कलचुरि शासक लक्ष्मीकर्ण की उपलब्धियों पर प्रकाश डालिए।

कलचुरि शासक लक्ष्मीकर्ण की उपलब्धिया

गांगेयदेव के बाद उसका पुत्र कर्णदेव अथवा लक्ष्मीकर्ण शासक बना। वह अपने वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा था। उसके कुल आठ अभिलेख मिलते हैं जिनसे हम उसकी उपलब्धियों का ज्ञान प्राप्त करते हैं। उसने अनेक सैनिक अभियान किये। गुजरात के चालुक्य नरेश भीम के साथ मिलकर उसने मालवा के परमारवंशी शासक भोज को पराजित किया। रासमाला से पता चलता है कि कर्ण ने धारा को ध्वस्त करने के बाद राजकोष पर अधिकार कर लिया। इस युद्ध में भोज मारा गया। प्रबन्धचिन्तामणि से भी इसका समर्थन होता है। भेड़ाघाट अभिलेख में कहा गया है। कि ‘कर्ण की वीरता के सामने वंग तथा कलिंग के शासक कांपने लगे।’ बंगाल में इस समय जातवर्मन् नामक कोई राजा शासन कर रहा था। कर्ण ने अपनी कन्या वीरश्री का विवाह उसके साथ कर दिया। कर्ण ने कलिंग की विजय की तथा ‘त्रिकलिंगाधिपति’ की उपाधि धारण की। पूर्व की ओर गौड़ तथा मगध के पाल शासकों को उसने पराजित किया। तिब्बती परम्परा से पता चलता है कि मगध में उसने बहुसंख्यक बौद्ध मन्दिरों तथा मठों को नष्ट कर दिया था। पाल नरेश विग्रहपाल तृतीय को उसने युद्ध में पराजित किया। कर्ण के पैकोर (वीरभूमि जिला) लेख से पता चलता है कि उसने वहाँ की देवी को स्तम्भ समर्पित किया था। हेमचन्द्र भी कर्ण द्वारा विग्रहपाल की पराजय का उल्लेख करता है। किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि कर्ण ने उसके साथ सन्धि कर ली तथा अपनी कन्या का विवाह उसके साथ कर उसे अपना मित्र बना लिया।

कर्ण का सबसे प्रसिद्ध संघर्ष बुन्देलखण्ड के चन्देल वंश के साथ हुआ। विद्याधर की मृत्यु के बाद वहाँ का शासन निर्बल राजाओं के हाथ में आ गया जो अपनी रक्षा करने में सक्षम नहीं थे। इसका लाभ उठाते हुए कर्ण ने चन्देल नरेश देववर्मन पर आक्रमण कर उसे परास्त कर उसके राज्य के कुछ भागों पर अधिकार कर लिया। चन्देल लेखों से पता चलता है कि कुछ समय के लिए उनका राज्य कर्ण के आक्रमणों से पूर्णतया विनष्ट कर दिया गया था। बिल्हण कर्ण को ‘कालंजर गिरि के अधिपतियों का काल’ कहता है।

इस प्रकार विविध स्रोतों से स्पष्ट होता है कि कर्ण तत्कालीन मध्य भारत का सर्वशक्तिमान सम बन गया। परमार तथा चन्देल राजाओं का उन्मूलन करके उसने अपनी स्थिति सार्वभौम बना ली। उसके लेखों के पशप्ति स्थानों- पैकोर, बनारस, गोहरवा आदि से भी पता चलता है कि वह एक विस्तृत भू-भाग का स्वामी था। कभी-कभी कुछ यूरोपीय इतिहासकार कर्ण की उपलब्धियों की तुलना फ्रांसीसी सेनानायक नेपोलियन से करते हैं।

किन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि कर्ण अपनी अज्ञेयता अधिक समय तक सुरक्षित नहीं रख सका था। अपने शासन के अन्तिम दिनों में उसे पराभव उठानी पड़ी। चन्देल नरेश कीर्तिवर्मन द्वारा वह पराजित कर दिया गया। इससे कर्ण की शक्ति अत्यन्त निर्बल पड़ गयी। पूर्व में विग्रहपाल तृतीय के पुत्र नवपाल पश्चिम में परमार नरेश उदयादित्य, उससे पश्चिम में अन्हिलवाड़ के चालुक्य भीम प्रथम तथा दक्षिण में कल्याणी के चालुक्य नरेश सोमेश्वर प्रथम ने भी कर्ण को कई युद्धों में पराजित कर उसकी प्रतिष्ठा को धूल में मिला दिया। 1073 ई. के लगभग उसका शासन समाप्त हो गया।

