आर्थिक क्षेत्र में लैंगिक विषमता की स्थिति स्पष्ट कीजिये।

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आर्थिक क्षेत्र में लैंगिक विषमता

आर्थिक क्षेत्र में लैंगिक विषमता महिलाओं की आर्थिक स्थिति को आजकल समाज की स्थिति के विकास के एक निर्धारक के रूप में स्वीकार किया जाता है, क्योंकि महिलाएं प्रत्यक्षतः अथवा अप्रत्यक्षतः आर्थिक क्रियाओं में योगदान देती है। वे समस्त पारिवारिक दायित्वों का बोझ स्वयं उठाकर पुरुषों को केवल आर्थिक क्रियाएं सम्पादित करने का पूरा समय व अवसर प्रदान करती हैं अथवा स्वयं भी पारिवारिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने के साथ-साथ पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर आर्थिक क्रियाओ में संलग्न होती हैं। आज भागीदारी की दृष्टि से कृषि, पशु व्यवसाय, हैण्डलूम आदि में महिलाओं के अनुपात में काफी हद तक वृद्धि हुई है। यही नहीं पिछले दशक में महिलाओं की क्रियाओं से सम्बन्धित नए आयाम उभर कर सामने आए हैं।

सम्पत्ति के अर्जन में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के बावजूद महिलाओं को सम्पत्ति के अधिकार से वंचित रखा गया। यद्यपि कानूनी तौर पर आज महिलाओं को सम्पत्ति का समान अधिकार प्राप्त है, तथापि वे आर्थिक दृष्टि से अपने जीवन के सभी कालों में पुरुष की दया पर ही आश्रित रही हैं। सम्पत्ति के अधिकार में भी विरासत से प्राप्त सम्पत्ति, वैवाहिक सम्पत्ति अथवा स्वयं अर्जित सम्पत्ति पर भी महिलाओं की तुलना में पुरुषों को अधिक अधिकार प्राप्त है।

आधुनिक ही नहीं वरन् आदिम समाजों में भी लिंगीय आधार पर विषमता पाई जाती थी, यहाँ श्रम विभाजन आयु. लिंग या विशेषज्ञता के आधार पर देखने को मिलता है। पुरुष शिकार करने जंगलों में जाते थे, तो स्त्रियां घर की देखभाल, बच्चों का लालन-पालन, जंगलों में कन्दमूल, फल-फूल, साग-पात आदि के संचय का कार्य करती थी। एस्किमो अण्डमान एवं अरुण्टा जनजाति में ऐसा ही देखने को मिलता है। आदिम समाजों में पुरुष ही शिकार का अगुवा एवम युद्ध का नेतृत्व करने का कार्य करते थे।

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पितृसत्तात्मक समाजों में पिता से पुत्र को सम्पति का हस्तान्तरण किया जाता है जबकि मातृसतात्मक समाज में मामा की सम्पत्ति का अधिकारी भान्जा होता है। इस प्रकार से लिंगीय विषमता के आर्थिक स्वरूपों में लियों की अपेक्षा पुरुषों को अधिक महत्व एवं अधिकार दिए जाते हैं।

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