उपनयन संस्कार क्या है?

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उपनयन संस्कार- प्राचीन काल में शिक्षा का प्रारम्भ उपनयन संस्कार से होता था। उपनयन का शाब्दिक अर्थ है- गुरु के निकट ले जाना। अतः उपनयन संस्कार में किसी शुभ दिन बालक को गुरु के पास ले जाया जाता था। गुरुजन बालक की योग्यताओं और सदगुणों को परखते थे और उसके सम्बन्ध में अपना निर्णय देते थे। बालक को शिक्षा का अधिकारी घोषित किये जाने पर इस संस्कार का आयोजन किया जाता था। गणेश, सरस्वती तथा कुल देवताओं की उपासना के बाद अक्षर ज्ञान कराया जाता था। शिष्य को यज्ञोपवीत, मेखला आदि धारणा करनी होती थी। उसे ब्रह्मचारी, अन्त:वासी आदि नामों से पुकारा जाता था।

वैदिक काल में शिक्षा का क्या अर्थ था

मनु के अनुसार द्विजाती (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) में उपनयन संस्कार की आयु 8, 11 तथा 12 होती थी परन्तु याज्ञवल्क्य ने ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य के लिए उपनयन संस्कार की आयु 5, 6 तथा 8 मानी है। प्रारम्भ में वर्ण भेद कठोर नहीं था अतः सभी का उपनयन संस्कार होता था परन्तु उत्तर वैदिक काल में शूदों तथा महिलाओं का उपनयन संस्कार बन्द कर दिया गया।

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