कर्ण भी अपने पिता के समान शैवमतानुयायी था तथा बनारस में उसने कर्णमेरू नामक शैवमन्दिर बनवाया था। उसने त्रिपुरी के निकट कर्णावती (आधुनिक कर्णबल) नामक नगर की स्थापना भी करव थी। उसका विवाह हूण वंशीया कन्या आवल्लदेवी के साथ हुआ था। सारनाथ के बौद्ध भिक्षुओं को भी उसने सुविधायें प्रदान की थी। प्रयाग तथा काशी में वह दान वितरित करता था।

कलचुरि सत्ता का विनाश

कर्ण की मृत्यु के बाद कलचुरियों की शक्ति क्रमशः क्षीण होने लगी। उसके बाद उसकी पत्नी आवल्लदेवी से उत्पन्न पुत्र यशः कर्ण राजा बना। उसके जबलपुर तथा खेरा लेखों से पता चलता है कि स्वयं लक्ष्मीकर्ण ने ही उसका राज्याभिषेक किया था। वह अपने पिता के समान शक्तिशाली नहीं था। उसकी एकमात्र सफलता, जिसका उल्लेख उसके लेखों में किया गया है, यह थी कि वह आन्ध्र के राजा को जीतकर गोदावरी नदी तट तक पहुँच गया तथा वहाँ भीमेश्वर मन्दिर में पूजा की। यह पराजित राजा वेंगी का पूर्वी चालुक्य वंशी विजयादित्य सप्तम था। किन्तु वह अधिक समय तक अपना राज्य सुरक्षित नहीं रख सका। उसे गम्भीर चुनौती काशी कन्नौज क्षेत्र में गाहड़वालों द्वारा मिली जिनका उत्कर्ष चन्द्रदेव के नेतृत्व में तेजी से हुआ। उसने काशी, कन्नौज तथा दिल्ली के समीपवर्ती सभी क्षेत्रों को जीतकर अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर दिया। इन स्थानों को उसने यशः कर्ण से ही जीता होगा। इसके अतिरिक्त परमार लक्ष्मदेव, कल्याणी के चालुक्य नरेश विक्रमादित्य पठ, चन्देल नरेश सल्लक्षणवर्मा आदि ने भी कई युद्धों में यशः कर्ण को पराजित कर दिया।

“गोविन्द चन्द्र गहड़वाल वंश का सर्वाधिक योग्य शासक था।” व्याख्या कीजिए।

यशः कर्ण के बाद उसका पुत्र गयाकर्ण (1123-1151 ई.) राजा बना। यह एक निर्बल राजा था जो अपने वंश की प्रतिष्ठा एवं साम्राज्य को सुरक्षित नहीं रख सका। चन्देल नरेश मदनवर्मा ने उसे बुरी तरह पराजित किया गयाकर्ण इतना भयाक्रान्त या कि उसका नाम सुनकर ही भाग खड़ा होता था। दक्षिणी कोशल के कलचुरि सामन्तों ने भी अपनी स्वतन्त्रता घोषित कर दी तथा उनके शासक रत्नदेव द्वितीय ने भी गयाकर्ण को पराजित किया गयाकर्म के बाद नरसिंह, जयसिंह तथा विजयसिंह के नाम मिलते है जिन्होंने बारी-बारी से शासन किया। वे भी अपने साम्राज्य को विघटन से बचा नहीं सके। बारहवीं शती के अन्त तक इस वंश ने महाकोशल में किसी न किसी प्रकार अपनी सत्ता कायम रखी। अन्ततोगत्वा तेरहवीं शती के प्रारम्भ में इस वंश के अन्तिम शासक विजयसिंह को चन्देल शासक त्रैलोक्यवर्मन् ने परास्त कर त्रिपुरी को जीतकर अपने राज्य में मिला लिया जिससे कलचुरि चेदिवंश का अन्त हुआ।

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