गुरु नानक देव का जीवन परिचय (निबंध)

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भूमिका- संसार भर में समय-समय पर अनेक साहसी, वीर तथा मानवता की उखड़ती हुई जड़ों को पुर्नस्थापित करने वाले महापुरुषों ने जन्म लिया है। ऐसे विरले महापुरुषों में गुरु नानक देव का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। गुरु नानक देव जी का मत था कि न मैं हिन्दू हूँ और न ही मुसलमान में तो पाँच तत्त्वों के मेल से बना मनुष्य मात्र हूँ और मेरा नाम नानक है।

जन्म तथा वंश परिचय

चमत्कारी महापुरुषों एवं महान् धर्म प्रवर्तकों में अपना प्रमुख स्थान रखने वाले सिख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक देव का जन्म कार्तिक पूर्णिमा संवत् 1526 को लाहौर जिले के ‘तलवंडी’ नामक ग्राम में हुआ था, जो आजकल ‘ननकाना साहब’ के नाम से जाना जाता है। यह स्थान पाकिस्तान में लाहौर से लगभग 40 मील दूर स्थित है। आपके पिता श्री कालूचन्द वेदी तलबंदी के पटवारी थे। आपकी माता श्रीमती तृप्ता एक बेहद साध्वी, दयालु, शान्त तथा कर्त्तव्यपराण प्रकृति की महिला थी। माता-पिता ने उन्हें शिक्षा-दीक्षा के लिए गोपाल पण्डित की पाठशाला में भेजा। बचपन से ही आप अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि बालक थे। आप एकान्त प्रिय तथा मननशील बालक थे। यही कारण था कि आपका मन शिक्षा या खेलकूद से कही अधिक आध्यात्मिक विषयों की ओर लगता था। तभी तो वे पण्डित गोपाल जी से मिलने पर पूछ बैठे, “आप मुझे क्या पढ़ायेंगें?” पण्डित जी ने कहा, “गणित या हिन्दी”। इस पर गुरुनानक ने कहा, “गुरु जी, मुझे तो करतार का नाम पढ़ाइये, इनमें मेरी रुचि नहीं है।” इस प्रकार ये बड़े ही तेजस्वी तथा असांसारिक व्यक्ति के रूप में सामने आए लेकिन उनकी इस वैराग्य भावना से उनके माता-पिता चिन्तित रहते थे।

सच्चा सौदा एक बार उनके पिता जी ने धन लेकर कार्य व्यापार करने के लिए उन्हें शहर भेजा, परन्तु गुरु नानक ने वह सारा धन साधुओं की एक टोली के भोजन-पानी पर खर्च कर दिया और पिताजी के पूछने पर घर आकर कह दिया कि वह ‘सच्चा सौदा’ कर आए हैं। उनके पिता ने इस बात पर बहुत क्रोध किया परन्तु गुरुनानक की दृष्टि में तो दूसरों की सेवा ही सच्चा व्यापार था। इसके पश्चात् उनके पिता ने उन्हें बहन नानकी के पास नौकरी करने भेज दिया। वहाँ पर उनके जीजा ने नानक को नवाब दौलत खाँ के गोदाम में नौकरी दिलवा दी। वहाँ पर भी नानक ने गोदाम में रखा सारा अनाज दीन-दुखियों तथा साधुओं में वितरित करवा दिया।

