क्या मंद बुद्धि बालकों की समस्याओं को निर्देशन के माध्यम से हल किया जा सकता है? स्पष्ट कीजिए ।

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मन्द बुद्धि समूह

एक कक्षा में अनेक विद्यार्थी होते है, उनमें से कुछ विद्यार्थी मूर्ख एवं सुस्त प्रतीत होते है। ऐसे विद्यार्थी कक्षा में पढ़ाई जाने वाली विषयवस्तु को या तो बिल्कुल ही नहीं समझ पाते अथवा अधिक समय में समझते हैं। इससे अध्यापक व अभिभावक दोनों ही असन्तुष्ट रहते हैं। यही कारण है कि यह बालक कक्षा में समस्या बन जाते हैं। ऐसे बालको के अधिकांशतः अभिभावक इस बात को नहीं स्वीकार करते हैं कि उनका बालक मानसिक रूप से अपूर्ण है। इन अभिभावकों को यह विश्वास होता है कि उनका वालक उतना परिश्रम नहीं करता, जितना उसे परीक्षा में उत्तीर्ण करने के लिए करना चाहिए। अतः निर्देशक का यह प्रमुख कर्तव्य है कि यह ऐसे बालकों को समझाए। सामान्यतः जिन छात्रों की बुद्धि लब्धि 60 से कम होती है इन बालकों को मन्दबुद्धि बिलक कहा जा सकता है। टरमन ने 70 से कम बुद्धि लब्धि वाले बालकों का मन्द बुद्धि बालक कहा है। निर्देशन की दृष्टि से इन बालकों का एक अलग समूह होता है।

मन्द बुद्धि बालकों की मुख्य विशेषताएं होती है यथा-इनकी प्रतिक्रियायें अत्यन्त मन्द होती है, यह निरन्तर अस्वस्थ रहते हैं, इन बालकों का झुकाव सदैव अपराध और अनैतिकता की ओर रहता है। इसके अतिरिक्त मन्द बुद्धि बालकों की शब्दावली अपूर्ण एवं दोषयुक्त होती है, संवेगात्मक दृष्टि से अस्थिर होते हैं, यह बालक अत्यन्त मन्द गति से सीखते है तथा इनकी रूचियाँ सामान्य एवं सीमित होती हैं. इनमें लघु अवधान विस्मृति पायी जाती है. शारीरिक रूप से हीनाना ही भावना इनमें विकसित हो जाती हैं।

मन्द बुद्धि बालकों का परिवार एवं विद्यालय में अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इनकी मुख्य समस्याएँ होती है

(1) शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से अविकसित होने के कारण, इन बालकों को परिवार एवं विद्यालय में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है तथा परिवार, समाज एवं विद्यालय में समुचित वातावरण के अभाव में यह बालक संवेगात्मक रूप से अपरिपक्क ही रह जाते हैं तथा स्वयं को समायोजित करने में असमर्थ ही रहते हैं।

(2) मानसिक मन्दित बालकों से विद्यालय में तथा कक्षा में शिक्षक द्वारा असहानुभूतिपूर्ण व्यवहार किया जाता है. क्योंकि यह बालक सामान्य विद्यार्थियों के समान शीघ्र अधिगम नहीं कर पाते हैं। अतः निर्देशक का यह उत्तरदायित्व है कि यह मन्द बुद्धि बालकों के अभिभावकों को यह विश्वास दिलाये कि उनका बालक मन्द बुद्धि का है। इनकी जानकारी न होने पर अभिभावक अपने बालक से उच्चाकांक्षा रखते है तथा कुछ समय उपरान्त ही बालक की असफलताओं से निराश होकर वह बालक पर क्रोध करते हैं तथा अपमानित करते है। इसके परिणामस्वरूप वह बालक जीवन में कभी प्रगति नहीं कर सकते। समाज के अन्य वर्ग के व्यक्ति भी मन्द बुद्धि बालकों को हीन दृष्टि से देखते हैं तथा इन बालकों से सम्पर्क बढ़ाना पसन्द नहीं करते हैं. फलस्वरूप मन्द बुद्धि बालक हीन भावना से प्रसित होकर किसी भी क्षेत्र में प्रगति नहीं कर पाते दा उनका विकास अवरूद्ध हो जाता है।

अता इन समस्त समस्याओं के कारण, मन्द बुद्धि बालकों हेतु विशेष निर्देशन कार्येक्रम की व्यवस्था की जानी चाहिए। निर्देशन की रूपरेखा का निर्माण उनके – गंगीण व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए तथा निर्देशन के द्वारा इनमें विकसित हीनभावना को समाप्त करने का प्रयास किया जाना चाहिए। विभिन्न क्षेत्रों में मन्द बुद्धि व्यक्तियों को निर्देशन प्रदान करते समय इस बात ध्यान रखना चाहिए कि विशिष्ट निर्देशन कार्यक्रम के कारण ही इन व्यक्तियों में कही कुसमायोजन अथवा असामान्यतया में बढ़ोत्तरी न हो जाए। अता इस क्षेत्र में विशेष सावधानी रखने की आवश्यकता है यदि निर्देशन के माध्यम से मन्द बुद्धि व्यक्तियों में आत्म-विश्वास पैदा किया तो ऐसे व्यक्ति सामान्य बन सकते हैं।

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