था। भोज का ग्वालियर अभिलेख इस बात का दावा करते है कि म्लेच्छ (मुसलमान) आक्रमणकारियों से देश की स्वतंत्रता और संस्कृति की रक्षा करने में प्रथम नागभट्ट, द्वितीय नागभट्ट और मिहिरभोज भगवान् नारायण विष्णु पुरूषोत्तम और आदिवग्रह की तरह मानों अवतारी पुरुष हुए।

महीपाल प्रथम के शासनकाल की घटनाओं (विजय) का उल्लेख कीजिए।

यही नहीं, प्रतीहारों के चरमोत्कर्ष के समय कन्नौज भारतीय संस्कृति और सभ्यता का केन्द्र हो गया, जहाँ देश के सभी भागों से विद्वान् और कलाकार जुटने लगे और अन्य भारतीय प्रदेशों के स्त्री पुरुष अपने ओढ़ावे-पहनावे, बोलचाल एवं रीति-रिवाज में वहाँ के लोगों की नकल करने लगे। प्रतीहारों के शासनकाल में कला और साहित्य की भी उन्नति हुई। राजशेखर इस काल के सर्वश्रेष्ठ कवि थे। वे महेन्द्रपाल के दरबारी कवि थे। उन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की जिनमें कर्पूर मंजरी सबसे प्रसिद्ध है। सोमेश्वर ने इसी काल में चंद्रकौशिक नामक ग्रन्थ की रचना की।

गुर्जर-प्रतीहारों के आधीन धर्म के क्षेत्र में भी विकास हुआ। वैष्णव धर्म का सर्वाधिक विकास हुआ। अनेक प्रतिहार राजाओं ने इस धर्म को प्रश्रय दिया। अनेकानेक मन्दिरों एवं मूर्तियों का निर्माण किया गया। इस प्रकार भारतीय इतिहास में गुर्जर प्रतिहार वंश का राजनैतिक एकता की स्थापना, सांस्कृतिक विकास और धर्म के विकास में अत्यन्त महत्व था।

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