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गृहस्थ जीवन एवं धर्म-प्रचार

जब नानक के माता-पिता उनकी आदतों से परेशान रहने लगे तो उन्होंने नानक को घर गृहस्थी के जाल में बाँधने के लिए उनका विवाह करवा दिया। उनके दो पुत्र श्री चन्द्र तथा लक्ष्मी चन्द्र हुए परन्तु पत्नी तथा पुत्रों का मोह भी उन्हें अपने जाल में नहीं फँसा पाया। एक दिन आप घर छोड़कर जंगल की ओर चले गए तथा लापता हो गए। यहाँ पर लौटने पर लोगों ने देखा कि नानक के मुँह के चारों ओर प्रकाश चमक रहा है। ऐसा मत है कि इसी दिन गुरुनानक का ईश्वर से साक्षात्कार हुआ था। आगे जाकर उन्होंने ‘बाला’ व ‘मरदाना’ नामक शिष्यों के साथ सारे भारत का भ्रमण किया। जगह-जगह पर साधु सन्तों से ज्ञान की बातें की तथा जन साधारण को अमृतवाणी का सन्देश दिया। भ्रमण करते समय आपने जगह-जगह धर्मशालाएं बनवाई। आज भी प्रयाग, बनारस, रामेश्वरम् आदि में निर्मित धर्मशालाएँ इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। गुरुनानक देव के अमृत उपदेश ‘गुरु ग्रन्थ ‘साहब‘ में संकलित हैं।

उपदेश एवं यात्राएं सर्वप्रथम गुरुनानक ने पंजाब का भ्रमण किया। वे उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम चारों दिशाओं में घूमते रहे। वे इन यात्राओं के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करना चाहते थे तथा लोगों को सुधारना भी चाहते थे। एक बार वे हरिद्वार की यात्रा पर गए जहाँ के अन्धविश्वासों का उन्होंने बलपूर्वक खण्डन किया ।

उत्तर भारत के सभी नगरों का भ्रमण कर वे रामेश्वरम् तथा सिंहल द्वीप तक पहुँचे, जिसे आज लंका कहते हैं। दक्षिण भारत से लौटकर आपने हिमालय प्रदेश का भी भ्रमण किया टेहरी गढ़वाल, हेमकूट, सिक्किम, भूटान तथा तिब्बत तक की यात्राएँ भी आपने धर्म प्रचार के लिए की यात्राएँ करते-करते एक बार वे मुसलमानों के तीर्थ स्थान ‘मक्का-मदीना‘ तक पहुँच गए। इस बीच उनकी ख्याति सब ओर फैलने लगी तथा उनके शिष्यों की संख्या भी बढ़ने लगी।

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जीवन भर भ्रमण करते हुए तथा विभिन्न धर्मावलम्बियों के संसर्ग में रहते हुए आपने यह जान लिया था कि बाहर से चाहें सभी धर्मो का स्वरूप भिन्न-भिन्न हो, अलग-अलग नामों वाले देवी-देवता हो, परन्तु सभी धर्मों का सार एक ही है। सभी धर्म सेवा, त्याग, सच्चरित्रता तथा ईश्वर की अपार भक्ति की शिक्षा देते हैं। कोई भी धर्म हमें मिथ्याचार, आडम्बर या संकीर्णता नहीं सिखाता। ये तो मानव मात्र की पैदा की गई कुरीतियाँ हैं, जिन्हें हम अपने-अपने धर्म के साथ जोड़कर दूसरे धर्म के लोगों को नुकसान पहुँचाते हैं। गुरुनानक का कहना था कि पाखण्ड को छोड़कर, आडम्बर से दूर भाग कर तथा भगवान से सच्ची लगन लगाकर ही शान्ति प्राप्त हो सकती है।

उपसंहार

भारतवासी उन्हें ‘हिन्द का पीर’ कहते थे। भ्रमण करते हुए जब नानक बगदाद से अपने देश पहुँचे तो उन्होंने पंजाब में ‘करतारपुर गाँव बसाया। सन् 1538 ई. में 70 वर्ष की आयु में गुरु नानक देव की मृत्यु हो गई। यूँ तो गुरु नानक देव की शिक्षा विविध प्रकार की है, फिर भी उनकी मुख्य शिक्षा यह थी हमें प्रत्येक परिस्थिति में ईश्वर का स्मरण करते रहना चाहिए। अहंकार को पालने से ही सांसारिकता पैदा होती है तथा मानव मोह-माया के जाल में फँसता है। परिश्रम करके रोटी कमाना तथा दूसरों की सच्ची निस्वार्थ सेवा करना ही असली तप है।

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